स्थान: नई दिल्ली
दिनांक: 13 जुलाई, 2026
विधि संवाददाता: सर्वोच्च न्यायालय ने सोमवार को तमिलनाडु में गोवंश हत्या पर पूरी तरह रोक लगाने संबंधी मद्रास हाईकोर्ट के आदेश पर अंतरिम रोक (Stay) लगा दी है। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की खंडपीठ ने इस मामले में राज्य सरकार की विशेष अनुमति याचिका (SLP) पर सुनवाई करते हुए यह निर्देश जारी किए। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि हाईकोर्ट के उस आदेश के अंतिम पैराग्राफ में सुधार की आवश्यकता है, जिसमें राज्य भर में गोवंश की हत्या पर ‘ब्लैंकेट बैन’ (पूर्ण प्रतिबंध) लगा दिया गया था।
क्या था विवाद और हाईकोर्ट का तर्क?
मद्रास हाईकोर्ट ने 27 मई, 2026 को बकरीद के मौके पर और उसके बाद भी राज्य में गोवंश की हत्या पर पूर्ण प्रतिबंध का आदेश दिया था। हाईकोर्ट ने अपने फैसले में तर्क दिया था कि:
- इस्लाम में अनिवार्य नहीं: हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का हवाला देते हुए कहा था कि बकरीद के मौके पर गोवंश की कुर्बानी देना इस्लाम में कोई ‘अनिवार्य धार्मिक प्रथा’ (Essential Religious Practice) नहीं है।
- कानूनी प्रावधान: कोर्ट ने ‘तमिलनाडु पशु संरक्षण अधिनियम, 1958’ का उल्लेख करते हुए कहा था कि गोवंश की हत्या केवल तभी की जा सकती है जब वह 10 वर्ष से अधिक आयु का हो, काम करने या प्रजनन में अक्षम हो, या किसी लाइलाज बीमारी से ग्रस्त हो। हाईकोर्ट ने अधिकारियों को निर्देश दिया था कि किसी भी पशु की हत्या केवल अधिकृत बूचड़खानों में ही हो।
राज्य सरकार की दलील और सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी
तमिलनाडु सरकार ने हाईकोर्ट के आदेश को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट में तर्क दिया कि यह फैसला कानूनी रूप से विरोधाभासी है। राज्य सरकार ने अपनी याचिका में कहा:
- कानूनी उल्लंघन: जब राज्य का कानून (तमिलनाडु पशु संरक्षण अधिनियम) विशिष्ट परिस्थितियों में गोवंश की हत्या की अनुमति देता है, तो हाईकोर्ट का ‘पूर्ण प्रतिबंध’ का निर्देश वैधानिक प्रावधानों के विपरीत है।
- अधिकार क्षेत्र का मामला: सरकार ने आपत्ति जताई कि हाईकोर्ट ने एक ऐसी सरकारी अधिसूचना (Government Order) का सहारा लिया, जिसकी वैधता या प्रयोज्यता कभी विवाद का विषय ही नहीं थी।
- अदालत का अवलोकन: सुप्रीम कोर्ट ने याचिका पर सुनवाई के दौरान मौखिक रूप से टिप्पणी की कि हाईकोर्ट के फैसले का अंतिम भाग—जो राज्यव्यापी प्रतिबंध लगाता है—प्रथम दृष्टया “सुधार के योग्य” है।
अब आगे क्या?
सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार की याचिका पर नोटिस जारी कर दिया है और मामले की अगली सुनवाई तक हाईकोर्ट के आदेश के कार्यान्वयन पर रोक लगा दी है। इस आदेश के बाद अब कानूनी स्थिति पहले की तरह बनी रहेगी, जहाँ ‘तमिलनाडु पशु संरक्षण अधिनियम, 1958’ के तहत तय किए गए मानकों के आधार पर ही पशु वध से संबंधित गतिविधियां संचालित होंगी।
यह मामला देश भर में धार्मिक स्वतंत्रता बनाम वैधानिक पशु संरक्षण कानूनों के बीच चल रही बहस के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
