दक्षिण चीन सागर पर अंतरराष्ट्रीय घेराबंदी: 14 देशों के संयुक्त बयान से भड़का चीन; बीजिंग में जापानी राजनयिक को किया तलब

स्थान: बीजिंग

दिनांक: 13 जुलाई, 2026

अंतरराष्ट्रीय ब्यूरो:

दक्षिण चीन सागर (South China Sea) के विवादित जल क्षेत्र को लेकर चीन और दुनिया के प्रमुख देशों के बीच कूटनीतिक तनाव एक बार फिर चरम पर पहुंच गया है। 2016 के ऐतिहासिक ‘आर्बिट्रेशन ट्रिब्यूनल’ के फैसले के 10 साल पूरे होने पर अमेरिका, ब्रिटेन, जापान, ऑस्ट्रेलिया और फिलीपींस सहित 14 देशों ने एक संयुक्त बयान जारी कर चीन के व्यापक समुद्री दावों को ‘गैर-कानूनी’ करार दिया है।

इस कूटनीतिक हमले से बौखलाए बीजिंग ने रविवार को बीजिंग स्थित जापानी दूतावास के एक वरिष्ठ राजनयिक को तलब कर कड़ा विरोध दर्ज कराया। चीन का आरोप है कि जापान और अन्य देश जानबूझकर क्षेत्र में अस्थिरता फैला रहे हैं और उसके संप्रभु अधिकारों में हस्तक्षेप कर रहे हैं।

बयान में क्या है?—चीन के लिए झटका

इन 14 देशों ने अपने संयुक्त बयान में 12 जुलाई 2016 के उस फैसले को दोहराया है, जिसमें हेग स्थित मध्यस्थता न्यायाधिकरण ने दक्षिण चीन सागर पर चीन के ‘नाइन-डैश लाइन’ (Nine-Dash Line) के दावों को अंतरराष्ट्रीय कानून (UNCLOS) के तहत आधारहीन बताया था।

  • अवैध दावे: बयान में स्पष्ट कहा गया कि दक्षिण चीन सागर पर चीन के ‘ऐतिहासिक अधिकारों’ के दावों का कोई कानूनी आधार नहीं है।
  • तनावपूर्ण कार्रवाई का विरोध: इन देशों ने विवादित क्षेत्रों में चीन द्वारा कोस्ट गार्ड, सैन्य जहाजों और समुद्री मिलिशिया के इस्तेमाल की कड़ी निंदा की है, जिनका उपयोग अन्य देशों के मछुआरों और नौसैनिक अभियानों को डराने-धमकाने के लिए किया जाता है।
  • यूरोपीय संघ का समर्थन: 27 देशों के यूरोपीय संघ (EU) ने भी एक अलग बयान जारी कर इस फैसले को ‘शांतिपूर्ण समाधान के लिए मील का पत्थर’ बताते हुए अपना समर्थन दोहराया है।

चीन की प्रतिक्रिया: “फैसला कागज का टुकड़ा है”

चीनी विदेश मंत्रालय ने इन बयानों को सिरे से खारिज करते हुए इसे ‘क्षेत्र में शांति बिगाड़ने की साजिश’ करार दिया है। मंत्रालय के प्रवक्ता ने तीखे शब्दों में कहा:

“यह तथाकथित पंचाट का फैसला अवैध, शून्य और बेकार कागज का टुकड़ा है। चीन इसे न स्वीकार करता है और न मान्यता देता है। चीन अपनी क्षेत्रीय संप्रभुता की रक्षा के लिए संकल्पित है और किसी भी बाहरी शक्ति के दबाव में नहीं झुकेगा।”

बीजिंग ने जापान पर विशेष रूप से निशाना साधते हुए कहा कि उसे इतिहास के अपने आक्रामक दौर को याद रखना चाहिए और दक्षिण चीन सागर के मामलों में दखल देने से बचना चाहिए। चीन ने इसे जापान का ‘नव-सैन्यवादी एजेंडा’ (Neo-militarist agenda) करार दिया है।

विवाद का प्रमुख केंद्र: दक्षिण चीन सागर

यह क्षेत्र दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण व्यापारिक मार्गों में से एक है, जहां से प्रतिवर्ष ट्रिलियन डॉलर का व्यापार होता है। 2016 के ट्रिब्यूनल के फैसले के बाद से ही चीन और फिलीपींस समेत अन्य दक्षिण-पूर्वी एशियाई देशों के बीच यहां छिटपुट झड़पें और टकराव आम हो गए हैं।

पक्षमुख्य तर्क
चीन‘ऐतिहासिक तथ्यों’ और ‘ऐतिहासिक अधिकारों’ के आधार पर लगभग पूरे समुद्र पर अपना दावा करता है।
14 देश और EUUNCLOS (समुद्री कानून पर संयुक्त राष्ट्र संधि) को अंतरराष्ट्रीय मानक मानते हैं और 2016 के फैसले को बाध्यकारी बताते हैं।

राजनयिकों का मानना है कि 10 साल बाद इस मुद्दे पर दुनिया भर के देशों का लामबंद होना चीन की क्षेत्रीय विस्तारवादी नीतियों के लिए एक बड़ा कूटनीतिक झटका है। वाशिंगटन और बीजिंग के बीच इस नए कूटनीतिक टकराव ने हिंद-प्रशांत क्षेत्र में सुरक्षा चिंताएं बढ़ा दी हैं।

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