नई दिल्ली | 4 नवंबर 2026
देश के कई हिस्सों में बढ़ते वायु प्रदूषण के बीच केंद्र सरकार ने इसके स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभावों की निगरानी तेज करने का फैसला किया है। स्वास्थ्य मंत्रालय ने राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को निर्देश दिए हैं कि अस्पतालों में प्रदूषण से जुड़ी बीमारियों के मामलों की नियमित पहचान, रिकॉर्डिंग और रिपोर्टिंग की जाए।
इस पहल का उद्देश्य यह पता लगाना है कि खराब हवा के कारण कितने लोग सांस और हृदय संबंधी समस्याओं से प्रभावित हो रहे हैं। खासकर सर्दियों में दिल्ली-NCR और उत्तर भारत के कई शहरों में प्रदूषण का स्तर बढ़ने के कारण अस्पतालों में मरीजों की संख्या पर नजर रखने की जरूरत महसूस की जा रही है।
अस्पतालों को रोजाना दर्ज करना होगा मरीजों का डेटा
स्वास्थ्य मंत्रालय के नए दिशा-निर्देशों के अनुसार, अस्पतालों में संचालित चेस्ट क्लीनिकों को सांस और हृदय संबंधी समस्याओं से जुड़े मरीजों का नियमित रिकॉर्ड रखना होगा।
अस्पतालों को मरीजों की संख्या, उनकी स्वास्थ्य समस्याओं और संभावित प्रदूषण संबंधी प्रभावों का विवरण दर्ज करना होगा। इसके लिए विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के इंटरनेशनल क्लासिफिकेशन ऑफ डिजीजेज (ICD) कोड का इस्तेमाल किया जाएगा, ताकि अलग-अलग अस्पतालों से मिलने वाले आंकड़ों का एक समान तरीके से विश्लेषण किया जा सके।
अस्पतालों से प्राप्त दैनिक आंकड़े जिला और राज्य स्वास्थ्य अधिकारियों तक पहुंचेंगे। इसके बाद यह जानकारी राष्ट्रीय रोग नियंत्रण केंद्र (NCDC) को मासिक आधार पर भेजी जाएगी।
दिल्ली की हवा फिर पहुंची बेहद खराब श्रेणी में
सरकार का यह कदम ऐसे समय आया है, जब दिल्ली में वायु प्रदूषण एक बार फिर गंभीर चिंता का विषय बन गया है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) के अनुसार, 3 नवंबर को दिल्ली का औसत AQI 332 दर्ज किया गया, जो बहुत खराब श्रेणी में आता है।
राजधानी के जहांगीरपुरी इलाके में AQI 452 तक पहुंच गया था। इसके अलावा कई अन्य इलाकों में भी प्रदूषण का स्तर काफी अधिक दर्ज किया गया।
वायु गुणवत्ता में गिरावट के बाद वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (CAQM) ने GRAP के दूसरे चरण के तहत प्रतिबंध लागू किए हैं। इसमें सड़कों की सफाई, पानी का छिड़काव, धूल नियंत्रण और प्रदूषण फैलाने वाले स्रोतों पर निगरानी बढ़ाने जैसे उपाय शामिल हैं।
प्रदूषण से सांस और दिल की बीमारियों का खतरा
विशेषज्ञों के अनुसार, हवा में मौजूद PM2.5 जैसे सूक्ष्म कण सांस के जरिए फेफड़ों में गहराई तक पहुंच सकते हैं। लंबे समय तक इनके संपर्क में रहने से अस्थमा, सांस की तकलीफ, फेफड़ों की बीमारी और हृदय संबंधी समस्याओं का खतरा बढ़ सकता है।
बच्चों, बुजुर्गों और पहले से सांस या दिल की बीमारी से पीड़ित लोगों को प्रदूषित हवा से अधिक परेशानी हो सकती है।
दिल्ली के अस्पतालों में भी प्रदूषण के बढ़ते स्तर के बीच सांस संबंधी एलर्जी और अस्थमा के मरीजों की संख्या बढ़ने की जानकारी सामने आई है।
केवल दिल्ली नहीं, पूरे उत्तर भारत में बढ़ रही चुनौती
वायु प्रदूषण की समस्या किसी एक शहर तक सीमित नहीं है। वाहनों से निकलने वाला धुआं, औद्योगिक उत्सर्जन, निर्माण कार्यों की धूल और फसल अवशेष जलाने जैसी गतिविधियां अलग-अलग क्षेत्रों में हवा की गुणवत्ता प्रभावित करती हैं।
3 नवंबर को पंजाब में पराली जलाने की 584 घटनाएं दर्ज की गईं। इसी दिन छह राज्यों में कुल 798 घटनाएं सामने आईं। हालांकि, दिल्ली के प्रदूषण में इन घटनाओं का कितना योगदान रहा, यह मौसम और प्रदूषण के अन्य स्रोतों के साथ मिलाकर समझना जरूरी है।
क्या केवल मरीजों का रिकॉर्ड रखने से कम होगा प्रदूषण?
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि मरीजों का रिकॉर्ड तैयार करना समस्या को समझने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है, लेकिन इससे अपने आप प्रदूषण कम नहीं होगा।
इसके लिए परिवहन, उद्योग, कृषि, निर्माण और कचरा प्रबंधन से जुड़े क्षेत्रों में लंबे समय तक प्रभावी कदम उठाने होंगे। प्रदूषण फैलाने वाले स्रोतों पर नियंत्रण और राज्यों के बीच बेहतर समन्वय भी जरूरी है।
केंद्र की नई पहल से प्रदूषण और स्वास्थ्य के बीच संबंध को समझने के लिए अधिक व्यवस्थित आंकड़े मिलने की उम्मीद है। अब चुनौती इन आंकड़ों के आधार पर प्रभावी नीतियां और जमीनी कार्रवाई सुनिश्चित करने की होगी।
