17 अप्रैल 2026
अप्रैल 2026 में मध्य प्रदेश में पराली (नरवाई) जलाने के मामलों ने चिंताजनक और ऐतिहासिक स्तर को छू लिया है। ताजा आंकड़ों के अनुसार, पूरे देश में दर्ज कुल पराली जलाने की घटनाओं में से 70% से अधिक मामले अकेले मध्य प्रदेश से सामने आए हैं, जिससे राज्य देश का सबसे बड़ा “स्टबल बर्निंग हॉटस्पॉट” बन गया है।
इस वर्ष गेहूं कटाई के सीजन में स्थिति इतनी गंभीर हो गई है कि इसने पिछले कई वर्षों के सभी रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस पर तत्काल नियंत्रण नहीं किया गया, तो इसका असर न केवल पर्यावरण बल्कि जनस्वास्थ्य पर भी लंबे समय तक देखने को मिल सकता है।
📊 मुख्य आंकड़े (अप्रैल 2026 की स्थिति)
- 70% से ज्यादा हिस्सेदारी: 15 अप्रैल 2026 तक देशभर में दर्ज 13,907 मामलों में से लगभग 72% मामले मध्य प्रदेश से सामने आए।
- तेजी से बढ़ते केस: केवल 1 से 14 अप्रैल 2026 के बीच 12,617 से ज्यादा घटनाएं दर्ज की गईं, जो 2025 (12,478) और 2024 (4,468) के मुकाबले काफी अधिक हैं।
- 17 अप्रैल का डेटा: 17 अप्रैल को देश में कुल 1,423 मामलों में से 1,091 केस अकेले मध्य प्रदेश में दर्ज हुए, यानी उस दिन भी राज्य की हिस्सेदारी 70% से ज्यादा रही।
- सीजन का कुल आंकड़ा: इस सीजन में राज्य का आंकड़ा बढ़कर 22,850 मामलों तक पहुंच गया है।
📍 सबसे ज्यादा प्रभावित जिले
देश के टॉप 10 पराली जलाने वाले जिलों में से 8 जिले मध्य प्रदेश के हैं। इनमें प्रमुख रूप से:
- होशंगाबाद (नर्मदापुरम)
- रायसेन
- उज्जैन
- इंदौर
- सीहोर
- धार
- विदिशा
- देवास
इन जिलों में खेतों में आग की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं, जिससे स्थानीय स्तर पर प्रदूषण तेजी से बढ़ रहा है।
🏛️ केंद्र मंत्री के क्षेत्र में भी हालात गंभीर
केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान के संसदीय क्षेत्र — होशंगाबाद, रायसेन और विदिशा — में ही 3,700 से ज्यादा मामले सामने आए हैं। इससे यह स्पष्ट होता है कि समस्या कितनी व्यापक हो चुकी है और प्रशासनिक चुनौती कितनी बड़ी है।
⚖️ प्रशासन की कार्रवाई और नियम
- पूर्ण प्रतिबंध: राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) के आदेश के बाद पराली जलाने पर सख्त प्रतिबंध लागू किया गया है।
- जुर्माना: 5 एकड़ से अधिक भूमि वाले किसानों पर ₹15,000 तक का जुर्माना लगाया जा रहा है।
- निगरानी बढ़ी: प्रशासन द्वारा ड्रोन और सैटेलाइट से निगरानी भी बढ़ाई गई है।
🚜 किसानों की मजबूरी क्या है?
कई किसानों का कहना है कि वे जानबूझकर पराली नहीं जला रहे, बल्कि यह उनकी मजबूरी बन गई है।
- खेत जल्दी साफ करने का दबाव
- मशीनों (जैसे सुपर सीडर, रोटावेटर) की कमी
- गीली मिट्टी के कारण मशीनों का सही से काम न करना
- सस्ते और आसान विकल्प का अभाव
विशेषकर विदिशा और आसपास के क्षेत्रों के किसानों ने कहा कि वैकल्पिक तकनीकें या तो महंगी हैं या समय पर उपलब्ध नहीं होतीं।
🌫️ पर्यावरण और स्वास्थ्य पर असर
पराली जलाने के कारण निकलने वाला धुआं अब बड़े शहरों तक पहुंच रहा है।
- भोपाल, इंदौर, ग्वालियर, सागर और जबलपुर में AQI ‘Very Poor’ श्रेणी में पहुंच गया है
- स्मॉग और सांस संबंधी बीमारियों का खतरा बढ़ा
- मिट्टी की गुणवत्ता (soil fertility) भी प्रभावित हो रही है
- कार्बन उत्सर्जन में बढ़ोतरी
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि यही स्थिति बनी रही, तो आने वाले समय में यह समस्या और भी गंभीर रूप ले सकती है।
⚖️ अन्य राज्यों से तुलना
- पंजाब: केवल 8 केस (बहुत कम)
- उत्तर प्रदेश: दूसरे नंबर पर (~52,000 केस कुल वर्षों में)
- हरियाणा और दिल्ली: बहुत कम मामले
👉 इस बार साफ तौर पर देखा जा रहा है कि प्रदूषण का मुख्य स्रोत पंजाब नहीं, बल्कि मध्य प्रदेश बन गया है।
📈 लंबे समय का ट्रेंड
पिछले 5 वर्षों (2022–2026) में:
- कुल मामले: 2.21 लाख+
- मध्य प्रदेश का योगदान: 1.11 लाख+ (लगभग 50%)
👉 यानी राज्य लगातार कई वर्षों से इस समस्या में शीर्ष पर बना हुआ है।
🧾 निष्कर्ष
2025-26 के रबी सीजन में मध्य प्रदेश पराली जलाने के मामले में देश का सबसे बड़ा केंद्र बनकर उभरा है। बढ़ते आंकड़े, कमजोर वैकल्पिक व्यवस्था और प्रशासनिक चुनौतियां इस समस्या को और जटिल बना रही हैं।
यदि समय रहते प्रभावी समाधान — जैसे मशीनों की उपलब्धता, सब्सिडी, और जागरूकता — नहीं बढ़ाई गई, तो यह समस्या पर्यावरण और जनस्वास्थ्य के लिए एक बड़े संकट में बदल सकती है।
