पितृ पक्ष 2026: शनिवार से शुरुआत, शनिवार को समापन; जानें 15 या 16 दिन का होगा श्राद्ध

नई दिल्ली, 23 सितंबर 2026। हिंदू धर्म में पितृ पक्ष का विशेष धार्मिक महत्व माना जाता है। यह समय पूर्वजों के प्रति श्रद्धा व्यक्त करने, तर्पण, पिंडदान और श्राद्ध कर्म करने के लिए समर्पित माना जाता है। वर्ष 2026 में पितृ पक्ष को लेकर लोगों के बीच 15 या 16 दिनों की अवधि को लेकर सवाल बना हुआ है। इस बार भाद्रपद पूर्णिमा का श्राद्ध 26 सितंबर, शनिवार को होगा और सर्वपितृ अमावस्या 10 अक्टूबर, शनिवार को पड़ेगी।

26 सितंबर को पूर्णिमा श्राद्ध से शुरुआत

पितृ पक्ष की शुरुआत को लेकर दो तारीखें सामने आती हैं। 26 सितंबर को भाद्रपद पूर्णिमा श्राद्ध किया जाएगा। इसके अगले दिन यानी 27 सितंबर को आश्विन कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा होगी, जिसे नियमित श्राद्ध पक्ष की शुरुआत माना जाता है।

इसलिए अगर पूर्णिमा श्राद्ध को भी शामिल किया जाए तो अवधि 16 दिनों की मानी जाती है। वहीं प्रतिपदा से अमावस्या तक गिनती करने पर यह अवधि 15 दिनों की रहती है।

इस बार शनिवार से शनिवार तक रहेगा पितृ पक्ष

2026 में एक खास संयोग यह है कि 26 सितंबर शनिवार को पूर्णिमा श्राद्ध होगा और 10 अक्टूबर शनिवार को सर्वपितृ अमावस्या के साथ इसका समापन होगा।

सर्वपितृ अमावस्या उन पूर्वजों के लिए श्राद्ध और तर्पण करने का महत्वपूर्ण दिन माना जाता है, जिनकी मृत्यु की तिथि ज्ञात न हो या जिनका श्राद्ध किसी कारण से निर्धारित तिथि पर न किया जा सका हो।

पितृ पक्ष 2026 की पूरी श्राद्ध तिथि सूची

26 सितंबर, शनिवार — भाद्रपद पूर्णिमा श्राद्ध

27 सितंबर, रविवार — प्रतिपदा श्राद्ध

28 सितंबर, सोमवार — द्वितीया श्राद्ध

29 सितंबर, मंगलवार — तृतीया श्राद्ध

30 सितंबर, बुधवार — चतुर्थी और पंचमी श्राद्ध

1 अक्टूबर, गुरुवार — षष्ठी श्राद्ध

2 अक्टूबर, शुक्रवार — सप्तमी श्राद्ध

3 अक्टूबर, शनिवार — अष्टमी श्राद्ध

4 अक्टूबर, रविवार — नवमी श्राद्ध / मातृ नवमी

5 अक्टूबर, सोमवार — दशमी श्राद्ध

6 अक्टूबर, मंगलवार — एकादशी श्राद्ध

7 अक्टूबर, बुधवार — द्वादशी श्राद्ध

8 अक्टूबर, गुरुवार — त्रयोदशी श्राद्ध

9 अक्टूबर, शुक्रवार — चतुर्दशी श्राद्ध

10 अक्टूबर, शनिवार — सर्वपितृ अमावस्या

किस दिन किसका श्राद्ध किया जाता है?

पितृ पक्ष में सामान्य तौर पर जिस तिथि को किसी व्यक्ति का निधन हुआ हो, उसी तिथि के अनुसार उसका श्राद्ध किया जाता है। उदाहरण के लिए यदि किसी परिजन का देहांत कृष्ण पक्ष की द्वितीया तिथि को हुआ था, तो पितृ पक्ष की द्वितीया तिथि पर उनका श्राद्ध किया जाता है।

मातृ नवमी का विशेष महत्व माना जाता है। इस दिन परिवार की दिवंगत माताओं और महिला पूर्वजों के लिए श्राद्ध कर्म करने की परंपरा है।

वहीं चतुर्दशी को अकाल या असामान्य परिस्थितियों में मृत्यु को प्राप्त हुए लोगों के लिए श्राद्ध किए जाने की परंपरा बताई जाती है।

अगर किसी पूर्वज की मृत्यु की तिथि मालूम न हो, तो सर्वपितृ अमावस्या पर उनका श्राद्ध किया जा सकता है।

पितृ पक्ष में तर्पण और पिंडदान का महत्व

पितृ पक्ष के दौरान लोग अपने पूर्वजों के लिए तर्पण, पिंडदान, श्राद्ध, ब्राह्मण भोजन और दान-पुण्य करते हैं। धार्मिक परंपरा के अनुसार तर्पण में जल और काले तिल का प्रयोग किया जाता है।

कई परिवार अपनी पारिवारिक परंपरा और स्थानीय रीति के अनुसार श्राद्ध कर्म करते हैं। इसलिए किसी विशेष श्राद्ध की विधि के लिए परिवार की परंपरा और स्थानीय पंचांग को ध्यान में रखना उचित माना जाता है।

श्राद्ध कर्म में किन बातों का ध्यान रखें?

पितृ पक्ष के दौरान धार्मिक मान्यताओं के अनुसार सात्विक जीवनशैली अपनाने और पूर्वजों के प्रति श्रद्धा रखने पर जोर दिया जाता है। तर्पण और श्राद्ध कर्म के लिए निर्धारित तिथि का ध्यान रखना महत्वपूर्ण होता है।

श्राद्ध कर्म के दौरान जरूरतमंदों को भोजन कराना, अन्न-वस्त्र का दान करना और पशु-पक्षियों के लिए भोजन-पानी की व्यवस्था करना भी कई परिवारों की परंपरा का हिस्सा है।

15 दिन या 16 दिन, क्या है सही?

2026 में दोनों तरह की गणना देखने को मिल रही है। 26 सितंबर की पूर्णिमा को शामिल करने पर 16 दिनों की अवधि बनती है, जबकि 27 सितंबर की प्रतिपदा से 10 अक्टूबर की अमावस्या तक गिनने पर 15 दिन होते हैं।

इसलिए इसे केवल 15 या केवल 16 दिन कहने के बजाय यह समझना जरूरी है कि पूर्णिमा श्राद्ध और नियमित पितृ पक्ष की गणना अलग तरीके से की जाती है। स्थानीय पंचांग के अनुसार तिथि निर्धारित करके श्राद्ध करना अधिक उचित रहेगा।

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