कमलनाथ के डॉक्यूमेंट तैयार थे, नाम फाइनल हुआ मीनाक्षी का: खराब रणनीति और लेटलतीफी से हाथ से गई राज्यसभा सीट; 4 पॉइंट्स में समझें कांग्रेस का ब्लंडर

दिनांक: 15 जून, 2026

विशेष ब्यूरो, भोपाल: मध्य प्रदेश की सियासत में पिछले कुछ दिनों से जारी हाई-वोल्टेज राज्यसभा चुनाव ड्रामे का बेहद चौंकाने वाला अंत हुआ है। कांग्रेस की घोषित उम्मीदवार मीनाक्षी नटराजन का नामांकन फॉर्म रिटर्निंग ऑफिसर द्वारा खारिज किए जाने के बाद, भारतीय जनता पार्टी (BJP) के तीनों उम्मीदवार (तरुण चुघ, रजनीश अग्रवाल और महेश केवट) निर्विरोध निर्वाचित घोषित कर दिए गए हैं।

इस पूरे घटनाक्रम के बाद राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा तेज है कि पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ के दस्तावेज पूरी तरह तैयार होने के बावजूद ऐन वक्त पर मीनाक्षी नटराजन को टिकट देना और उसके बाद कानूनी बारीकियों को नजरअंदाज करना कांग्रेस को बेहद भारी पड़ा। आइए 4 पॉइंट्स में समझते हैं कि कांग्रेस की रणनीति में कहां और कैसे बड़ी चूक हुई:

1. ‘क्राइसिस मैनेजर’ कमलनाथ का नाम कटा, राहुल गांधी की करीबी मीनाक्षी को मिला टिकट

शुरुआती दौर में मध्य प्रदेश कांग्रेस के सबसे कद्दावर चेहरे और ‘क्राइसिस मैनेजर’ माने जाने वाले कमलनाथ का राज्यसभा जाना लगभग तय माना जा रहा था। उनके समर्थकों ने दिल्ली से लेकर भोपाल तक उनके नाम के दस्तावेज और हलफनामे (Affidavit) की तैयारियां पूरी कर ली थीं। कमलनाथ ने खुद पार्टी हाईकमान को ओडिशा में नवीन पटनायक की पार्टी (BJD) के साथ मिलकर एक अतिरिक्त सीट जिताने का फॉर्मूला भी सुझाया था। लेकिन ऐन वक्त पर केंद्रीय नेतृत्व ने प्रदेश संगठन और स्थानीय विधायकों की राय को दरकिनार करते हुए राहुल गांधी की कोर टीम की सदस्य मीनाक्षी नटराजन के नाम पर मुहर लगा दी, जिससे प्रदेश स्तर के कई नेता और विधायक अंदरूनी तौर पर असहज हो गए।

2. ‘फॉर्म 26’ की अधूरी जानकारी: बीजेपी की कानूनी बिसात में फंसी कांग्रेस

मीनाक्षी नटराजन के नामांकन फॉर्म में कानूनी चूक ही कांग्रेस के लिए सबसे बड़ा आत्मघाती कदम साबित हुई।

  • क्या थी चूक: मीनाक्षी नटराजन के खिलाफ हैदराबाद (तेलंगाना) की एक अदालत से जुड़े मामले का नोटिस/परिवाद जारी हुआ था। बीजेपी के कानूनी धुरंधरों ने इस बात को पकड़ लिया और स्क्रूटनी के दौरान इस पर आपत्ति दर्ज कराई।
  • रिटर्निंग ऑफिसर का फैसला: नियमों के मुताबिक, ‘फॉर्म 26’ के हलफनामे में उम्मीदवार को अपने खिलाफ लंबित किसी भी न्यायिक या कानूनी मामले/नोटिस की जानकारी सार्वजनिक करनी होती है। मीनाक्षी के फॉर्म में यह जानकारी छिपाई गई थी। मध्य प्रदेश विधानसभा के प्रमुख सचिव और रिटर्निंग ऑफिसर ने इसे ‘गंभीर त्रुटि’ मानते हुए उनका पर्चा खारिज कर दिया।

3. विधायकों को बेंगलुरु शिफ्ट करने की लेटलतीफी और रनवे से लौटा प्लेन

कांग्रेस को अपने विधायकों में क्रॉस-वोटिंग और बीजेपी द्वारा ‘ऑपरेशन लोटस’ चलाए जाने का गहरा डर था। इसके लिए कांग्रेस ने बेहद गोपनीय तरीके से अपने सभी विधायकों को चार्टर्ड प्लेन से बेंगलुरु (कर्नाटक) शिफ्ट करने की योजना बनाई थी। भोपाल एयरपोर्ट पर प्राइवेट प्लेन आ भी चुका था और विधायक उसमें सवार हो चुके थे। लेकिन कांग्रेस इस रणनीति में बहुत देर कर चुकी थी। जब तक प्लेन उड़ान भरता, तब तक विधानसभा परिसर में बीजेपी के कैलाश विजयवर्गीय और वीडी शर्मा जैसे कद्दावर नेताओं की मौजूदगी में रिटर्निंग ऑफिसर ने नामांकन खारिज करने का आदेश सुना दिया। इसके तुरंत बाद विधायकों से भरा प्लेन रनवे से बिना उड़ान भरे वापस लौट आया।

4. आंतरिक कलह और डैमेज कंट्रोल में नाकामी

मीनाक्षी नटराजन की उम्मीदवारी घोषित होते ही कांग्रेस के भीतर बगावत के सुर तेज हो गए थे। वरिष्ठ नेता नरेश ज्ञानचंदानी ने सार्वजनिक रूप से ट्वीट कर राहुल गांधी को चेताया था कि स्थानीय कार्यकर्ताओं की अनदेखी से क्रॉस-वोटिंग का खतरा है और बाद में उन्होंने पार्टी से इस्तीफा भी दे दिया। जीतू पटवारी और उमंग सिंघार भले ही मंचों से एकजुटता का दावा कर रहे थे, लेकिन जमीनी स्तर पर समन्वय की भारी कमी दिखी। कांग्रेस के रणनीतिकार यह भांपने में पूरी तरह नाकाम रहे कि पर्याप्त संख्या बल (61 विधायक) होने के बावजूद कानूनी मोर्चे पर बीजेपी उनके खिलाफ इतनी बड़ी घेराबंदी कर रही है।

कांग्रेस का स्टैंड: प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी ने इसे भारतीय लोकतंत्र का काला दिन बताते हुए कहा, “बीजेपी हमारे विधायकों की चट्टानी एकजुटता से डर गई थी, इसलिए उन्होंने षड्यंत्र रचकर पंचायत चुनाव की तरह राज्यसभा का पर्चा खारिज करवाया है। यह ‘सीट की चोरी’ है।” कांग्रेस अब इस मामले को लेकर कोर्ट और चुनाव आयोग के चक्कर काट रही है, लेकिन फिलहाल बाजी पूरी तरह कांग्रेस के हाथ से फिसल चुकी है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *