पुणे, 22 सितंबर 2026। महाराष्ट्र के पुणे से होकर बहने वाली मुळा-मुठा नदी में बढ़ता शहरी प्रदूषण अब नदी के जलीय पारिस्थितिकी तंत्र को प्रभावित कर रहा है। हालिया वैज्ञानिक अध्ययन में सामने आया है कि मानसून के दौरान नदी में पानी का बहाव बढ़ने के बावजूद शहरी गतिविधियों से जुड़ा प्रदूषण नदी के सूक्ष्म जलीय जीवन पर लगातार असर डाल रहा है।
वैज्ञानिकों ने नदी बेसिन में पाए जाने वाले डायटम्स यानी सूक्ष्म जलीय शैवाल समुदायों का अध्ययन किया। इन सूक्ष्म जीवों को पानी की पर्यावरणीय स्थिति का महत्वपूर्ण संकेतक माना जाता है। अध्ययन के परिणामों से पता चला कि नदी के अलग-अलग हिस्सों में मौजूद प्रदूषण और मानवीय गतिविधियों का प्रभाव जलीय समुदायों की संरचना में स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।
मानसून के पानी से भी नहीं सुधरी स्थिति
आमतौर पर मानसून के दौरान भारी बारिश और नदी में बढ़े जलप्रवाह से प्रदूषकों का प्रभाव कुछ हद तक कम होने की उम्मीद रहती है। तेज बहाव प्रदूषित पानी को आगे ले जाता है और नदी में पानी की मात्रा बढ़ने से कुछ प्रदूषकों का सांद्रण कम हो सकता है।
लेकिन मुळा-मुठा नदी बेसिन में स्थिति अलग दिखाई दी। अध्ययन के अनुसार, मानसून की प्राकृतिक जलधारा के मुकाबले लगातार बनी रहने वाली शहरी प्रदूषण की स्थिति नदी के जलीय समुदायों को अधिक प्रभावित कर रही है।
इससे संकेत मिलता है कि केवल मानसून के दौरान नदी में पानी का प्रवाह बढ़ना नदी के पारिस्थितिकी तंत्र को स्वस्थ करने के लिए पर्याप्त नहीं है।
डायटम्स में आया बदलाव बना चिंता का कारण
अध्ययन में नदी के अलग-अलग हिस्सों में डायटम समुदायों की संरचना का विश्लेषण किया गया। डायटम्स पानी की पर्यावरणीय परिस्थितियों के प्रति संवेदनशील होते हैं और इनके समुदाय में होने वाले बदलाव से नदी की स्थिति के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी मिल सकती है।
शोधकर्ताओं ने पाया कि नदी के विभिन्न हिस्सों में डायटम समुदायों में स्पष्ट अंतर मौजूद है। शहरी प्रभाव और प्रदूषण वाले क्षेत्रों में ऐसे जीवों की मौजूदगी बढ़ी जो कठिन पर्यावरणीय परिस्थितियों को सहन कर सकते हैं, जबकि संवेदनशील प्रजातियों के लिए परिस्थितियां प्रतिकूल होती जा रही हैं।
यह बदलाव नदी के पारिस्थितिक संतुलन पर लंबे समय से पड़ रहे दबाव का संकेत माना जा रहा है।
सीवेज और शहरी गतिविधियां बड़ी चुनौती
मुळा-मुठा नदी पुणे के घनी आबादी वाले शहरी क्षेत्र से होकर गुजरती है। शहर के विस्तार, सीवेज, औद्योगिक गतिविधियों और शहरी बहाव से नदी पर लगातार दबाव बना हुआ है।
2026 में प्रकाशित एक अन्य जल गुणवत्ता अध्ययन में भी नदी के अलग-अलग हिस्सों में कम घुलित ऑक्सीजन (DO), अधिक BOD और COD तथा पोषक तत्वों की बढ़ी हुई मात्रा जैसी समस्याएं दर्ज की गईं। शोध में औद्योगिक अपशिष्ट, सीवेज और शहरी बहाव को प्रदूषण के प्रमुख मानवीय स्रोतों से जोड़ा गया।
पानी में ऑक्सीजन का स्तर कम होना जलीय जीवों के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण समस्या है, क्योंकि कई जलीय जीवों को जीवित रहने के लिए पर्याप्त घुलित ऑक्सीजन की आवश्यकता होती है।
नदी के अलग-अलग हिस्सों में प्रदूषण का असर अलग
मुळा-मुठा नदी तंत्र पर किए गए एक अन्य अध्ययन में पुणे महानगर क्षेत्र के 13 स्थानों से पांच वर्षों के दौरान लिए गए पानी के नमूनों का विश्लेषण किया गया। अध्ययन में नदी के शहरी और डाउनस्ट्रीम हिस्सों में प्रदूषण की स्थिति अधिक गंभीर पाई गई।
शोध में BOD और अन्य प्रदूषण संकेतकों में महत्वपूर्ण बदलाव दर्ज किए गए। कुछ शहरी संगम क्षेत्रों को खराब जल गुणवत्ता वाले क्षेत्र के रूप में चिन्हित किया गया।
इससे पता चलता है कि नदी की पूरी लंबाई में प्रदूषण एक जैसा नहीं है, बल्कि शहर और मानवीय गतिविधियों के प्रभाव वाले हिस्सों में समस्या अधिक गंभीर हो सकती है।
पानी की गुणवत्ता पर भी उठे सवाल
मुळा-मुठा नदी को लेकर 2026 में सामने आए विभिन्न वैज्ञानिक अध्ययनों में पानी की गुणवत्ता और प्रदूषण को लेकर चिंता जताई गई है।
एक अध्ययन में नदी के पानी में फॉस्फेट की अधिक मात्रा और कुछ स्थानों पर उच्च प्रदूषण सूचकांक दर्ज किया गया। अत्यधिक पोषक तत्व नदी में यूट्रोफिकेशन यानी पोषक तत्वों की अधिकता से होने वाली पारिस्थितिक समस्या को बढ़ा सकते हैं।
वहीं, नदी के कुछ हिस्सों में भारी धातुओं और प्रदूषण से जुड़े सूक्ष्मजीवों की मौजूदगी पर भी अलग-अलग शोध हुए हैं।
सिर्फ बारिश के भरोसे नदी को साफ करना संभव नहीं
मुळा-मुठा नदी से जुड़े ताजा शोधों का एक महत्वपूर्ण संकेत यह है कि मानसून का प्राकृतिक बहाव प्रदूषण की समस्या का स्थायी समाधान नहीं है।
यदि नदी में लगातार सीवेज और अन्य प्रदूषित पानी पहुंचता रहता है, तो बारिश के दौरान बढ़ा हुआ जलप्रवाह कुछ समय के लिए प्रदूषण के प्रभाव को कम कर सकता है, लेकिन इससे प्रदूषण का मूल स्रोत समाप्त नहीं होता।
इसलिए नदी की स्थिति सुधारने के लिए सीवेज का उचित उपचार, प्रदूषण स्रोतों पर नियंत्रण, नियमित जल गुणवत्ता निगरानी और नदी के पारिस्थितिक तंत्र का संरक्षण जरूरी माना जा रहा है।
नदी के भविष्य के लिए क्या जरूरी?
विशेषज्ञ अध्ययनों से सामने आ रहे संकेत बताते हैं कि मुळा-मुठा नदी को पुनर्जीवित करने के लिए केवल नदी के किनारे विकास या सौंदर्यीकरण पर्याप्त नहीं होगा।
नदी में पहुंचने वाले प्रदूषित पानी को रोकना, सीवेज ट्रीटमेंट की क्षमता बढ़ाना, औद्योगिक प्रदूषण पर प्रभावी नियंत्रण रखना और नदी के संवेदनशील हिस्सों की लगातार निगरानी करना महत्वपूर्ण होगा।
पुणे महानगर क्षेत्र में नदी प्रदूषण नियंत्रण और पुनर्जीवन के लिए नदी सुधार परियोजनाएं भी प्रस्तावित हैं। संबंधित योजना में मुळा-मुठा नदी के प्रदूषण नियंत्रण और पुनर्जीवन को प्रमुख उद्देश्य के रूप में रखा गया है।
क्यों महत्वपूर्ण है यह खबर?
मुळा-मुठा नदी केवल पुणे शहर की भौगोलिक पहचान का हिस्सा नहीं है, बल्कि इसका संबंध स्थानीय जल संसाधनों, जैव विविधता और नदी से जुड़े पारिस्थितिक तंत्र से भी है।
ताजा अध्ययन यह संकेत देता है कि नदी में पानी का बहाव बढ़ना और प्रदूषण का खत्म होना दो अलग-अलग बातें हैं। यदि प्रदूषण के स्रोत लगातार बने रहते हैं, तो मानसून के बाद भी नदी के जलीय जीवन पर उसका प्रभाव जारी रह सकता है।
मुळा-मुठा में जलीय जीवन में हो रहे बदलाव इसलिए नदी की मौजूदा स्थिति के साथ-साथ उसके भविष्य के लिए भी महत्वपूर्ण पर्यावरणीय संकेत माने जा सकते हैं।
