मंच पर ‘मोहन-शिवराज’ की जुगलबंदी और भावुक ‘केवट’: राजनीतिक गलियारों में गरमाई चर्चा

दिनांक: 11 जून, 2026

भोपाल: मध्य प्रदेश की सियासत में इन दिनों दो दिग्गजों—मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव और केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान की केमिस्ट्री चर्चा का केंद्र बनी हुई है। हाल ही में एक सार्वजनिक मंच से उपवास के दौरान हुई टिप्पणियों और संबोधन ने राजनीतिक विश्लेषकों को फिर से सोचने पर मजबूर कर दिया है।

क्या हुआ मंच पर?

हालिया कार्यक्रमों में मुख्यमंत्री मोहन यादव और शिवराज सिंह चौहान के बीच मंच साझा करते हुए एक अलग ही दृश्य देखने को मिला। जहां कुछ समय पहले तक दोनों के बीच ‘असहजता’ की अटकलें लगाई जा रही थीं, वहीं अब दोनों नेता एक-दूसरे के कार्यों की खुले दिल से सराहना कर रहे हैं। शिवराज सिंह ने मंच से साफ तौर पर कहा, “किसी को कोई गलतफहमी नहीं होनी चाहिए, उनके (सीएम) प्रति हमारा स्नेह सदैव बरकरार रहेगा।”

‘केवट’ का समर्पण और भावुकता

इस पूरे घटनाक्रम के दौरान ‘केवट’ (निषाद राज) प्रसंग का जिक्र भी खूब हुआ। रामायण की कथा के माध्यम से सीएम मोहन यादव ने समाज में समरसता और निस्वार्थ सेवा का संदेश दिया। उन्होंने प्रभु राम और केवट के संवाद का उल्लेख करते हुए बताया कि कैसे ‘पद और अहंकार’ से ऊपर उठकर संबंधों की मर्यादा निभानी चाहिए। मंच पर जब सीएम ने जन-कल्याणकारी योजनाओं का बखान किया, तो शिवराज सिंह चौहान ने भी उनके साथ कदम मिलाकर जनता का अभिवादन स्वीकार किया।

विवादों के बीच ‘अपशब्दों’ का शोर

हालांकि, इस मधुर वातावरण के साथ-साथ राज्य में कुछ अन्य घटनाएं भी सुर्खियां बटोर रही हैं। मुख्यमंत्री के एक पुराने वायरल वीडियो, जिसमें उन्होंने पंचायत सचिवों और अन्य कर्मचारियों के प्रति तीखी भाषा का इस्तेमाल किया था, उसे विपक्षी दल आज भी ‘सत्ता के अहंकार’ के रूप में उछाल रहे हैं। विपक्ष का आरोप है कि उपवास जैसे पवित्र आयोजनों के मंच पर भी कभी-कभी भाषा की मर्यादा टूटती है, जो लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए चिंताजनक है।

राजनीतिक गलियारों की इनसाइड स्टोरी

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि ‘मोहन के चरणों में केवट’ जैसी उपमाओं के जरिए सीएम एक संदेश देना चाहते हैं—कि वे निषाद समाज और गरीब तबके के साथ पूरी मजबूती से खड़े हैं। वहीं, शिवराज सिंह का यह कहना कि “मोहन जी का नाम मैंने प्रस्तावित किया था”, यह स्पष्ट करता है कि पार्टी में अब सब कुछ ‘ऑल इज वेल’ है।

यह जुगलबंदी न केवल अफवाहबाजों के लिए करारा जवाब है, बल्कि आगामी चुनावों की रणनीति में ‘समरसता’ को सबसे बड़ा हथियार बनाने की एक सोची-समझी कोशिश भी मानी जा रही है।

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