जकार्ता | 16 अक्टूबर 2026
इंडोनेशिया इन दिनों एक गंभीर पर्यावरणीय संकट का सामना कर रहा है। देश के सुमात्रा और बोर्नियो द्वीपों के जंगलों तथा पीटलैंड क्षेत्रों में लगी भीषण आग से आसमान पीला और नारंगी दिखाई देने लगा है। आग से उठने वाला घना धुआं कई शहरों में फैल गया है, जिससे वायु गुणवत्ता खतरनाक स्तर तक पहुंच गई है। इस संकट के पीछे लंबे समय से जारी सूखे, गर्म और शुष्क परिस्थितियों तथा अल-नीनो से जुड़े प्रभावों को प्रमुख कारकों में गिना जा रहा है।
आसमान का रंग बदला, दृश्यता भी हुई बेहद कम
इंडोनेशिया के मध्य कालीमंतन प्रांत के पालंगका राया शहर में धुएं की मोटी परत छा गई है। 14 और 15 अक्टूबर को यहां आसमान पीले और गहरे नारंगी रंग में दिखाई दिया। कई इलाकों में दृश्यता घटकर कुछ दर्जन मीटर तक पहुंचने की खबर सामने आई।
जंगलों और जमीन के भीतर मौजूद पीट की परतों में लगी आग से लगातार धुआं निकल रहा है। पीटलैंड ऐसी भूमि होती है, जहां हजारों वर्षों में जमा हुआ जैविक पदार्थ मिट्टी में मौजूद रहता है। सूखने पर यह अत्यधिक ज्वलनशील हो सकता है और आग लगने के बाद लंबे समय तक सुलगता रह सकता है। इसी कारण इन क्षेत्रों की आग पर काबू पाना बेहद मुश्किल हो रहा है।
सात प्रांतों में 2.83 लाख से अधिक सांस संबंधी मामले
जंगलों में लगी आग का असर केवल पर्यावरण तक सीमित नहीं है, बल्कि लोगों की सेहत पर भी पड़ रहा है। इंडोनेशिया के स्वास्थ्य मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, 13 अक्टूबर तक आग और धुएं से प्रभावित सात प्रांतों में सांस संबंधी बीमारियों के 2,83,270 मामले दर्ज किए गए थे। यह संख्या 9 सितंबर को दर्ज 1,13,336 मामलों से दोगुने से भी अधिक है।
मध्य कालीमंतन के कातिंगन जिले में वायु प्रदूषण सूचकांक 15 अक्टूबर को लगभग 1,600 तक पहुंचने की सूचना थी, जबकि प्रांतीय राजधानी पालंगका राया में यह लगभग 1,300 दर्ज किया गया। ये स्तर बेहद खतरनाक वायु प्रदूषण की स्थिति दर्शाते हैं।
धुएं में मौजूद सूक्ष्म कण सांस के जरिए फेफड़ों तक पहुंच सकते हैं। बच्चों, बुजुर्गों और पहले से सांस या हृदय संबंधी समस्याओं से जूझ रहे लोगों के लिए ऐसी हवा विशेष रूप से नुकसानदायक हो सकती है।
अल-नीनो और लंबे सूखे ने बढ़ाई आग की तीव्रता
अल-नीनो एक प्राकृतिक जलवायु घटना है, जो प्रशांत महासागर के तापमान में बदलाव के जरिए दुनिया के विभिन्न क्षेत्रों के मौसम को प्रभावित कर सकती है। इंडोनेशिया में मौजूदा शुष्क परिस्थितियों ने जंगलों और पीटलैंड को आग के प्रति अधिक संवेदनशील बना दिया है।
हालांकि, आग लगने के पीछे केवल मौसम ही जिम्मेदार नहीं है। जमीन साफ करने के लिए आग का इस्तेमाल, वनों की कटाई और पीटलैंड से पानी की निकासी जैसी गतिविधियां भी जोखिम बढ़ाती हैं। सूखी वनस्पति और जमीन के भीतर सुलगती पीट की परतें आग को लंबे समय तक फैलने का मौका देती हैं।
पर्यावरण संगठनों के आकलन के अनुसार, इस साल जनवरी से अगस्त के बीच आग से प्रभावित भूमि का क्षेत्रफल 6.37 लाख हेक्टेयर से अधिक हो सकता है। एक अन्य निगरानी समूह ने यह आंकड़ा करीब 9 लाख हेक्टेयर तक बताया है। ये स्वतंत्र संगठनों के अनुमान हैं; आग से प्रभावित कुल क्षेत्र का आधिकारिक आंकड़ा अभी पूरी तरह अद्यतन नहीं है।
इंडोनेशिया के बाहर भी पहुंचा धुएं का असर
जंगलों में लगी आग से उठने वाला धुआं सीमाओं को पार कर दक्षिण-पूर्व एशिया के दूसरे देशों तक पहुंच रहा है। मलेशिया, सिंगापुर और पूर्वी तिमोर में भी हवा की गुणवत्ता प्रभावित हुई है। पूर्वी तिमोर में धुंध के कारण 15 अक्टूबर से तीन दिनों के लिए स्कूल बंद करने की सूचना दी गई, जबकि मलेशिया के कुछ क्षेत्रों में भी स्कूलों को बंद करना पड़ा।
इंडोनेशिया में धुएं और खराब दृश्यता के कारण हवाई यातायात भी प्रभावित हुआ है। रिपोर्टों के अनुसार, 11 अगस्त से 12 अक्टूबर के बीच करीब 2,000 उड़ानों पर असर पड़ा। इससे यात्रियों को परेशानी हुई और क्षेत्रीय परिवहन व्यवस्था पर अतिरिक्त दबाव पड़ा।
आग बुझाने के लिए हजारों कर्मी तैनात
इंडोनेशियाई प्रशासन ने आग पर नियंत्रण पाने के लिए बड़े पैमाने पर अभियान चलाया है। रिपोर्टों के अनुसार, 60 हजार से अधिक कर्मियों को तैनात किया गया है और लगभग 50 विमान पानी गिराने तथा कृत्रिम वर्षा कराने के अभियानों में लगाए गए हैं।
सरकार ने पीटलैंड के पुनर्वास, पानी के स्तर को बनाए रखने और आग की रोकथाम के उपायों पर भी जोर दिया है। पीटलैंड में पानी की कमी होने पर आग जमीन के भीतर फैल सकती है, इसलिए जल प्रबंधन को महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
16 अक्टूबर को इंडोनेशिया के विदेश मंत्री ने बताया कि राष्ट्रपति प्रबोवो सुबियांतो ने आग पर नियंत्रण के लिए पड़ोसी देशों से मिलने वाली सहायता स्वीकार करने की मंजूरी दे दी है। मलेशिया पहले ही हेलीकॉप्टर, विमान और कर्मियों की मदद देने की पेशकश कर चुका था। अब सहायता के समन्वय पर चर्चा की जा रही है।
जंगलों की आग से वन्यजीवों का अस्तित्व भी खतरे में
इंडोनेशिया के जंगल ओरंगुटान समेत कई दुर्लभ वन्यजीवों का प्राकृतिक आवास हैं। आग और धुएं से उनके रहने, भोजन खोजने और सुरक्षित स्थानों तक पहुंचने के अवसर प्रभावित हो रहे हैं।
पश्चिम कालीमंतन के एक वन्यजीव पुनर्वास केंद्र में अगस्त से अब तक 49 ओरंगुटान को बचाकर लाया गया है। केंद्र में देखभाल किए जा रहे ओरंगुटानों की संख्या बढ़कर 90 हो गई है। बचाव दल ड्रोन की मदद से प्रभावित क्षेत्रों में जानवरों का पता लगा रहे हैं।
विशेषज्ञों के सामने चुनौती केवल आग बुझाने की नहीं, बल्कि जंगलों और पीटलैंड को दोबारा आग के प्रति संवेदनशील होने से बचाने की भी है। इसके लिए वनों की कटाई पर नियंत्रण, जल प्रबंधन में सुधार और प्राकृतिक आवासों की बहाली आवश्यक मानी जा रही है।
कब तक मिल सकती है राहत?
इंडोनेशिया में आग और धुएं से राहत मिलने की उम्मीद लगातार बारिश पर निर्भर है। हालांकि, मौसम संबंधी अनुमान बताते हैं कि इस साल बारिश का मौसम सामान्य समय से देर से सक्रिय हो सकता है। यदि सूखी परिस्थितियां बनी रहती हैं, तो आग बुझाने के प्रयास और कठिन हो सकते हैं।
मौजूदा संकट ने यह स्पष्ट कर दिया है कि जंगलों की आग केवल स्थानीय समस्या नहीं है। इससे मानव स्वास्थ्य, जैव विविधता, हवाई यातायात और पड़ोसी देशों की हवा प्रभावित हो सकती है। विशेषज्ञों के अनुसार, आग की रोकथाम, पीटलैंड का संरक्षण और समय रहते क्षेत्रीय सहयोग भविष्य में ऐसे संकटों का प्रभाव कम करने के लिए महत्वपूर्ण होंगे।
