नई दिल्ली | 18 सितंबर 2026
दिल्ली-NCR में सर्दियों के दौरान बढ़ने वाले वायु प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए केंद्र सरकार ने फसल अवशेष यानी पराली जलाने की घटनाओं पर कार्रवाई और सख्त करने का प्रस्ताव रखा है। प्रस्तावित नए नियमों के तहत जिस कृषि भूमि पर पराली जलाने की घटना पाई जाएगी, उसके भूमि रिकॉर्ड में ‘रेड एंट्री’ दर्ज की जा सकती है। यह एंट्री सामान्य स्थिति में 15 महीने तक प्रभावी रहेगी।
हालांकि, यह ध्यान रखना जरूरी है कि ये फिलहाल ड्राफ्ट नियम हैं, अंतिम रूप से लागू नियम नहीं। पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने 8 सितंबर 2026 को ड्राफ्ट अधिसूचना जारी कर हितधारकों से सुझाव और आपत्तियां आमंत्रित की हैं। सुझाव देने के लिए 60 दिनों का समय दिया गया है।
किन राज्यों और क्षेत्रों पर लागू होगा प्रस्ताव?
प्रस्तावित नियमों का दायरा दिल्ली-NCR और उससे जुड़े राज्यों के कुछ क्षेत्रों तक रखा गया है। ड्राफ्ट के अनुसार ये नियम दिल्ली, पंजाब, हरियाणा तथा राजस्थान और उत्तर प्रदेश के राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (NCR) वाले हिस्सों पर लागू होंगे।
इसका मुख्य उद्देश्य धान की कटाई के बाद फसल अवशेष जलाने की घटनाओं को कम करना है। पराली जलाने को दिल्ली-NCR में सर्दियों के दौरान वायु प्रदूषण बढ़ाने वाले कई कारकों में से एक माना जाता रहा है। हालांकि प्रदूषण में इसका योगदान मौसम, हवा की दिशा और अन्य स्थानीय स्रोतों के अनुसार बदलता रहता है।
खेत के रिकॉर्ड में दर्ज होगी ‘रेड एंट्री’
प्रस्तावित व्यवस्था में पराली जलाने की घटना पाए जाने या स्थापित होने पर संबंधित भूमि के राजस्व रिकॉर्ड में लाल निशान यानी ‘रेड एंट्री’ दर्ज करने का प्रावधान है।
यह एंट्री घटना की तारीख से 15 महीने तक बनी रहेगी। यदि इस अवधि के दौरान उसी जमीन पर दोबारा पराली जलाने की घटना सामने आती है, तो रेड एंट्री को अगले 15 महीने के लिए बढ़ाया जा सकता है।
इसी तरह यदि लगाया गया पर्यावरणीय मुआवजा निर्धारित समय में जमा नहीं किया जाता है, तो रेड एंट्री जारी रहने का प्रावधान प्रस्ताव में रखा गया है।
कितना लगेगा जुर्माना?
प्रस्तावित नियमों में जमीन के आकार के आधार पर पर्यावरणीय मुआवजे की अलग-अलग राशि तय की गई है।
| कृषि भूमि का क्षेत्रफल | प्रस्तावित पर्यावरणीय मुआवजा |
|---|---|
| 2 एकड़ से कम | ₹5,000 |
| 2 से 5 एकड़ | ₹10,000 |
| 5 एकड़ से अधिक | ₹30,000 |
ये दरें 2024 में लागू किए गए संशोधित प्रावधानों के अनुरूप हैं।
30 दिन में भुगतान नहीं किया तो क्या होगा?
ड्राफ्ट के अनुसार पर्यावरणीय मुआवजे की राशि का भुगतान चालान जारी होने के 30 दिनों के भीतर किया जाना होगा।
यदि संबंधित किसान निर्धारित समय में राशि जमा नहीं करता है तो बकाया रकम को भूमि राजस्व के बकाये की तरह वसूल करने की प्रक्रिया अपनाई जा सकती है। यानी मामला सिर्फ जुर्माना लगाने तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि बकाया राशि की वसूली के लिए राजस्व तंत्र का इस्तेमाल किया जा सकेगा।
बार-बार पराली जलाई तो और बढ़ेगी रेड एंट्री
प्रस्तावित व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण हिस्सा दोबारा होने वाली घटनाओं से जुड़ा है।
यदि किसी जमीन पर 15 महीने की अवधि के दौरान फिर से पराली जलाने की घटना पाई जाती है, तो रेड एंट्री को अगले 15 महीने के लिए बढ़ाया जा सकता है।
इस तरह लगातार उल्लंघन करने वाले भूमि रिकॉर्ड पर रेड एंट्री लंबे समय तक बनी रह सकती है।
क्या ‘रेड कैटेगरी’ वाली जमीन पर सरकारी योजनाएं बंद हो जाएंगी?
यहां एक महत्वपूर्ण बात है। ड्राफ्ट नियमों में रेड एंट्री के सभी संभावित परिणाम स्पष्ट रूप से निर्धारित नहीं किए गए हैं।
हालांकि, रिपोर्टों में सरकारी प्रक्रिया से जुड़े सूत्रों के हवाले से यह संभावना बताई गई है कि रेड एंट्री वाली जमीन कुछ सरकारी योजनाओं के लिए अयोग्य हो सकती है। लेकिन इसे अभी अंतिम नियम या निश्चित प्रतिबंध के तौर पर नहीं बताया जा सकता।
इसलिए फिलहाल यह कहना सही होगा कि सरकार ने भूमि रिकॉर्ड में रेड एंट्री का प्रस्ताव रखा है, जबकि इससे जुड़ी अतिरिक्त पाबंदियों का अंतिम स्वरूप बाद की प्रक्रिया में स्पष्ट होगा।
जमा मुआवजे की राशि कहां जाएगी?
प्रस्तावित नियमों में पर्यावरणीय मुआवजे से प्राप्त राशि के इस्तेमाल का भी प्रावधान है।
यह राशि संबंधित राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड या प्रदूषण नियंत्रण समिति के खाते में जमा की जाएगी। इसके बाद इसका इस्तेमाल पराली प्रबंधन से जुड़ी गतिविधियों के लिए किया जा सकता है।
इनमें किसानों को फसल अवशेष प्रबंधन की मशीनरी उपलब्ध कराने में सहायता, फसल विविधीकरण, बायोमास के भंडारण और उपयोग से जुड़ा बुनियादी ढांचा, अनुसंधान एवं विकास तथा किसानों को पर्यावरण-अनुकूल खेती के बारे में प्रशिक्षण देना शामिल है।
सरकार क्यों ला रही है नया ढांचा?
हर साल धान की कटाई के बाद पंजाब, हरियाणा और आसपास के क्षेत्रों में फसल अवशेष जलाने की घटनाओं को लेकर दिल्ली-NCR के वायु प्रदूषण पर चिंता बढ़ती है।
केंद्र और राज्य सरकारें पिछले कई वर्षों से पराली जलाने को कम करने के लिए मशीनरी, फसल अवशेष प्रबंधन, किसानों को प्रोत्साहन और आर्थिक दंड जैसे कई उपायों पर काम कर रही हैं।
नए प्रस्ताव में जुर्माने के साथ भूमि रिकॉर्ड में रेड एंट्री जोड़कर कार्रवाई को अधिक प्रत्यक्ष बनाने की कोशिश की गई है।
किसानों के लिए क्या बदलेगा?
यदि प्रस्तावित नियम अंतिम रूप में लागू होते हैं तो किसानों के लिए पराली प्रबंधन की व्यवस्था पहले से अधिक महत्वपूर्ण हो जाएगी।
पराली जलाने की घटना मिलने पर संबंधित किसान पर जमीन के आकार के अनुसार मुआवजा लगाया जा सकता है और संबंधित भूमि रिकॉर्ड में 15 महीने के लिए रेड एंट्री दर्ज हो सकती है।
इसके साथ ही किसानों के लिए पराली को जलाने के बजाय मशीनरी या अन्य उपलब्ध फसल-अवशेष प्रबंधन विकल्पों के जरिए निपटाने की व्यवस्था अपनाना जरूरी होगा।
अभी नियम अंतिम नहीं हुए हैं
इस पूरे मामले में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि 15 महीने की रेड कैटेगरी का प्रावधान अभी प्रस्तावित है। केंद्र ने ड्राफ्ट नियमों पर जनता और संबंधित पक्षों से आपत्तियां और सुझाव मांगे हैं।
मंत्रालय की अधिसूचना के अनुसार सुझावों के लिए 60 दिनों की अवधि रखी गई है। इसके बाद प्राप्त सुझावों पर विचार करते हुए नियमों को अंतिम रूप दिया जा सकता है।
यानी अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि हर पराली जलाने वाले खेत पर निश्चित रूप से 15 महीने का रेड टैग लग ही जाएगा। फिलहाल यह केंद्र सरकार के प्रस्तावित 2026 नियमों का हिस्सा है।
एक नजर में
- नियम: Commission for Air Quality Management से जुड़े प्रस्तावित 2026 नियम
- मुख्य मुद्दा: पराली जलाने पर कार्रवाई
- रेड एंट्री: प्रस्ताव के अनुसार 15 महीने
- दोबारा पराली जलाने पर: अगले 15 महीने तक बढ़ सकती है
- 2 एकड़ से कम जमीन: ₹5,000 मुआवजा
- 2–5 एकड़: ₹10,000
- 5 एकड़ से अधिक: ₹30,000
- भुगतान की समयसीमा: 30 दिन
- क्षेत्र: दिल्ली, पंजाब, हरियाणा और NCR के राजस्थान-उत्तर प्रदेश क्षेत्र
- स्थिति: अभी ड्राफ्ट/प्रस्तावित नियम
- सुझाव की अवधि: अधिसूचना के बाद 60 दिन
