नई दिल्ली, 12 सितंबर 2026। भारत में इस समय मानसून का मिजाज बेहद असमान दिखाई दे रहा है। देश के एक बड़े हिस्से में जहां सामान्य से कम बारिश के कारण सूखे जैसे हालात बनने लगे हैं, वहीं दूसरी तरफ कई इलाकों में अत्यधिक बारिश ने बाढ़ का खतरा बढ़ा दिया है। ताजा आंकड़ों के मुताबिक देश के 218 जिलों में पिछले चार सप्ताह की बारिश के आधार पर सूखे जैसी स्थिति दर्ज की गई है। दूसरी ओर करीब 86 जिलों में भारी बारिश के कारण बाढ़ जैसी स्थिति बनी हुई है।
मौसम की इस असमान तस्वीर ने कृषि, जल संसाधनों और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को लेकर चिंता बढ़ा दी है। वैज्ञानिक और मौसम विशेषज्ञ मौजूदा बदलाव को अल नीनो समेत बड़े जलवायु कारकों से जोड़कर देख रहे हैं। हालांकि किसी एक मौसम घटना के हर स्थानीय असर को केवल अल नीनो के कारण बताना सही नहीं होगा।
एक ही देश में सूखा और बाढ़ का विरोधाभास
भारत में मानसून के दौरान आमतौर पर बारिश का वितरण एक जैसा नहीं होता, लेकिन इस बार कई क्षेत्रों में अंतर काफी ज्यादा दिखाई दे रहा है।
ताजा आकलन में 218 जिलों को मध्यम, गंभीर या अत्यधिक सूखे जैसी श्रेणियों में रखा गया है। वहीं दूसरी तरफ 86 जिलों में बहुत ज्यादा बारिश के कारण बाढ़ जैसी परिस्थितियां सामने आई हैं।
इसका सीधा मतलब यह है कि एक तरफ ऐसे क्षेत्र हैं जहां खेतों को पर्याप्त पानी नहीं मिल रहा, जल स्रोतों पर दबाव बढ़ रहा है और किसानों को बारिश का इंतजार करना पड़ रहा है। दूसरी तरफ कुछ क्षेत्रों में इतनी अधिक बारिश हो रही है कि फसलों, सड़कों, घरों और बुनियादी ढांचे को नुकसान पहुंचने का खतरा पैदा हो गया है।
218 जिलों में सूखे जैसे हालात क्यों चिंता की बात?
मौसम संबंधी आकलन में बारिश की कमी को समझने के लिए Standardized Precipitation Index यानी SPI जैसे सूचकांकों का इस्तेमाल किया जाता है।
इसी आधार पर पिछले चार सप्ताह की बारिश का आकलन किया गया है। रिपोर्ट के अनुसार 218 जिले सूखे जैसी विभिन्न श्रेणियों में आए हैं। ये जिले देश के कुल जिलों का 25 प्रतिशत से अधिक हिस्सा हैं।
अगर बारिश की कमी लंबे समय तक बनी रहती है तो इसका असर केवल खेती तक सीमित नहीं रहता। इसका प्रभाव मिट्टी की नमी, जलाशयों, भूजल स्तर, ग्रामीण रोजगार और स्थानीय अर्थव्यवस्था पर भी पड़ सकता है।
दूसरी तरफ 86 जिलों में बारिश ने बढ़ाई मुश्किल
जहां एक तरफ बारिश की कमी चिंता का कारण है, वहीं देश के 86 जिलों में भारी बारिश ने बिल्कुल अलग तरह की समस्या खड़ी कर दी है।
कई क्षेत्रों में लगातार बारिश के कारण नदियों और नालों का जलस्तर बढ़ सकता है। निचले इलाकों में जलभराव, सड़क संपर्क प्रभावित होने और फसलों को नुकसान पहुंचने का खतरा रहता है।
यानी इस समय देश के सामने सिर्फ बारिश की कमी की समस्या नहीं है, बल्कि बारिश के असमान वितरण की समस्या ज्यादा महत्वपूर्ण बनकर सामने आई है।
अल नीनो को क्यों माना जा रहा है महत्वपूर्ण?
अल नीनो प्रशांत महासागर के उष्णकटिबंधीय हिस्से में समुद्र की सतह के तापमान और वायुमंडलीय परिस्थितियों में होने वाला बदलाव है। इसका असर दुनिया के अलग-अलग हिस्सों के मौसम पर पड़ सकता है।
भारत के संदर्भ में अल नीनो का संबंध अक्सर कमजोर या असामान्य मानसून से जोड़ा जाता है। हालांकि हर अल नीनो घटना का असर एक जैसा नहीं होता।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, 1950 के बाद भारत में कई बार अल नीनो की स्थिति बनी है और उनमें से कुछ मौकों पर भारतीय मानसून की बारिश सामान्य से कम रही है।
इसलिए मौजूदा मौसम की स्थिति को समझने के लिए अल नीनो महत्वपूर्ण कारक है, लेकिन इसके साथ समुद्री परिस्थितियों, स्थानीय मौसम प्रणालियों और अन्य जलवायु कारकों को भी देखना जरूरी है।
मौसम का यह विरोधाभास किसानों के लिए बड़ी चुनौती
भारत की बड़ी आबादी आज भी खेती और उससे जुड़े कामों पर निर्भर है। ऐसे में बारिश का असमान वितरण किसानों के लिए बड़ी चुनौती बन सकता है।
जिन इलाकों में बारिश कम हुई है, वहां बुआई, फसल की वृद्धि और मिट्टी की नमी प्रभावित हो सकती है। वहीं जिन क्षेत्रों में अत्यधिक बारिश हुई है, वहां खेतों में पानी भरने, फसल गलने और कटाव जैसी समस्याएं पैदा हो सकती हैं।
इस तरह एक ही मौसम में किसानों को दो बिल्कुल अलग समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है—पानी की कमी और जरूरत से ज्यादा पानी।
जल संसाधनों पर भी पड़ेगा असर
कम बारिश वाले जिलों में जलाशयों और भूजल पर दबाव बढ़ सकता है। यदि बारिश की कमी लंबे समय तक रहती है तो पीने के पानी और सिंचाई के लिए उपलब्ध संसाधनों पर भी असर पड़ सकता है।
इसके विपरीत अत्यधिक बारिश वाले इलाकों में अचानक पानी बढ़ने से बाढ़ और जलभराव की स्थिति पैदा हो सकती है। हालांकि भारी बारिश का हर मामला बाढ़ में नहीं बदलता, लेकिन संवेदनशील क्षेत्रों में जोखिम जरूर बढ़ जाता है।
पहले भी जताई गई थी अल नीनो को लेकर चिंता
2026 के मानसून से पहले ही मौसम और कृषि से जुड़े विभागों की ओर से अल नीनो के संभावित प्रभाव को लेकर तैयारी शुरू कर दी गई थी।
केंद्र सरकार ने भी मानसून की स्थिति, वर्षा की कमी वाले जिलों और खरीफ फसलों की स्थिति की समीक्षा की थी। जुलाई में सरकार ने बताया था कि बारिश में सुधार के बाद वर्षा की कमी वाले जिलों की संख्या पहले की तुलना में कम हुई थी, लेकिन अल नीनो के कारण मानसून की अनिश्चितता पर नजर रखी जा रही थी।
क्या अल नीनो से पूरे भारत में सूखा पड़ेगा?
ऐसा सीधे तौर पर कहना सही नहीं होगा।
अल नीनो भारतीय मानसून को प्रभावित कर सकता है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि देश के हर हिस्से में बारिश कम ही होगी। मौजूदा आंकड़े खुद इसका उदाहरण हैं—एक तरफ 218 जिलों में सूखे जैसी स्थिति है तो दूसरी तरफ 86 जिलों में अत्यधिक बारिश हुई है।
यानी समस्या सिर्फ कुल बारिश की मात्रा नहीं है, बल्कि बारिश कब, कहां और कितनी हुई, यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
मौसम के बदलते पैटर्न पर विशेषज्ञों की नजर
मौसम में बढ़ती चरम स्थितियां वैज्ञानिकों के लिए भी महत्वपूर्ण अध्ययन का विषय हैं। कम समय में बहुत ज्यादा बारिश और लंबे समय तक बारिश की कमी दोनों ही कृषि और जल प्रबंधन के लिए चुनौती पैदा करते हैं।
आने वाले दिनों में बारिश के वितरण में क्या बदलाव आता है, यह काफी महत्वपूर्ण रहेगा। यदि कम बारिश वाले इलाकों में वर्षा होती है तो सूखे जैसी स्थिति में सुधार हो सकता है। वहीं लगातार बारिश वाले इलाकों में जलभराव और बाढ़ का जोखिम बढ़ सकता है।
सरकार और राज्यों के सामने दोहरी चुनौती
मौजूदा परिस्थितियों में प्रशासन को एक साथ दो मोर्चों पर काम करना पड़ सकता है।
कम बारिश वाले क्षेत्रों में किसानों के लिए फसल सलाह, सिंचाई और पानी की उपलब्धता पर ध्यान देना जरूरी होगा। वहीं अत्यधिक बारिश वाले क्षेत्रों में बाढ़ नियंत्रण, राहत, जल निकासी और फसलों को नुकसान से बचाने की तैयारी महत्वपूर्ण होगी।
इसी वजह से मौसम के आंकड़ों की लगातार निगरानी और स्थानीय स्तर पर समय पर निर्णय लेना बेहद जरूरी माना जा रहा है।
आने वाला समय क्यों महत्वपूर्ण?
मानसून के बचे हुए दिनों में बारिश का वितरण इस स्थिति को काफी हद तक बदल सकता है। यदि सूखे जैसे हालात वाले जिलों में पर्याप्त बारिश होती है तो आंकड़ों में सुधार संभव है। दूसरी ओर यदि अत्यधिक बारिश वाले इलाकों में बारिश का दौर जारी रहता है तो बाढ़ और फसल नुकसान की समस्या बढ़ सकती है।
इसलिए फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि देश में कुल कितनी बारिश हुई, बल्कि यह है कि बारिश का वितरण आने वाले दिनों में किस तरह रहता है।
