भोपाल / उज्जैन | 6 अगस्त, 2026
भारतीय उच्च शिक्षा के इतिहास में मध्य प्रदेश के उज्जैन शहर की एक खौफनाक घटना काले अध्याय के रूप में दर्ज है, जिसने न केवल राज्य बल्कि देश की चुनावी और प्रशासनिक व्यवस्था को हिलाकर रख दिया था। उज्जैन के माधव कॉलेज में प्रोफेसर हरभजन सिंह सभरवाल की हत्या के बाद उपजे विवादों के कारण कॉलेजों में छात्रसंघ चुनावों की रूपरेखा हमेशा के लिए बदल गई। इस एक घटना के बाद सुरक्षा और राजनीतिक उठापटक के चलते प्रदेशभर में प्रत्यक्ष छात्रसंघ चुनाव अनिश्चितकाल के लिए बंद कर दिए गए, जो बाद में लंबे कानूनी और प्रशासनिक दांवपेंच में उलझ गए।
1. उज्जैन का वह काला दिन: जब प्रोफेसर की हत्या से बदली व्यवस्था
साल 2006 का वह दौर उच्च शिक्षा संस्थानों में राजनीतिक हिंसा का सबसे डरावना चेहरा लेकर आया था:
- माधव कॉलेज की घटना: उज्जैन के शासकीय माधव कॉलेज में छात्रसंघ चुनावों के दौरान उपजे भारी तनाव और हिंसा के बीच प्रोफेसर एच.एस. सभरवाल पर हमला हुआ, जिसके बाद उनकी असामयिक मृत्यु हो गई। इस सनसनीखेज कांड ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया था।
- चुनावी प्रणाली में बदलाव: इस घटना की गूंज देश की राजधानी तक सुनाई दी। सुरक्षा और परिसरों में बढ़ते राजनीतिक टकराव को रोकने के लिए सरकार और विश्वविद्यालयों को सख्त कदम उठाने पड़े। पहले जहां प्रत्यक्ष चुनाव होते थे, उन्हें बदलकर अप्रत्यक्ष प्रणाली (कक्षा प्रतिनिधियों द्वारा चुनाव) लाया गया, लेकिन तनाव कम न होने पर धीरे-धीरे चुनाव प्रक्रिया पर पूरी तरह रोक लगा दी गई।
2. नौ साल तक क्यों बंद रहे छात्रसंघ चुनाव?
प्रोफेसर सभरवाल हत्याकांड के बाद उपजे कानूनी मामलों, सुरक्षा संबंधी चिंताओं और राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी के कारण मध्य प्रदेश सहित कई जगहों पर छात्रसंघ चुनावों पर लगभग एक दशक (9 वर्षों) तक पूरी तरह ताला लगा रहा:
- नेतृत्व का शून्य: चुनाव न होने के कारण शिक्षण संस्थानों में छात्रों की आवाज़ उठाने वाला आधिकारिक नेतृत्व उभर नहीं पाया।
- हालांकि, हाल ही में अदालती हस्तक्षेप और नई प्रशासनिक सुगबुगाहट के बाद शैक्षणिक संस्थानों में लोकतांत्रिक प्रक्रिया को फिर से बहाल करने की दिशा में रास्ते खुलने की खबरें सामने आ रही हैं, जिससे छात्र राजनीति से जुड़े युवाओं में एक नई उम्मीद जगी है।
3. सबसे बड़ा सवाल: जब चुनाव हुए ही नहीं, तो करोड़ों की फीस क्यों वसूली गई?
इस पूरे घटनाक्रम के बीच सबसे बड़ा और गंभीर सवाल यह खड़ा हुआ है कि बिना चुनाव के छात्रों के अधिकारों का हनन तो हुआ ही, साथ ही आर्थिक शोषण भी हुआ:
- छात्रसंघ शुल्क (Student Union Fee): विभिन्न विश्वविद्यालयों और कॉलेजों द्वारा हर साल प्रवेश के समय नियमित रूप से ‘छात्रसंघ शुल्क’ के नाम पर हर छात्र से पैसे वसूले जाते रहे।
- करोड़ों का फंड: जानकारों और याचिकाकर्ताओं का कहना है कि जब पिछले कई सालों से प्रदेश में छात्रसंघ के चुनाव कराए ही नहीं गए और किसी प्रकार की यूनियन गतिविधियां आयोजित नहीं हुईं, तो छात्रों से वसूला गया वह करोड़ों रुपये का फंड कहां गया?
- यह रकम विद्यार्थियों के हितों में खर्च होने के बजाय विश्वविद्यालयों के खातों में निष्क्रिय पड़ी रही या अन्य प्रशासनिक कार्यों में उपयोग की जाती रही।
उज्जैन की उस दर्दनाक घटना ने शिक्षा के मंदिरों में सुरक्षा के पुख्ता इंतजामों की सीख तो दी, लेकिन साथ ही व्यवस्था की मनमानी और छात्रों के आर्थिक दोहन के कई अनसुलझे सवाल पीछे छोड़ दिए, जिन पर आज भी जवाब मांगा जा रहा है।
