नई दिल्ली | 12 अक्टूबर 2026
दिल्ली में कॉकroach जनता पार्टी (CJP) के प्रस्तावित प्रदर्शन को लेकर लगाए गए सुरक्षा प्रतिबंधों पर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। अदालत ने अधिकारियों को राजधानी में लगाए गए बैरिकेड्स की तत्काल समीक्षा करने और जहां वे कानून-व्यवस्था या यातायात की दृष्टि से जरूरी नहीं हैं, वहां उन्हें हटाने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सुरक्षा व्यवस्था बनाए रखने के नाम पर आम लोगों की आवाजाही और सार्वजनिक परिवहन को अनावश्यक रूप से बाधित नहीं किया जाना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट के ये निर्देश 11 अक्टूबर को हुई विशेष सुनवाई के दौरान आए। अदालत के सामने प्रदर्शन से पहले दिल्ली में मेट्रो स्टेशनों पर प्रतिबंध, रेल सेवाओं को लेकर जारी निर्देश, सड़कों पर बैरिकेडिंग और प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिए जाने से संबंधित याचिकाएं रखी गई थीं। कोर्ट ने अधिकारियों से यह भी स्पष्ट करने को कहा कि पहले दिए गए निर्देशों के पालन में कथित चूक क्यों हुई।
बैरिकेड्स की तत्काल समीक्षा करने का निर्देश
सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने कहा कि दिल्ली में लगाए गए बैरिकेड्स की जरूरत का तत्काल आकलन किया जाए। जहां यातायात या कानून-व्यवस्था की स्थिति के कारण अवरोध जरूरी हों, वहां नियमानुसार व्यवस्था बनाए रखी जा सकती है। हालांकि, जहां ऐसी आवश्यकता नहीं है, वहां बैरिकेड्स हटाकर लोगों की आवाजाही सुचारु की जानी चाहिए।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि शहर में लोगों का स्वतंत्र आवागमन यातायात नियमों और कानून के अधीन सुनिश्चित किया जाए। सुरक्षा के उपाय इस तरह लागू होने चाहिए कि उनका असर केवल प्रदर्शन स्थल तक सीमित रखने के बजाय पूरे शहर में आम नागरिकों के लिए अनावश्यक परेशानी का कारण न बने।
दिल्ली में बैरिकेडिंग के कारण दफ्तर जाने वाले लोगों, यात्रियों, विद्यार्थियों और अन्य नागरिकों को होने वाली संभावित परेशानियों का मुद्दा भी सुनवाई के दौरान सामने आया। अदालत की चिंता थी कि किसी प्रदर्शन की आशंका के चलते उन लोगों की रोजमर्रा की गतिविधियां पूरी तरह प्रभावित नहीं होनी चाहिए, जिनका प्रदर्शन से कोई सीधा संबंध नहीं है।
मेट्रो और रेल सेवाएं सामान्य रखने पर जोर
सुप्रीम कोर्ट ने मेट्रो और रेलवे सेवाओं को सामान्य रूप से संचालित रखने का निर्देश भी दिया। अदालत ने कहा कि सार्वजनिक परिवहन पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने के बजाय आवश्यकता के अनुसार नियमन किया जाना चाहिए। यदि कानून-व्यवस्था की स्थिति के कारण किसी स्थान पर सीमित प्रतिबंध जरूरी हों, तो उनका आधार स्पष्ट और कानूनी होना चाहिए।
यह मामला 9 अक्टूबर को दिए गए अदालत के पहले निर्देशों से भी जुड़ा है। उस समय अदालत ने दिल्ली में प्रस्तावित प्रदर्शन को देखते हुए मेट्रो और रेल सेवाओं की आवाजाही पर पूर्ण रोक लगाने के बजाय उन्हें नियंत्रित तरीके से जारी रखने पर जोर दिया था। साथ ही, यात्रियों को समय रहते जानकारी देने के लिए ट्रैफिक और परिवहन संबंधी एडवाइजरी जारी करने की बात कही गई थी।
इसके बावजूद 10 अक्टूबर को दिल्ली मेट्रो नेटवर्क के कई स्टेशनों पर प्रवेश और निकास प्रतिबंधित किए जाने को लेकर सवाल उठे। सुनवाई के दौरान सरकार की ओर से बताया गया कि दिल्ली मेट्रो नेटवर्क के 303 स्टेशनों में से 45 स्टेशनों पर प्रवेश और निकास सीमित किया गया था। याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया कि इन प्रतिबंधों से लोगों को परेशानी हुई और पहले दिए गए न्यायालय के निर्देशों का पूरी तरह पालन नहीं हुआ।
अदालत ने संबंधित अधिकारियों से प्रभावित स्टेशनों का विवरण और प्रतिबंधों के कारणों की जानकारी देने को कहा है, ताकि यह समझा जा सके कि सुरक्षा व्यवस्था के तहत उठाए गए कदम किस सीमा तक जरूरी थे।
प्रदर्शनकारियों की हिरासत पर भी अदालत की टिप्पणी
सुनवाई के दौरान शांतिपूर्ण प्रदर्शन में शामिल लोगों को हिरासत में लिए जाने का मुद्दा भी उठा। सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि किसी व्यक्ति को गैरकानूनी तरीके से हिरासत में नहीं लिया जाना चाहिए। विशेष रूप से ऐसे लोगों के मामले में कानून की निर्धारित प्रक्रिया का पालन जरूरी है, जो शांतिपूर्ण ढंग से एकत्र हुए हों और उस क्षेत्र में हों जहां प्रतिबंधात्मक आदेश लागू नहीं हैं।
प्रदर्शनकारियों की ओर से पेश वकीलों ने आरोप लगाया कि बड़ी संख्या में लोगों को हिरासत में लिया गया और कुछ स्थानों पर लोगों की आवाजाही पर व्यापक प्रतिबंध लगाए गए। इन आरोपों पर अधिकारियों से जवाब मांगा गया है। अदालत ने हिरासत में लिए गए लोगों के संबंध में परिस्थितियों, प्रक्रिया और कार्रवाई के औचित्य को स्पष्ट करने की आवश्यकता पर जोर दिया।
हालांकि, अदालत ने यह भी कहा कि प्रदर्शन का अधिकार कानून के दायरे में रहकर इस्तेमाल किया जाना चाहिए। शांतिपूर्ण प्रदर्शन की अनुमति का अर्थ यह नहीं है कि प्रदर्शनकारी कानून-व्यवस्था संबंधी नियमों का उल्लंघन कर सकते हैं। इसी तरह, प्रशासन को भी प्रतिबंध लगाते समय कानूनी प्रक्रिया और आवश्यकताओं का पालन करना होगा।
सुप्रीम कोर्ट और अन्य अदालतों के आसपास प्रतिबंध हटाने का निर्देश
सुनवाई के दौरान अदालत को बताया गया कि सुप्रीम कोर्ट और उसके आसपास के क्षेत्र में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 163 के तहत प्रतिबंध लगाए जाने से संबंधित सूचना प्रदर्शित की गई थी।
इस पर पीठ ने संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिया कि सुप्रीम कोर्ट परिसर और आसपास लागू प्रतिबंधों से संबंधित नोटिस हटाया जाए, यदि ऐसा पहले से नहीं किया गया है। अदालत ने कहा कि नागरिकों और वकीलों को न्याय तक पहुंचने में किसी प्रकार की आशंका या बाधा नहीं होनी चाहिए।
इस निर्देश का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि सुरक्षा व्यवस्था के कारण लोग सुप्रीम कोर्ट या अन्य अदालतों तक पहुंचने से हतोत्साहित न हों। अदालत ने वकीलों और पत्रकारों को भी अपने पेशेवर कर्तव्यों का निर्वहन करने से नहीं रोकने की बात कही।
इंटरनेट सेवाएं बाधित नहीं करने पर भी जोर
सुप्रीम कोर्ट ने इंटरनेट सेवाओं को कानून के अनुसार सामान्य बनाए रखने का निर्देश दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि इंटरनेट सेवाओं में व्यवधान नहीं होना चाहिए, हालांकि कानून के तहत सक्षम अधिकारियों की शक्तियां बनी रहेंगी।
इंटरनेट पर प्रतिबंधों का मुद्दा इसलिए भी महत्वपूर्ण रहा क्योंकि प्रदर्शन के दौरान लोगों को सूचना प्राप्त करने, आपसी संपर्क बनाए रखने और परिवहन संबंधी अपडेट जानने में डिजिटल सेवाओं की जरूरत होती है। अदालत के निर्देशों का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि सुरक्षा उपायों के नाम पर सामान्य नागरिकों की संचार सुविधाएं अनावश्यक रूप से प्रभावित न हों।
CJP प्रदर्शन को लेकर क्यों बढ़े सुरक्षा प्रतिबंध?
CJP और अन्य समूहों की ओर से दिल्ली में प्रदर्शन का आह्वान किया गया था। प्रदर्शन से जुड़ी मांगों में मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) की प्रक्रिया को लेकर आपत्तियां शामिल थीं।
प्रदर्शन को देखते हुए राजधानी में सुरक्षा व्यवस्था बढ़ाई गई थी। मेट्रो स्टेशनों पर प्रतिबंध, रेल सेवाओं को लेकर जारी निर्देश और सड़कों पर बैरिकेडिंग इसी सुरक्षा व्यवस्था का हिस्सा थे। प्रशासन की चिंता संभावित भीड़ और कानून-व्यवस्था की स्थिति को लेकर थी, जबकि याचिकाकर्ताओं ने इन उपायों की व्यापकता और आम लोगों पर पड़ने वाले प्रभाव पर सवाल उठाए।
सुप्रीम कोर्ट के सामने मुख्य प्रश्न यह रहा कि सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए जरूरी सुरक्षा उपायों और नागरिकों की आवाजाही तथा शांतिपूर्ण प्रदर्शन के अधिकार के बीच संतुलन कैसे स्थापित किया जाए।
अधिकारियों से जवाब और अनुपालन रिपोर्ट तलब
अदालत ने पहले दिए गए निर्देशों के कथित उल्लंघन को लेकर दायर अवमानना याचिका पर संबंधित अधिकारियों को नोटिस जारी किया है। इसमें केंद्र सरकार, दिल्ली पुलिस और दिल्ली मेट्रो रेल कॉरपोरेशन से जुड़े अधिकारियों के नाम शामिल हैं।
अदालत ने अधिकारियों से संक्षिप्त हलफनामा और अनुपालन रिपोर्ट प्रस्तुत करने को कहा है। इसमें मेट्रो सेवाओं पर लगाए गए प्रतिबंधों, रेलवे संबंधी निर्देशों, ट्रैफिक एडवाइजरी और बैरिकेडिंग की समीक्षा से जुड़ी जानकारी शामिल हो सकती है।
मामले की अगली सुनवाई 13 अक्टूबर को निर्धारित की गई है। अदालत संबंधित पक्षों के जवाब और उपलब्ध विवरणों के आधार पर आगे की कार्यवाही करेगी। फिलहाल, अवमानना से संबंधित आरोपों पर अंतिम निष्कर्ष नहीं आया है।
