महिला अधिकारों पर इंदौर हाई कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: ‘गर्भ रखना या नहीं, यह पूर्णतः महिला का निर्णय; पति की सहमति अनिवार्य नहीं’

स्थान: इंदौर

दिनांक: 6 जुलाई, 2026

विधिक संवाददाता, इंदौर:

मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की इंदौर खंडपीठ (Indore Bench) ने महिलाओं के प्रजनन अधिकारों (Reproductive Rights) को लेकर एक बेहद प्रगतिशील और ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट और कड़े शब्दों में कहा है कि किसी महिला को उसकी इच्छा के विरुद्ध मातृत्व (Motherhood) स्वीकार करने या गर्भधारण जारी रखने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। दंपती के बीच चल रहे गंभीर वैवाहिक विवाद के एक मामले की सुनवाई करते हुए हाई कोर्ट ने साफ किया कि वैधानिक समय-सीमा के भीतर गर्भपात (Abortion) कराने के लिए महिला को पति की सहमति (Consent) की कोई आवश्यकता नहीं है

जस्टिस संदीप एन. भट्ट की एकल पीठ ने याचिकाकर्ता महिला को ‘मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी एक्ट’ (MTP Act) के तहत सुरक्षित और कानूनी तरीके से गर्भपात कराने की अनुमति दे दी है।

हाई कोर्ट की मुख्य टिप्पणियां: क्यों पति की सहमति नहीं है जरूरी?

सुनवाई के दौरान अदालत ने भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 (Right to Life and Personal Liberty) का हवाला देते हुए महिला की शारीरिक संप्रभुता और निजता के अधिकार को सर्वोपरि माना।

  • घटनात्मक और वैधानिक अधिकार: पीठ ने अपने आदेश में कहा कि किसी भी अनिच्छित गर्भधारणा (Unwanted Pregnancy) का सबसे गहरा मानसिक, शारीरिक और भावनात्मक असर सीधे तौर पर महिला पर ही पड़ता है। इसलिए, गर्भ को आगे बढ़ाना है या नहीं, यह पूरी तरह से उस महिला का वैव्यावहारिक और संवैधानिक अधिकार है।
  • पति की अनुपस्थिति और असहमति बेअसर: अदालत ने सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के पति को भी अपना पक्ष रखने के लिए औपचारिक नोटिस जारी किया था, लेकिन वह किसी भी सुनवाई में उपस्थित नहीं हुआ। इस पर कोर्ट ने सख्त रुख अपनाते हुए कहा कि जब बात महिला के शारीरिक अधिकारों की हो, तो ऐसे संवेदनशील मामलों में पति की अनुपस्थिति या असहमति पूरी तरह से अप्रासंगिक (Insignificant) हो जाती है।

वैवाहिक तनाव और 13 सप्ताह का गर्भ: क्या था पूरा मामला?

यह याचिका इंदौर संभाग की रहने वाली एक उच्च शिक्षित विवाहित महिला द्वारा दायर की गई थी।

याचिका का मुख्य आधार:

महिला का विवाह करीब दो साल पहले हुआ था, लेकिन शादी के कुछ समय बाद ही दंपती के बीच तीखे मतभेद और विवाद शुरू हो गए। तनाव इस कदर बढ़ा कि दोनों पिछले कुछ समय से पूरी तरह अलग रह रहे थे। इसी अलगाव के दौरान महिला को अपने 13 सप्ताह और 1 दिन के गर्भवती होने का पता चला। महिला ने अपने वकील गोविंद पाल सिंह सोंगरा के माध्यम से कोर्ट को बताया कि चूंकि वैवाहिक रिश्ता पूरी तरह टूट चुका है और वे अलग रह रहे हैं, ऐसे में बच्चे को जन्म देना और अकेले उसका पालन-पोषण करना उनके लिए मानसिक, सामाजिक और भावनात्मक रूप से अत्यंत कष्टकारी साबित होगा।

सुप्रीम कोर्ट के ‘एक्स बनाम प्रधान सचिव’ फैसले का दिया हवाला

कानूनी बिंदुएमटीपी एक्ट (MTP Act, 1971) के नियमहाई कोर्ट का वर्तमान दिशा-निर्देश
गर्भ की समय-सीमा20 से 24 सप्ताह तक (विशेष श्रेणियों के लिए वैध)।महिला का गर्भ 13 सप्ताह का है, जो कि पूरी तरह कानूनी दायरे के भीतर सुरक्षित है।
वैवाहिक स्थिति में बदलावतलाक या विधवा होने पर गर्भपात की अनुमति।कोर्ट ने माना कि गंभीर वैवाहिक विवाद और अलगाव भी महिला के मानसिक स्वास्थ्य के लिए वैध आधार हैं।

इंदौर हाई कोर्ट ने देश की सर्वोच्च अदालत (Supreme Court) के ऐतिहासिक ‘एक्स बनाम प्रधान सचिव, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग’ मामले के नजीर का उल्लेख किया, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने माना था कि विवाहित हो या अविवाहित, हर महिला को सुरक्षित गर्भपात का समान अधिकार है।

अदालत ने संबंधित डॉक्टरों और स्वास्थ्य विभाग को पूरी गोपनीयता (Privacy) और संवेदनशीलता बनाए रखते हुए स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा निर्धारित सभी सुरक्षा गाइडलाइंस के तहत इस प्रक्रिया को संपन्न कराने के निर्देश दिए हैं। कानूनी विशेषज्ञों ने इस फैसले का स्वागत करते हुए कहा है कि यह आदेश वैवाहिक विवादों में महिलाओं को उनके बुनियादी मानवाधिकारों के संरक्षण की दिशा में एक बड़ा और मजबूत संबल प्रदान करेगा।

इंदौर हाई कोर्ट के इस ऐतिहासिक निर्णय की विस्तृत कानूनी कॉपी, मध्य प्रदेश स्वास्थ्य विभाग की नई मेडिकल गाइडलाइंस और देश के प्रमुख कानूनी संशोधनों

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