नई दिल्ली/ओडिशा, 25 अगस्त 2026: जलवायु परिवर्तन अब केवल बढ़ते तापमान या बदलते मौसम तक सीमित नहीं रह गया है। भारत के कई तटीय इलाकों में इसका असर लोगों के घर, जमीन, रोजगार और सामाजिक पहचान तक पहुंच गया है। समुद्री कटाव, चक्रवात, बाढ़ और बढ़ते जलस्तर के कारण कुछ गांव ऐसे हालात में पहुंच गए हैं जहां लोगों के लिए अपने पुश्तैनी घरों में रहना सुरक्षित नहीं रह गया है। ऐसे में परिवारों को मजबूर होकर नई जगहों पर बसना पड़ रहा है।
ओडिशा का पुराना पोडमपेट्टा गांव इस बदलती तस्वीर का एक अहम उदाहरण है। कभी समुद्र के किनारे बसा यह गांव मछुआरों की जिंदगी का केंद्र था। समुद्र ही उनकी रोजी-रोटी था और पीढ़ियों से उनका जीवन इसी तट से जुड़ा हुआ था। लेकिन समुद्री कटाव और बार-बार आने वाले चक्रवातों ने धीरे-धीरे गांव की जमीन और घरों को अपनी चपेट में लेना शुरू कर दिया।
आखिरकार वह समय आया जब गांव के लोगों को अपना पुराना घर छोड़कर सुरक्षित जगह पर बसना पड़ा।
समुद्र के बढ़ते खतरे ने उजाड़ दिया पूरा गांव
पोडमपेट्टा की कहानी अचानक शुरू नहीं हुई। वर्षों तक समुद्र का कटाव धीरे-धीरे गांव की जमीन को कम करता रहा। इसके साथ चक्रवातों की मार ने स्थिति को और गंभीर बनाया।
जिन परिवारों के घर समुद्र के करीब थे, उनके सामने सबसे पहले सुरक्षा का संकट खड़ा हुआ। तेज लहरों और तूफानों के दौरान घरों को नुकसान होने लगा। जमीन लगातार कटती गई और लोगों को यह समझ आने लगा कि आने वाले समय में यहां रहना और मुश्किल हो सकता है।
आखिरकार गांव के लोगों को सुरक्षित स्थान पर स्थानांतरित करने की जरूरत महसूस हुई।
यह सिर्फ मकान बदलने की कहानी नहीं थी। लोगों को अपने उस स्थान से दूर जाना पड़ा जहां उनकी पीढ़ियां पली-बढ़ी थीं।
दक्षिण एशिया में बढ़ रही जलवायु विस्थापन की समस्या
पोडमपेट्टा अकेला उदाहरण नहीं है। भारत और बांग्लादेश के कई तटीय क्षेत्रों में जलवायु आपदाओं के कारण लोगों के विस्थापित होने की समस्या बढ़ रही है।
रिपोर्ट के अनुसार, 2024 में भारत और बांग्लादेश में तेज प्राकृतिक आपदाओं के कारण करीब 80 लाख लोग अपने ही देशों के भीतर विस्थापित हुए। इनमें कई लोग बाढ़ या चक्रवात के दौरान कुछ समय के लिए सुरक्षित स्थानों पर चले गए और उनका इरादा वापस लौटने का था। लेकिन कुछ परिवारों के लिए पुरानी जगह पर लौटना संभव नहीं रहा।
ऐसे मामलों में अस्थायी राहत से आगे बढ़कर स्थायी पुनर्वास की जरूरत पड़ती है।
इसी प्रक्रिया को नियोजित पुनर्वास या नियोजित स्थानांतरण कहा जाता है।
नया घर मिल गया, लेकिन जिंदगी कैसे चलेगी?
किसी परिवार को नया मकान दे देना पुनर्वास की पूरी प्रक्रिया नहीं है।
जलवायु विस्थापन का सबसे बड़ा सवाल यही है कि नई जगह पर लोग रोजगार कैसे करेंगे?
मछुआरों के लिए समुद्र सिर्फ प्राकृतिक दृश्य नहीं है, बल्कि उनका काम और आय का मुख्य स्रोत है। किसानों के लिए खेत ही उनकी रोजी-रोटी का आधार हैं।
अगर लोगों को सुरक्षित स्थान पर तो पहुंचा दिया जाए लेकिन उनकी आजीविका का साधन उनसे दूर हो जाए, तो नया पुनर्वास आर्थिक संकट पैदा कर सकता है।
यही वजह है कि विशेषज्ञ अब पुनर्वास योजनाओं को केवल मकान बनाने की परियोजना के रूप में नहीं देखते।
ओडिशा में आजीविका का संकट
ओडिशा के कुछ क्षेत्रों में पुनर्वास के बाद लोगों ने बताया कि उन्हें घर बनाने के लिए जमीन मिली, लेकिन खेती के लिए पर्याप्त जमीन उपलब्ध नहीं हुई।
पुरानी जगह पर परिवार खेती, जंगल और आसपास के जल स्रोतों से अपनी कई जरूरतें पूरी कर लेते थे। नई जगह पर उन्हें भोजन और रोजमर्रा की कई चीजें बाजार से खरीदनी पड़ने लगीं।
इससे नकद पैसे पर निर्भरता बढ़ी।
यानी जिस पुनर्वास का उद्देश्य लोगों को सुरक्षित और बेहतर जीवन देना था, वह अगर रोजगार की समस्या हल न करे तो परिवारों को आर्थिक रूप से कमजोर कर सकता है।
रोजगार न मिला तो फिर शुरू हो जाता है पलायन
पुनर्वास के बाद भी अगर लोगों को रोजगार नहीं मिलता, तो एक दूसरी समस्या पैदा होती है।
परिवार का कोई सदस्य काम की तलाश में दूसरे शहर जा सकता है। कई बार पूरा परिवार ही किसी दूसरे इलाके में पलायन कर जाता है।
इससे एक बड़ा सवाल सामने आता है—अगर किसी गांव को जलवायु संकट के कारण विस्थापित किया गया और वहां बसने के बाद भी लोग रोजगार की तलाश में दूसरी जगह चले गए, तो क्या पुनर्वास वास्तव में सफल हुआ?
विशेषज्ञों के मुताबिक पुनर्वास की सफलता को सिर्फ इस आधार पर नहीं मापा जाना चाहिए कि कितने मकान बनाए गए।
स्कूल और अस्पताल भी उतने ही जरूरी
नई बस्ती में घर के साथ-साथ स्कूल, स्वास्थ्य केंद्र, सड़क, बिजली, पानी और परिवहन जैसी सुविधाएं भी जरूरी हैं।
अगर परिवारों को सुरक्षित मकान मिल जाए लेकिन बच्चों के लिए स्कूल दूर हो, अस्पताल तक पहुंच मुश्किल हो और सड़क खराब हो, तो जीवन की मुश्किलें खत्म नहीं होतीं।
कुछ पुनर्वास क्षेत्रों में जलभराव और खराब सड़कों जैसी समस्याएं सामने आने का भी उल्लेख रिपोर्ट में किया गया है।
इसलिए जलवायु पुनर्वास को एक व्यापक विकास योजना के रूप में देखने की जरूरत है।
नई जगह पर सामाजिक पहचान भी बचानी होगी
किसी गांव को दूसरी जगह बसाने का मतलब केवल लोगों को एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाना नहीं है।
हर समुदाय की अपनी संस्कृति, परंपरा, सामाजिक संबंध और जीवनशैली होती है।
मछुआरा समुदाय के लिए समुद्र से रिश्ता केवल आर्थिक नहीं बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक भी हो सकता है।
इसी तरह ग्रामीण समुदायों के लिए खेत, तालाब, जंगल और आसपास के प्राकृतिक संसाधन उनकी पहचान का हिस्सा होते हैं।
अगर पुनर्वास के दौरान इन सामाजिक संबंधों को पूरी तरह नजरअंदाज किया जाए तो लोगों को नई जगह पर अपनापन महसूस करने में मुश्किल हो सकती है।
लोगों की राय से बननी चाहिए पुनर्वास योजना
रिपोर्ट में एक महत्वपूर्ण बात यह सामने आती है कि पुनर्वास की योजना में स्थानीय लोगों की भागीदारी जरूरी है।
सरकार या प्रशासन अगर सिर्फ अपनी तरफ से नई बस्ती तैयार कर दे और लोगों से उनकी जरूरतों के बारे में न पूछे, तो नई जगह कई व्यावहारिक समस्याएं पैदा कर सकती है।
लोगों से यह पूछा जाना चाहिए कि:
- वे कहां रहना चाहते हैं?
- उनके रोजगार का मुख्य साधन क्या है?
- बच्चों की शिक्षा की जरूरत क्या है?
- पशुपालन या खेती के लिए कितनी जगह चाहिए?
- बाजार और अस्पताल कितनी दूरी पर होने चाहिए?
- समुदाय के धार्मिक और सांस्कृतिक स्थान कहां बनाए जाएं?
इन सवालों का जवाब पुनर्वास की सफलता में अहम भूमिका निभा सकता है।
पोडमपेट्टा से मिली सकारात्मक सीख
पुराना पोडमपेट्टा पूरी तरह निराशाजनक उदाहरण नहीं है।
रिपोर्ट के अनुसार, वहां लोगों के लिए नई बस्ती समुद्र से कुछ अंदर बनाई गई। स्थान के चयन में स्थानीय समुदाय की महत्वपूर्ण भूमिका रही। नई जगह समुद्री कटाव और चक्रवात के खतरे से अपेक्षाकृत सुरक्षित है। साथ ही समुद्र से बहुत अधिक दूरी न होने के कारण मछुआरों की आजीविका पर भी बड़ा असर नहीं पड़ा।
यह उदाहरण दिखाता है कि अगर स्थानीय लोगों की जरूरतों को समझकर पुनर्वास किया जाए तो विस्थापन के बाद भी समुदाय अपनी जिंदगी दोबारा व्यवस्थित कर सकता है।
सिर्फ सुरक्षित जगह नहीं, सुरक्षित भविष्य जरूरी
जलवायु संकट के कारण विस्थापन आने वाले समय में और बड़ा मुद्दा बन सकता है।
अगर समुद्र का स्तर बढ़ता है, तटीय कटाव तेज होता है और चक्रवातों की मार बढ़ती है, तो कई तटीय समुदायों के सामने अपने घर छोड़ने का खतरा बढ़ सकता है।
ऐसे में सरकारों के सामने केवल यह चुनौती नहीं होगी कि लोगों को कहां बसाया जाए।
असल चुनौती होगी कि उन्हें कैसे सुरक्षित, सम्मानजनक और आर्थिक रूप से टिकाऊ जीवन दिया जाए।
महिलाओं और बच्चों पर भी पड़ता है असर
जलवायु आपदा के बाद होने वाला विस्थापन परिवार के हर सदस्य को प्रभावित करता है।
बच्चों की पढ़ाई बाधित हो सकती है। महिलाओं के लिए पानी, स्वास्थ्य और रोजगार से जुड़ी समस्याएं बढ़ सकती हैं। बुजुर्गों के लिए नई जगह पर सामाजिक नेटवर्क टूटना मुश्किल पैदा कर सकता है।
इसलिए पुनर्वास नीति में केवल मकान और सड़क पर ध्यान देना पर्याप्त नहीं होगा।
महिलाओं, बच्चों, बुजुर्गों और कमजोर वर्गों की जरूरतों को भी योजना का हिस्सा बनाना होगा।
जलवायु परिवर्तन और पलायन का बढ़ता संबंध
जलवायु परिवर्तन अब धीरे-धीरे लोगों के रहने की जगह तय करने वाला महत्वपूर्ण कारक बन रहा है।
जहां पहले लोग रोजगार या शिक्षा के लिए गांव छोड़ते थे, वहीं अब कुछ समुदायों के सामने सुरक्षा के कारण घर छोड़ने की स्थिति पैदा हो रही है।
यह पलायन सामान्य आर्थिक पलायन से अलग है क्योंकि इसमें व्यक्ति के पास हमेशा अपनी इच्छा से जगह चुनने का विकल्प नहीं होता।
समुद्र बढ़ रहा हो, जमीन कट रही हो या चक्रवात बार-बार घर तबाह कर रहे हों, तो सुरक्षित स्थान पर जाना मजबूरी बन सकता है।
क्या भारत तैयार है?
भारत के सामने एक बड़ी चुनौती यह है कि जलवायु जोखिम वाले क्षेत्रों में रहने वाली आबादी बहुत बड़ी है।
तटीय गांवों के अलावा नदी किनारे के क्षेत्र, बाढ़ प्रभावित मैदानी इलाके और पहाड़ी क्षेत्र भी जलवायु आपदाओं से प्रभावित हो सकते हैं।
ऐसे में भविष्य की योजनाओं में जलवायु अनुकूल आवास, सुरक्षित बस्तियां और आजीविका संरक्षण को प्राथमिकता देना जरूरी होगा।
सिर्फ आपदा आने के बाद राहत देना पर्याप्त नहीं होगा। पहले से जोखिम की पहचान करके लोगों को सुरक्षित बनाने की रणनीति तैयार करनी होगी।
पुनर्वास की सफलता कैसे तय होगी?
किसी पुनर्वास योजना को सफल मानने के लिए कई सवालों के जवाब जरूरी हैं।
क्या लोगों के पास सुरक्षित घर है?
क्या उन्हें रोजगार मिला?
क्या बच्चों के लिए स्कूल है?
क्या अस्पताल और स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध हैं?
क्या सड़क और परिवहन की सुविधा है?
क्या नई जगह बाढ़ और चक्रवात से सुरक्षित है?
क्या समुदाय की सामाजिक और सांस्कृतिक पहचान बची है?
अगर इन सवालों के जवाब सकारात्मक हैं, तभी पुनर्वास को वास्तव में सफल कहा जा सकता है।
जलवायु संकट का मानवीय चेहरा
जलवायु परिवर्तन पर चर्चा अक्सर तापमान, समुद्र के स्तर, कार्बन उत्सर्जन और मौसम के आंकड़ों तक सीमित रहती है।
लेकिन पोडमपेट्टा जैसे गांव बताते हैं कि इसके पीछे इंसानों की जिंदगी भी बदल रही है।
एक परिवार के लिए घर छोड़ना सिर्फ ईंट-पत्थर की इमारत छोड़ना नहीं है। वह अपनी यादें, पड़ोसी, रिश्ते, रोजगार और अपनी पहचान का एक हिस्सा पीछे छोड़ता है।
इसीलिए जलवायु विस्थापन को केवल पर्यावरणीय नहीं बल्कि सामाजिक और मानवीय चुनौती के रूप में भी देखना होगा।
आने वाले समय के लिए बड़ी चुनौती
अगर जलवायु संकट बढ़ता है तो दुनिया के कई हिस्सों में समुदायों को अपने घर छोड़ने पड़ सकते हैं।
भारत में विशेष रूप से तटीय क्षेत्रों में समुद्री कटाव और चक्रवातों का जोखिम महत्वपूर्ण है। ऐसे में नियोजित पुनर्वास की नीतियां भविष्य में और जरूरी हो सकती हैं।
लेकिन इसके लिए लंबे समय की योजना, पर्याप्त वित्तीय संसाधन और स्थानीय समुदायों की भागीदारी जरूरी होगी।
