पंजाब में किसानों का बड़ा ऐलान, 12 मांगों को लेकर 14 सितंबर से मंत्रियों के घरों के बाहर डेरा

चंडीगढ़, 14 सितंबर 2026। पंजाब में किसान संगठनों और राज्य सरकार के बीच एक बार फिर टकराव बढ़ता दिखाई दे रहा है। किसान मजदूर मोर्चा (KMM) ने अपनी 12 सूत्रीय मांगों को लेकर 14 सितंबर से पंजाब सरकार के मंत्रियों और विधानसभा अध्यक्ष के आवासों के बाहर पांच दिवसीय धरना शुरू करने का ऐलान किया है। किसान नेताओं का कहना है कि लंबे समय से किसानों और खेत मजदूरों से जुड़े मुद्दों का समाधान नहीं होने के कारण अब आंदोलन को सीधे सरकार के प्रतिनिधियों के आवासों तक ले जाने का फैसला किया गया है।

किसान मजदूर मोर्चा के पंजाब संयोजक सरवन सिंह पंधेर ने कहा है कि सरकार को किसानों और मजदूरों की समस्याओं को गंभीरता से लेना होगा। संगठन का कहना है कि यदि मांगों पर ठोस कार्रवाई नहीं होती है तो आंदोलन को और व्यापक किया जाएगा।

14 सितंबर से शुरू होगा पांच दिवसीय धरना

किसान मजदूर मोर्चा की ओर से घोषित कार्यक्रम के मुताबिक आंदोलन का नया चरण 14 सितंबर से शुरू होकर पांच दिनों तक चलेगा। इस दौरान पंजाब विधानसभा अध्यक्ष कुलतार सिंह संधवां और राज्य सरकार के सात मंत्रियों के आवासों के बाहर प्रदर्शन किया जाएगा।

किसान संगठनों का कहना है कि आंदोलन का मकसद सरकार पर दबाव बनाना है ताकि किसानों और खेत मजदूरों से जुड़े मुद्दों पर जल्द निर्णय लिया जा सके।

इससे पहले किसान संगठनों ने राज्य के विभिन्न जिलों में प्रशासनिक कार्यालयों के बाहर भी प्रदर्शन किए हैं। अब आंदोलन का अगला चरण सीधे मंत्रियों के आवासों के बाहर आयोजित किया जा रहा है।

बिजली संकट बना तत्काल वजह

किसानों की नाराजगी की प्रमुख वजहों में इस समय बिजली संकट सबसे ऊपर है। धान की फसल के मौसम में किसानों को सिंचाई के लिए पर्याप्त बिजली उपलब्ध नहीं होने की शिकायत है।

पंजाब में हाल के दिनों में बिजली की मांग काफी बढ़ी है। उत्पादन क्षमता के कुछ हिस्से के तकनीकी कारणों से उपलब्ध नहीं रहने और बढ़ती मांग के बीच ग्रामीण और कृषि क्षेत्रों में बिजली आपूर्ति प्रभावित होने की खबरें सामने आई हैं।

किसानों का कहना है कि धान की फसल के लिए सिंचाई बेहद महत्वपूर्ण समय पर है और बिजली की अनियमित आपूर्ति से किसानों को परेशानी का सामना करना पड़ रहा है।

पांच फसलों की MSP पर सरकारी खरीद की मांग

किसान मजदूर मोर्चा की 12 सूत्रीय मांगों में बासमती, मक्का, मूंग, सरसों और आलू जैसी फसलों की MSP पर सरकारी खरीद सुनिश्चित करने की मांग भी शामिल है। संगठन चाहता है कि किसानों को इन फसलों के लिए भी निश्चित बाजार और सरकारी खरीद का भरोसा मिले।

किसान नेताओं का तर्क है कि केवल कुछ प्रमुख फसलों तक सरकारी खरीद सीमित रहने से किसानों को अन्य फसलों के मामले में बाजार की अनिश्चितता का सामना करना पड़ता है। इसलिए वे पांच अतिरिक्त फसलों के लिए भी MSP पर सरकारी खरीद की व्यवस्था चाहते हैं।

किसानों और खेत मजदूरों की कर्जमाफी की मांग

आंदोलन की एक बड़ी मांग किसानों और खेत मजदूरों को कर्ज से राहत देने की है।

किसान संगठनों का कहना है कि कृषि लागत बढ़ने, फसल की कीमतों में उतार-चढ़ाव और प्राकृतिक आपदाओं के कारण कई किसान आर्थिक दबाव में हैं। ऐसे में किसानों और खेत मजदूरों के कर्ज को लेकर सरकार को व्यापक नीति बनानी चाहिए।

संगठन ने कर्ज के कारण आत्महत्या करने वाले किसानों और खेत मजदूरों के परिवारों के लिए मुआवजा और परिवार के एक सदस्य को सरकारी नौकरी देने की मांग भी रखी है।

शंभू-खनौरी आंदोलन से जुड़े परिवारों की मांग

किसान संगठनों ने शंभू और खनौरी आंदोलन के दौरान जान गंवाने वाले किसानों के परिवारों को मुआवजा और सरकारी नौकरी देने की मांग भी उठाई है।

इसके साथ ही आंदोलन के दौरान घायल हुए किसानों के लिए उचित मुआवजा और इलाज की व्यवस्था की मांग की गई है। किसान नेताओं का कहना है कि लंबे किसान आंदोलनों के दौरान प्रभावित हुए परिवारों के मुद्दों का समाधान किया जाना चाहिए।

लैंड पूलिंग नीति वापस लेने की मांग

किसानों की प्रमुख मांगों में पंजाब की लैंड पूलिंग नीति वापस लेना भी शामिल है।

किसान संगठनों का कहना है कि जमीन किसानों की आजीविका का मुख्य आधार है और भूमि से संबंधित नीतियां बनाते समय किसानों के हितों को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

इसके अलावा लंबे समय से जमीन पर खेती कर रहे किसानों को मालिकाना अधिकार देने की मांग भी आंदोलन का हिस्सा है।

किसान आंदोलनों के दौरान दर्ज केस वापस लेने की मांग

किसान संगठनों ने विभिन्न किसान आंदोलनों के दौरान दर्ज किए गए मामलों को वापस लेने की मांग भी उठाई है।

इसमें पुलिस मामलों के साथ-साथ रेलवे और पराली जलाने से संबंधित मामलों को वापस लेने की मांग शामिल है। संगठन का कहना है कि किसान आंदोलनों के दौरान दर्ज मामलों की समीक्षा कर उन्हें वापस लिया जाना चाहिए।

पंजाब के पानी और भूजल का मुद्दा भी शामिल

किसानों की 12 मांगों में पंजाब के नदी जल विवाद और गिरते भूजल स्तर का मुद्दा भी शामिल है।

किसान संगठन नदी जल के बंटवारे को रिपेरियन सिद्धांत के आधार पर हल करने की मांग कर रहे हैं। साथ ही बारिश के पानी को जमीन के भीतर पहुंचाने और भूजल स्तर को सुधारने के लिए प्रभावी नीति बनाने की मांग की गई है।

किसान नेताओं का कहना है कि पंजाब में लगातार गिरता भूजल भविष्य में खेती और पेयजल दोनों के लिए गंभीर चुनौती बन सकता है। इसलिए केवल तत्काल राहत के बजाय लंबे समय की जल नीति तैयार करना जरूरी है।

बाढ़ और जलभराव के लिए स्थायी नीति की मांग

किसान संगठनों ने पंजाब में बाढ़ और बारिश के पानी से होने वाले नुकसान को रोकने के लिए दीर्घकालिक नीति बनाने की मांग भी रखी है।

किसानों का कहना है कि बारिश के दौरान कई क्षेत्रों में खेतों और गांवों में पानी भर जाता है, जिससे फसलों को नुकसान पहुंचता है। ऐसे में बाढ़ नियंत्रण, जल निकासी और पानी के बेहतर प्रबंधन के लिए स्थायी व्यवस्था जरूरी है।

नशा और बेरोजगारी का मुद्दा भी आंदोलन में

यह आंदोलन केवल कृषि और बिजली से जुड़े मुद्दों तक सीमित नहीं है। किसान संगठनों ने पंजाब में नशे और बेरोजगारी के मुद्दे को भी अपनी मांगों में शामिल किया है।

संगठन का कहना है कि युवाओं को रोजगार के पर्याप्त अवसर उपलब्ध कराए जाने चाहिए ताकि उन्हें नशे जैसी समस्याओं से दूर रखा जा सके। किसान नेताओं ने सरकार से युवाओं के लिए रोजगार और कौशल विकास के अवसर बढ़ाने की मांग की है।

पंजाबियों के लिए रोजगार में प्राथमिकता की मांग

किसान संगठनों ने सरकारी रोजगार में पंजाब के युवाओं को अधिक प्राथमिकता देने की मांग भी रखी है।

इससे जुड़ी मांगों में पंजाबी भाषा को प्राथमिकता देने और सरकारी रोजगार में पंजाबियों के लिए 80 से 85 प्रतिशत तक आरक्षण की मांग शामिल है। यह मांग किसान आंदोलन के व्यापक सामाजिक और रोजगार संबंधी एजेंडे को भी सामने रखती है।

पहले डीसी कार्यालयों पर प्रदर्शन, अब मंत्रियों के घर

किसान संगठनों ने आंदोलन के पहले चरण में पंजाब के अलग-अलग जिलों में डिप्टी कमिश्नर कार्यालयों के बाहर प्रदर्शन किया था।

जब इन प्रदर्शनों के बाद भी मांगों पर अपेक्षित कार्रवाई नहीं हुई, तो संगठन ने आंदोलन को अगले स्तर पर ले जाने का निर्णय किया। अब मंत्रियों और विधानसभा अध्यक्ष के आवासों के बाहर धरना देने की घोषणा की गई है।

इससे पहले 12 सितंबर को भी विभिन्न जिलों में किसान संगठनों की ओर से 14 सितंबर से शुरू होने वाले धरनों की तैयारियों की समीक्षा की जा रही थी। फिरोजपुर में किसान नेताओं ने कृषि मंत्री गुरमीत सिंह खुड्डियां के आवास के बाहर होने वाले पांच दिवसीय धरने की तैयारियों पर चर्चा की।

सरकार पर बढ़ेगा राजनीतिक दबाव

पंजाब में विधानसभा चुनाव 2027 में होने हैं। ऐसे समय में किसानों का आंदोलन राज्य सरकार के लिए राजनीतिक रूप से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

किसानों का आंदोलन सीधे मंत्रियों के आवासों तक पहुंचने से सरकार पर राजनीतिक दबाव बढ़ सकता है। हालांकि सरकार की ओर से किसानों के साथ बातचीत और उनकी मांगों पर चर्चा की प्रक्रिया पहले भी हुई है।

अब किसान संगठन चाहते हैं कि बातचीत के बजाय मांगों पर ठोस निर्णय लिए जाएं।

विधानसभा तक मार्च की भी चेतावनी

किसान मजदूर मोर्चा ने संकेत दिया है कि यदि सरकार उनकी मांगों पर ध्यान नहीं देती है तो आंदोलन को और आगे बढ़ाया जा सकता है।

संगठन की ओर से पंजाब विधानसभा की ओर मार्च करने की चेतावनी भी दी गई है। यदि विधानसभा का विशेष सत्र बुलाया जाता है और मांगों पर समाधान नहीं निकलता, तो किसान संगठन सदन के बाहर अपनी आवाज उठाने की तैयारी कर सकते हैं।

इससे आंदोलन का स्वरूप केवल जिला स्तर के धरनों तक सीमित न रहकर राज्यव्यापी राजनीतिक दबाव में बदल सकता है।

किसान नेताओं ने सरकार से बातचीत की अपील भी की

आंदोलन की घोषणा के साथ किसान नेताओं ने सरकार से सीधे बातचीत कर समस्याओं का समाधान करने की अपील भी की है।

किसानों का कहना है कि वे टकराव नहीं चाहते, लेकिन यदि उनकी मांगों को लगातार नजरअंदाज किया गया तो आंदोलन को मजबूरन और तेज करना पड़ेगा।

अब सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह होगी कि वह बिजली संकट और धान की फसल से जुड़े तत्काल मुद्दों के साथ-साथ कर्ज, MSP, पानी, जमीन और रोजगार जैसी दीर्घकालिक मांगों पर किस तरह प्रतिक्रिया देती है।

14 सितंबर से शुरू होगा नया चरण

कुल मिलाकर पंजाब में किसान आंदोलन एक बार फिर नए चरण में प्रवेश करने जा रहा है। 14 सितंबर से पांच दिनों तक मंत्रियों और विधानसभा अध्यक्ष के आवासों के बाहर धरने की घोषणा ने राज्य की राजनीति और प्रशासन दोनों का ध्यान किसानों की मांगों की ओर खींच दिया है।

किसानों की 12 सूत्रीय मांगों में बिजली और खाद की तत्काल समस्या से लेकर MSP, कर्जमाफी, मुआवजा, जमीन, पानी, बाढ़, भूजल, रोजगार और किसान आंदोलनों के दौरान दर्ज मामलों जैसे व्यापक मुद्दे शामिल हैं।

अब देखना होगा कि सरकार और किसान संगठनों के बीच बातचीत से कोई रास्ता निकलता है या 14 सितंबर से शुरू होने वाला आंदोलन आने वाले दिनों में और बड़ा रूप लेता है।

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