किचन टिप्स: रसोई में बस ये एक छोटा सा बदलाव करें, घर में आएगी सुख-शांति

अक्सर घरों में बिना किसी बड़े कारण के तनाव, बीमारी या आर्थिक तंगी बनी रहती है। वास्तु शास्त्र के जानकारों के अनुसार, इसका एक बड़ा कारण किचन का वास्तु दोष हो सकता है। किचन में मौजूद धुआं और नकारात्मक ऊर्जा को बाहर निकालने के लिए एक छोटी सी चीज यानी एग्जॉस्ट फैन बड़े काम की साबित हो सकती है, बशर्ते वह सही दिशा में हो।

किस दिशा में लगाएं एग्जॉस्ट फैन?

वास्तु शास्त्र के नियमों के अनुसार, किचन में एग्जॉस्ट फैन लगाने की सबसे सही और शुभ दिशा पूर्व (East) मानी गई है।

  • कारण: माना जाता है कि पूर्व दिशा से नकारात्मक ऊर्जा आसानी से बाहर निकल जाती है और घर में सकारात्मकता का संचार होता है।
  • खिड़की की दिशा: इसी तरह किचन की खिड़की भी पूर्व दिशा में ही होनी चाहिए ताकि सूर्य की पहली किरणें और ताजी हवा किचन के वातावरण को शुद्ध रख सकें।

क्यों जरूरी है एग्जॉस्ट फैन?

  1. नकारात्मक ऊर्जा का निकास: किचन में खाना बनाते समय निकलने वाला धुआं और गंध न केवल सेहत के लिए हानिकारक है, बल्कि यह वास्तु के नजरिए से नकारात्मकता भी पैदा करती है।
  2. सकारात्मक माहौल: सही वेंटिलेशन होने से खाना बनाने वाले का मन शांत और प्रसन्न रहता है, जिसका सीधा असर भोजन के स्वाद और गुणवत्ता पर पड़ता है।

इन बातों का भी रखें खास ख्याल:

  • साफ-सफाई: किचन में जमी धूल, चिकनाई और गंदगी को बड़ा वास्तु दोष माना गया है। समय-समय पर सफाई करना अनिवार्य है।
  • रोशनी: किचन में भरपूर प्राकृतिक रोशनी होनी चाहिए। अंधेरा या कम रोशनी वाला किचन घर में आलस्य और बीमारियां लाता है।
  • खिड़की का आकार: किचन की खिड़की को यथासंभव बड़ा रखना चाहिए ताकि वेंटिलेशन बेहतर हो सके।

विवाह पंचमी के मौके पर अयोध्या के रामलला मंदिर के शिख पर दिव्य ध्वजारोहण का कार्यक्रम किया जाएगा. विवाह पंचमी के दिन प्रभु श्रीराम और माता जानकी का विवाह हुआ था. कभी आपने सोचा है कि आखिर मंदिर के शिखर पर ध्वज क्यों लगाया जाता है. आइए जानते हैं..

विवाह पंचमी भगवान श्रीराम व माता सीता के दिव्य विवाह का पावन दिन है. मार्गशीर्ष मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को राजकुमार प्रभु राम और राजकुमारी माता जानकी का विवाह हुआ था इसलिए इस तिथि को विवाह पंचमी का पर्व मनाया जाता है. विवाह पंचमी के उपलक्ष्य में अयोध्या के रामलला मंदिर के शिखर पर ध्वजारोहण कार्यक्रम किया जाएगा. मंदिर पर ध्वज होना सनातन धर्म की परंपरा है और यह ध्वज भगवान की उपस्थिति का संकेत देता है. मंदिर के सर्वोच्च शिखर पर लगा ध्वज से ही ब्रह्मांडीय ऊर्जा सबसे पहले प्रवेश करती है. आइए जानते हैं आखिर मंदिर के शिखर पर दिव्य ध्वज क्यों लगाया जाता है.

विवाह पंचमी पर ध्‍वजारोहण अनुष्ठान का महत्व – विवाह पंचमी के मौके पर अभिजीत मुहूर्त बना हुआ है. मान्‍यता है कि भगवान राम का जन्म अभिजीत मुहूर्त में हुआ था. साथ ही इसी मूहूर्त में ही अयोध्या में भगवान राम की प्राण प्रतिष्ठा भी की गई थी. अभिजीत मुहूर्त को वैदिक परंपरा में सर्वश्रेष्ठ, सर्वसिद्ध और दैवीय शक्ति से युक्त मुहूर्त माना गया है. यह दैनिक रूप से सूर्य के प्रभावशाली मध्य भाग में आता है और अत्यंत शुभ माना गया है. धर्मशास्त्रों में अभिजीत मुहूर्त को सर्वदोष-नाशक काल कहा गया है. भगवान राम और माता सीता के विवाह के दिन राम मंदिर के शिखर पर ध्वजारोहण का कार्यक्रम होना बहुत शुभ माना जा रहा है. ध्वज विजय, धर्म और समर्पण का प्रतीक है और श्रीराम-सीता विवाह इसके चरम स्वरूप हैं.

मंदिर के शिखर पर क्यों लगाया जाता है ध्वज? – जब हम मंदिरों में जाते हैं, चाहे वे छोटे हों या बड़े, हम अक्सर देखते हैं कि मंदिर के ऊपर एक ध्वज गर्व से लहरा रहा होता है. कुछ इसे ध्वजा कहते हैं, तो कुछ इसे धार्मिक ध्वज कहते हैं. मंदिर के शीर्ष पर ध्वज या ध्वजा रखने का एक मुख्य कारण उस विशेष मंदिर में पूजे जाने वाले भगवान की उपस्थिति का प्रतीक है. ध्वज मंदिर की पवित्रता की घोषणा के रूप में कार्य करता है. ना केवल भारत और हिंदू धर्म में, बल्कि कई संस्कृतियों में ध्वज फहराना विजय का प्रतीक माना जाता है. शीर्ष पर ध्वज केवल एक सजावटी वस्तु नहीं है बल्कि विजय का प्रतीक है. मंदिर के ऊपर ध्वज और ध्वजा स्तंभ (शीर्ष पर ध्वज वाला खंभा) को पृथ्वी और उच्च ब्रह्मांड के बीच का लिंक कहा जाता है.

ध्वज केवल एक धार्मिक प्रतीक नहीं बल्कि शक्तिशाली संकेत – ध्वज केवल एक धार्मिक प्रतीक नहीं बल्कि आकाशीय ऊर्जा, देव-चैतन्य और ग्रह-तत्वों से जुड़ा एक अत्यंत शक्तिशाली संकेत है. वेदिक ज्योतिष में ऊर्ध्व दिशा (ऊपर) देवताओं की दिशा मानी गई है. शिखर मंदिर का सबसे पवित्र, ऊर्जा का उच्चतम बिंदु होता है. ध्वज का शिखर पर होना यह सुनिश्चित करता है कि मंदिर से देवत्व की ऊर्जा पूरे नगर में फैले और मंदिर की जीवंतता हवा के माध्यम से हर दिशा में जाए. ध्वज सूर्य के प्रकाश को सबसे पहले प्राप्त करता है और सूर्य के इस स्पर्श से मंदिर की दिव्यता बढ़ती है, वातावरण में नकारात्मक ऊर्जा का नाश होता है और मंदिर की आध्यात्मिक शक्ति सक्रिय रहती है.

रामचरितमानस में ध्वज का वर्णन – जिस मंदिर पर ध्वज लहरा रहा हो, वहां देवी-देवता जागृत अवस्था में विद्यमान होते हैं. वहीं अगर ध्वज ना हो तो मंदिर मौन माना जाता है. ध्वज मंदिर की सार्वजनिक घोषणा है कि यहां देवता की उपस्थिति सक्रिय है और यह स्थान पवित्र व सुरक्षित है. साथ ही सूर्य व वायु-दोनों तत्वों का आशीर्वाद प्राप्त होता है. राम मंदिर के शिखर पर ध्वज ना केवल आस्था का प्रतीक होगा बल्कि अयोध्या के सूर्यवंश और रघुकुल जैसी महान परंपराओं का साक्षी भी बनने जा रहा है. रामचरितमानस और वाल्मीकि रामयाण दोनों में ही ध्वज, तोरण और पताका का वर्णन कई बार मिलता है.