MP में 66 से बढ़कर करीब 1,400 हुए बारहसिंगा, सतपुड़ा और बांधवगढ़ में पुनर्वास सफल; अब जंगलों में बढ़ रहा राजकीय पशु का कुनबा

भोपाल | 12 अक्टूबर 2026

मध्य प्रदेश के वन्यजीव संरक्षण के लिए अच्छी खबर सामने आई है। कभी विलुप्ति के कगार पर पहुंच चुके प्रदेश के राजकीय पशु बारहसिंगा की आबादी में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है। वर्ष 1964 में कान्हा राष्ट्रीय उद्यान में इनकी संख्या घटकर महज 66 रह गई थी। लगातार संरक्षण, बेहतर आवास और वैज्ञानिक प्रबंधन के प्रयासों से अब इनकी आबादी में बड़ा सुधार हुआ है। कान्हा के साथ सतपुड़ा टाइगर रिजर्व और बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व में भी बारहसिंगों का कुनबा बढ़ रहा है। उपलब्ध नवीनतम आंकड़ों के आधार पर प्रदेश में इनकी कुल संख्या करीब 1,400 के आसपास पहुंचने का अनुमान है।

यह उपलब्धि केवल वन्यजीवों की संख्या बढ़ने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भी दिखाती है कि किसी संकटग्रस्त प्रजाति को सुरक्षित आवास, नियमित निगरानी और वैज्ञानिक पुनर्वास के जरिए दोबारा मजबूत बनाया जा सकता है। मध्य प्रदेश में बारहसिंगा संरक्षण की रणनीति के तहत एक ही क्षेत्र पर निर्भरता कम करने और अलग-अलग जंगलों में इनकी नई आबादी विकसित करने पर जोर दिया गया है।

कान्हा बना बारहसिंगा संरक्षण का प्रमुख केंद्र

मध्य प्रदेश में कठोर भूमि वाले बारहसिंगा की सबसे महत्वपूर्ण प्राकृतिक आबादी कान्हा राष्ट्रीय उद्यान में रही है। एक समय शिकार और प्राकृतिक आवास में कमी के कारण इनकी संख्या तेजी से घट गई थी। वर्ष 1964 में कान्हा में इनकी संख्या केवल 66 रह जाने का उल्लेख मिलता है। इसके बाद वन विभाग और वन्यजीव विशेषज्ञों ने इनके संरक्षण के लिए लगातार प्रयास किए।

कान्हा में घास के मैदानों का प्रबंधन, भोजन और पानी की उपलब्धता, सुरक्षित प्रजनन क्षेत्र तथा नियमित निगरानी जैसे उपायों से इनकी आबादी को बढ़ने का अवसर मिला। वर्ष 2010 के आसपास इनकी संख्या लगभग 250 बताई गई थी, जबकि हालिया रिपोर्टों में कान्हा में यह आंकड़ा करीब 1,000 तक पहुंचने की जानकारी दी गई है।

कान्हा में आबादी बढ़ने के बाद संरक्षण विशेषज्ञों के सामने एक नई चुनौती थी। यदि पूरी प्रजाति की मुक्त विचरण करने वाली आबादी एक ही स्थान तक सीमित रहती, तो किसी बीमारी, प्राकृतिक आपदा या आवास संबंधी समस्या की स्थिति में उसके अस्तित्व पर बड़ा खतरा पैदा हो सकता था। इसी जोखिम को कम करने के लिए दूसरे उपयुक्त जंगलों में बारहसिंगों को बसाने की योजना बनाई गई।

सतपुड़ा में एक दशक के प्रयासों का मिला परिणाम

बारहसिंगा पुनर्वास कार्यक्रम के तहत वर्ष 2015 में कान्हा से बारहसिंगों को सतपुड़ा टाइगर रिजर्व में स्थानांतरित करने की प्रक्रिया शुरू हुई। सतपुड़ा के बोरी और मालिनी क्षेत्र के घास के मैदानों को इनके लिए उपयुक्त माना गया। यहां भोजन, जलस्रोत और रहने के अनुकूल परिस्थितियां विकसित करने के साथ विशेष निगरानी व्यवस्था भी बनाई गई।

बारहसिंगों को सुरक्षित तरीके से पकड़ने और स्थानांतरित करने के लिए नियंत्रित बाड़े यानी बोमा तकनीक का इस्तेमाल किया गया। नए वातावरण में अनुकूलन के बाद उन्हें उपयुक्त क्षेत्रों में छोड़ा गया। इस प्रक्रिया में वन विभाग के कर्मचारियों, पशु चिकित्सकों और वन्यजीव विशेषज्ञों की भूमिका महत्वपूर्ण रही।

सतपुड़ा टाइगर रिजर्व में वर्ष 2015 से 2026 के बीच कान्हा से लगभग 135 बारहसिंगों को लाए जाने की जानकारी दी गई है। लगातार निगरानी और प्राकृतिक प्रजनन के परिणामस्वरूप यहां इनकी आबादी बढ़कर लगभग 303 हो गई है। अब सतपुड़ा के अलग-अलग हिस्सों में इनकी आबादी स्थापित हो चुकी है।

यह बदलाव इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि सतपुड़ा क्षेत्र में बारहसिंगा पहले भी पाया जाता था, लेकिन आवास के नुकसान और शिकार जैसी वजहों से यहां इसकी आबादी समाप्त हो गई थी। अब पुनर्वास कार्यक्रम ने इस क्षेत्र में प्रजाति की दोबारा मौजूदगी स्थापित करने में मदद की है।

बांधवगढ़ में भी सफल हो रहा पुनर्वास

बारहसिंगा संरक्षण के प्रयास सतपुड़ा तक सीमित नहीं हैं। बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व में भी कान्हा से बारहसिंगों को स्थानांतरित कर नई आबादी विकसित करने की दिशा में काम किया गया है।

मध्य प्रदेश के राज्य वन अनुसंधान संस्थान के दस्तावेजों के अनुसार, बांधवगढ़ में बारहसिंगा पुनर्वास के लिए आवास की उपयुक्तता और आबादी के लंबे समय तक टिके रहने की संभावनाओं का अध्ययन किया गया। इस प्रक्रिया में कान्हा से 48 बारहसिंगों को बांधवगढ़ स्थानांतरित किया गया। मई 2026 की एक रिपोर्ट के मुताबिक, वहां इनकी संख्या बढ़कर लगभग 64 हो गई थी।

इससे संकेत मिलता है कि नए क्षेत्र में बसाए गए बारहसिंगा वहां की परिस्थितियों के अनुकूल हो रहे हैं और प्रजनन के माध्यम से आबादी आगे बढ़ रही है। हालांकि, इस सफलता को स्थायी बनाए रखने के लिए उपयुक्त घास के मैदानों, जलस्रोतों और सुरक्षित आवास का संरक्षण जरूरी है।

क्यों खास है कठोर भूमि वाला बारहसिंगा?

बारहसिंगा हिरण परिवार का एक खास वन्यजीव है। मध्य प्रदेश में पाया जाने वाला कठोर भूमि वाला बारहसिंगा अपने प्राकृतिक आवास और विशिष्ट सींगों के लिए जाना जाता है। इसके सींगों में कई शाखाएं होती हैं, जिनकी वजह से इसे बारहसिंगा कहा जाता है।

यह प्रजाति मुख्य रूप से घास के मैदानों और उनसे जुड़े वन क्षेत्रों पर निर्भर रहती है। भोजन, पानी और प्रजनन के लिए सुरक्षित स्थान इसकी आबादी को बनाए रखने में अहम भूमिका निभाते हैं। यदि घास के मैदान नष्ट होते हैं या उन पर अतिक्रमण बढ़ता है, तो इनके रहने और प्रजनन की परिस्थितियां प्रभावित हो सकती हैं।

बारहसिंगा केवल एक वन्यजीव नहीं, बल्कि घास के मैदानों और उनसे जुड़े पारिस्थितिकी तंत्र का भी महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसकी आबादी में वृद्धि प्राकृतिक आवास के संरक्षण और वन प्रबंधन की दिशा में किए गए प्रयासों का एक महत्वपूर्ण संकेतक है।

अब छह घास के मैदानों को जोड़ने की योजना

सतपुड़ा में बारहसिंगा की आबादी बढ़ने के बाद अब इनके अलग-अलग समूहों के बीच आवागमन को बेहतर बनाने पर जोर दिया जा रहा है। इसके लिए कम से कम छह घास के मैदानों को जोड़ने वाले वन्यजीव गलियारे विकसित करने की योजना है। इन गलियारों से बारहसिंगों को भोजन, प्रजनन और आराम के लिए उपयुक्त स्थानों के बीच आने-जाने में मदद मिल सकती है।

वन्यजीव गलियारों का महत्व इसलिए भी अधिक है क्योंकि अलग-अलग समूहों के बीच संपर्क बना रहने से आबादी के दीर्घकालिक संरक्षण में मदद मिल सकती है। इससे प्राकृतिक आवागमन और आनुवंशिक विविधता बनाए रखने की संभावनाएं भी बेहतर होती हैं।

हालांकि, केवल संख्या बढ़ना ही संरक्षण की अंतिम सफलता नहीं है। बारहसिंगों को सुरक्षित आवास, पर्याप्त भोजन-पानी, शिकार से सुरक्षा और निरंतर निगरानी की जरूरत बनी रहेगी। नए क्षेत्रों में आबादी को स्थायी बनाने के लिए वन विभाग को इन पहलुओं पर लगातार काम करना होगा।

मध्य प्रदेश के वन्यजीव संरक्षण के लिए बड़ी उपलब्धि

कान्हा में बारहसिंगा की आबादी को संकट से उबारने के बाद सतपुड़ा और बांधवगढ़ में नई आबादी विकसित करना मध्य प्रदेश के संरक्षण प्रयासों का महत्वपूर्ण चरण है। इन क्षेत्रों में संख्या बढ़ने से प्रजाति का भौगोलिक विस्तार मजबूत हुआ है और किसी एक स्थान पर निर्भरता कम करने में मदद मिली है।

करीब 66 से लगभग 1,400 तक पहुंचने का यह सफर कई दशकों के संरक्षण प्रयासों का परिणाम है। आने वाले समय में इन आबादियों की स्थिरता, प्राकृतिक प्रजनन और सुरक्षित आवास की स्थिति यह तय करेगी कि मध्य प्रदेश में बारहसिंगा संरक्षण की यह उपलब्धि कितनी टिकाऊ साबित होती है।

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