कोलकाता / नई दिल्ली | 13 अगस्त, 2026
पश्चिम बंगाल की राजनीति में तृणमूल कांग्रेस (TMC) के भीतर मची उथल-पुथल और पार्टी में आए ऐतिहासिक विभाजन ने देश की सियासत को गरमा दिया है। डेढ़ दशक तक बंगाल की सत्ता पर एकछत्र राज करने वाली ममता बनर्जी के चुनाव हारते ही पार्टी के भीतर भगदड़ मच गई। सत्ता जाने के महज कुछ ही दिनों के भीतर एक गुप्त लेटर और एक हाई-प्रोफाइल मुलाकात के जरिए टीएमसी के टूटने की पटकथा लिखी गई, जिसमें विरोधी खेमे के रणनीतिकारों और बागी नेताओं ने अहम भूमिका निभाई। आइए जानते हैं उस सियासी घटनाक्रम के बारे में, जिसने बंगाल की मुख्य विपक्षी पार्टी को अंदर से तहस-नहस कर दिया।
Hindustan Times+ 1
1. ममता के हारते ही शुरू हुआ गुप्त प्लान और ‘लेटर बम’
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों में हार का परिणाम आते ही तृणमूल कांग्रेस के भीतर असंतोष का बांध टूट पड़ा:
- बगावत की सुगबुगाहट: चुनाव परिणामों के तुरंत बाद पार्टी के कई वरिष्ठ नेताओं और विधायकों को यह अहसास हो गया कि अब ममता बनर्जी के नेतृत्व में पार्टी का पुराना रसूख बनाए रखना मुश्किल होगा। इसी मौके का फायदा उठाते हुए पार्टी के भीतर भीतरखाने गुप्त बैठकों का दौर शुरू हुआ। The Times of India+ 1
- 58 विधायकों के हस्ताक्षर वाला लेटर: बगावत का नेतृत्व कर रहे असंतुष्ट नेताओं ने पार्टी पर अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए विधानसभा अध्यक्ष को एक गोपनीय पत्र सौंपा। इस लेटर में दावा किया गया कि तृणमूल के एक बड़े धड़े (करीब 58 विधायकों) का नेतृत्व अब पारंपरिक पाले से हटकर बागी गुالف के पास होना चाहिए। इस पत्र ने पार्टी हाईकमान के होश उड़ा दिए और साफ हो गया कि पार्टी अब दो फाड़ होने की कगार पर पहुंच चुकी है। The Times of India+ 1
2. चार दिन बाद शुभेंदु अधिकारी की एंट्री और प्रशासनिक बैठकों का दौर
लेटर सामने आने के ठीक चार दिन बाद इस पूरे घटनाक्रम में सबसे बड़ा राजनीतिक मोड़ आया, जब राज्य की सत्ता संभालने वाले मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी की इस गुप्त रणनीति में सीधी एंट्री हुई:
- बागी नेताओं की सीएम से मुलाकात: ममता बनर्जी के धड़े से बगावत करने वाले कई प्रमुख विधायक और सांसद कोलकाता स्थित नबान्न (राज्य सचिवालय) पहुंचे और मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी से मुलाकात की। The Times of India
- समीक्षा बैठकों में शिरकत: जिन नेताओं को कभी ममता बनर्जी का सबसे वफादार सिपाही माना जाता था, वे अब सरकार द्वारा बुलाई गई प्रशासनिक समीक्षा बैठकों में खुलकर शामिल होने लगे। बागी गुट के नेताओं का मानना था कि वे विकास कार्यों और अपने विधानसभा क्षेत्रों के फंड को बचाने के लिए नई व्यवस्था के साथ तालमेल बिठाने को मजबूर हैं।
3. संसद से लेकर सड़क तक बिखराव, ममता के हाथ से फिसली पार्टी
यह आंतरिक कलह केवल राज्य की विधानसभा तक सीमित नहीं रही, बल्कि इसका असर दिल्ली तक देखने को मिला:
- सांसदों का पाला बदलना: टीएमसी के कई लोकसभा सांसदों ने भी दिल्ली में डेरा डाला और पार्टी लाइन से हटकर अलग गुट बनाने की कवायد शुरू कर दी। संसद के भीतर बागी सांसदों ने एक अलग ब्लॉक के रूप में बैठने की मांग तक कर डाली। Hindustan Times
- पारंपरिक नेतृत्व लाचार: ममता बनर्जी ने अपनी पुरानी साख बचाने और पार्टी को टूटने से रोकने के लिए कई धरने और बैठकें कीं, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। पार्टी के भीतर एक के बाद एक इस्तीफों और बगावती सुरों ने यह साबित कर दिया कि एक दौर की अजेय पार्टी अब इतिहास के सबसे बड़े आंतरिक संकट से गुजर रही है।
इस तरह, एक गुप्त पत्र के सियासी वार और रणनीतिक मुलाकातों के जरिए टीएमसी का यह बड़ा राजनीतिक विभाजन पूरा हुआ, जिसने बंगाल की सत्ता समीकरण को पूरी तरह बदल कर रख दिया है।
