गणपति विसर्जन के बाद शुरू होगी बप्पा की ‘दूसरी यात्रा’, मूर्तियों के पुनर्चक्रण की बड़ी चुनौती

मुंबई | 28 सितंबर 2026

मुंबई में गणपति विसर्जन के साथ भले ही दस दिनों तक चला उत्सव समाप्त हो गया हो, लेकिन इसके बाद एक दूसरी बड़ी प्रक्रिया शुरू हो जाती है। समुद्र और अन्य जलाशयों में विसर्जित की गई गणेश प्रतिमाओं को निकालना, उन्हें सुरक्षित स्थानों तक पहुंचाना और फिर उनकी सामग्री को दोबारा उपयोग में लाना अब शहर के सामने बड़ी चुनौती है।

हर साल बड़ी संख्या में गणेश प्रतिमाएं समुद्र, नदियों और कृत्रिम विसर्जन कुंडों में विसर्जित की जाती हैं। विसर्जन के बाद इन प्रतिमाओं को तटों और जलाशयों से बाहर निकालकर अलग-अलग स्थानों पर ले जाया जाता है। इसके बाद मूर्तियों में इस्तेमाल सामग्री को अलग करने और उसे पुनर्चक्रण के लिए भेजने की प्रक्रिया शुरू होती है।

विसर्जन के बाद शुरू होती है असली चुनौती

गणपति उत्सव के दौरान लाखों श्रद्धालु अपने आराध्य को विदाई देने के लिए विसर्जन स्थलों पर पहुंचते हैं। भीड़ और भावनाओं के बीच विसर्जन का दृश्य बेहद भव्य होता है, लेकिन इसके बाद बड़ी संख्या में मूर्तियों का प्रबंधन करना प्रशासन के लिए चुनौती बन जाता है।

खास तौर पर ऐसी प्रतिमाएं, जिनमें प्लास्टर ऑफ पेरिस, रंग, सजावटी सामग्री और अन्य तत्वों का इस्तेमाल हुआ हो, उन्हें सीधे प्राकृतिक रूप से नष्ट होने में लंबा समय लग सकता है। इसलिए विसर्जन के बाद उनका व्यवस्थित संग्रह और प्रसंस्करण जरूरी हो जाता है।

मूर्तियों को दिया जा रहा है दूसरा जीवन

मुंबई में अब जोर इस बात पर है कि विसर्जन के बाद गणेश प्रतिमाओं को केवल कचरे के रूप में न देखा जाए। उनसे निकलने वाली सामग्री को अलग कर उसे दोबारा उपयोग में लाने की कोशिश की जा रही है।

मिट्टी जैसी सामग्री को उचित तरीके से प्रोसेस करके दोबारा इस्तेमाल किया जा सकता है, जबकि अन्य सामग्रियों को अलग-अलग श्रेणियों में बांटकर रिसाइक्लिंग के लिए भेजा जा सकता है। इस तरह विसर्जन के बाद प्रतिमाओं से निकलने वाले कचरे को दोबारा अर्थव्यवस्था का हिस्सा बनाने की दिशा में प्रयास किए जा रहे हैं।

समुद्र तटों की सफाई भी बड़ी जिम्मेदारी

विसर्जन के बाद समुद्र तटों की सफाई भी महत्वपूर्ण होती है। प्रतिमाओं के साथ फूल, कपड़े, सजावटी सामान और अन्य पूजन सामग्री भी जल में पहुंचती है। इन सामग्रियों को अलग करना और उनका उचित निपटान करना जरूरी होता है।

पर्यावरण के लिहाज से यह प्रक्रिया इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि विसर्जन के बाद बची सामग्री अगर लंबे समय तक जलाशयों या समुद्र तटों पर पड़ी रहे तो इसका असर आसपास के पर्यावरण पर पड़ सकता है।

लाखों प्रतिमाओं का प्रबंधन आसान नहीं

मुंबई जैसे बड़े शहर में गणपति उत्सव के दौरान विसर्जित होने वाली प्रतिमाओं की संख्या काफी ज्यादा होती है। ऐसे में हर प्रतिमा को निकालना, उसका परिवहन करना, उसे सुरक्षित रखना और फिर सामग्री को अलग-अलग करके प्रोसेस करना एक बड़ा लॉजिस्टिक ऑपरेशन बन जाता है।

इसके लिए प्रशासन, स्थानीय निकायों, स्वयंसेवी संगठनों और नागरिकों के बीच समन्वय की जरूरत होती है। साथ ही विसर्जन से पहले पर्यावरण-अनुकूल मूर्तियों और प्राकृतिक रंगों के इस्तेमाल को बढ़ावा देना भी इस चुनौती को कम करने में मदद कर सकता है।

बप्पा की विदाई के बाद शुरू होती है एक नई कहानी

गणपति विसर्जन श्रद्धा और परंपरा का हिस्सा है, लेकिन इसके बाद पर्यावरणीय जिम्मेदारी भी उतनी ही महत्वपूर्ण हो जाती है। मुंबई अब विसर्जित मूर्तियों की सामग्री को दोबारा उपयोग में लाने की दिशा में आगे बढ़ रही है।

बप्पा की विदाई के साथ कहानी खत्म नहीं होती। असली चुनौती यह है कि विसर्जन के बाद उनकी प्रतिमाएं कचरे का हिस्सा बनने के बजाय दोबारा किसी उपयोगी रूप में लौटें।

एक नजर में

  • स्थान: मुंबई
  • मुद्दा: गणपति विसर्जन के बाद मूर्तियों का प्रबंधन
  • मुख्य चुनौती: मूर्तियों को निकालना, परिवहन और संग्रहण
  • अगला चरण: सामग्री को अलग कर पुनर्चक्रण
  • पर्यावरणीय फोकस: समुद्र और जलाशयों को प्रदूषण से बचाना
  • उद्देश्य: विसर्जन के बाद सामग्री को दोबारा उपयोग में लाना
  • मुख्य संदेश: श्रद्धा के साथ पर्यावरण की जिम्मेदारी भी जरूरी है।

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