साल में सिर्फ 5 दिन दर्शन देती हैं मां दुर्गा की स्वर्ण प्रतिमा, 360 दिन बैंक लॉकर में रहती है सुरक्षित

पुरुलिया | 14 अक्टूबर 2026

शारदीय नवरात्रि और दुर्गा पूजा के दौरान देशभर में मां दुर्गा की आराधना की जाती है। कहीं भव्य पंडाल सजाए जाते हैं, तो कहीं सदियों पुरानी परंपराओं के साथ पूजा-अर्चना होती है। पश्चिम बंगाल के पुरुलिया जिले की जयपुर राजबाड़ी में दुर्गा पूजा की एक ऐसी परंपरा है, जो अपने अनोखे स्वरूप के कारण लोगों का ध्यान खींचती है। यहां मां दुर्गा की स्वर्ण प्रतिमा साल के लगभग 360 दिन बैंक लॉकर में सुरक्षित रखी जाती है और पूजा के अवसर पर ही बाहर निकाली जाती है।

करीब 400 साल पुरानी है जयपुर राजबाड़ी की पूजा

जयपुर राजबाड़ी की दुर्गा पूजा को राजपरिवार की करीब 400 साल पुरानी धार्मिक परंपरा से जुड़ा बताया जाता है। राजपरिवार से मिली जानकारी के अनुसार, इस पूजा की शुरुआत कई पीढ़ियों पहले हुई थी। समय के साथ पूजा का स्वरूप बदला, लेकिन मां दुर्गा के प्रति आस्था और परंपरा आज भी कायम है।

इस पूजा की सबसे खास पहचान मां दुर्गा की स्वर्ण प्रतिमा और चांदी का चालचित्र है। प्रतिमा सामान्य दुर्गा प्रतिमाओं से अलग द्विभुजा स्वरूप में है। इसे देखने के लिए पुरुलिया के अलावा पश्चिम बंगाल के दूसरे जिलों और अन्य राज्यों से भी श्रद्धालु पहुंचते हैं।

राजा को सपने में मिला था स्वर्ण प्रतिमा स्थापित करने का संकेत

राजपरिवार से जुड़ी मान्यता के अनुसार, राजा काशीनाथ सिंह के समय पूजा के दौरान मंदिर में आग लगने की घटना हुई थी। इसके बाद राजा ने मां दुर्गा की स्वर्ण प्रतिमा स्थापित करने का संकल्प लिया। परंपरागत कथा के मुताबिक, राजा को सपने में मां दुर्गा ने स्वर्ण प्रतिमा स्थापित करने का संकेत दिया था।

इसके बाद बनारस के कारीगरों को बुलाकर मां दुर्गा की स्वर्ण प्रतिमा और चांदी का चालचित्र तैयार कराया गया। यह प्रसंग राजपरिवार की धार्मिक मान्यताओं और पूजा के इतिहास का हिस्सा है।

चोरी की घटना के बाद बैंक लॉकर में रखने का फैसला

जयपुर राजबाड़ी में चोरी की घटना के बाद स्वर्ण प्रतिमा की सुरक्षा को लेकर विशेष इंतजाम किए गए। बताया जाता है कि चोरी में कई कीमती सामान और आभूषण ले जाए गए थे। इसके बाद पुलिस की सलाह पर प्रतिमा को पूजा के दिनों को छोड़कर साल के बाकी समय बैंक लॉकर में सुरक्षित रखने की व्यवस्था की गई।

तभी से यह परंपरा जारी है। दुर्गा पूजा के दौरान षष्ठी के दिन प्रतिमा को कड़ी पुलिस सुरक्षा के बीच बैंक लॉकर से निकालकर राजबाड़ी लाया जाता है। पूजा समाप्त होने के बाद दशमी के दिन इसे दोबारा बैंक लॉकर में रख दिया जाता है।

षष्ठी से शुरू होती है पूजा, सुरक्षा के रहते हैं विशेष इंतजाम

दुर्गा पूजा के अवसर पर स्वर्ण प्रतिमा को राजबाड़ी लाने की प्रक्रिया विशेष सुरक्षा व्यवस्था के बीच पूरी की जाती है। प्रतिमा की सुरक्षा के लिए पुलिस निगरानी रहती है और पूजा के दौरान भी इंतजामों पर विशेष ध्यान दिया जाता है।

राजबाड़ी से जुड़ी पुरानी परंपराओं के अनुसार, पहले यहां दुर्गा पूजा बड़े राजसी अंदाज में आयोजित होती थी। उस दौर में हाथियों, घोड़ों और बड़ी संख्या में लोगों की मौजूदगी से उत्सव का स्वरूप भव्य होता था। समय के साथ व्यवस्थाएं बदलीं, लेकिन पूजा का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व बना हुआ है।

आज भी श्रद्धालुओं के आकर्षण का केंद्र है राजबाड़ी

जयपुर राजबाड़ी की दुर्गा पूजा केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि क्षेत्र की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत का भी हिस्सा है। साल के अधिकांश समय बैंक लॉकर में सुरक्षित रहने वाली स्वर्ण प्रतिमा को पूजा के दौरान देखने का अवसर श्रद्धालुओं के लिए खास होता है।

करीब चार सदियों से चली आ रही इस परंपरा में आस्था के साथ-साथ विरासत और सुरक्षा का अनूठा मेल दिखाई देता है। राजपरिवार की पूजा परंपरा आज भी स्थानीय लोगों और दूर-दराज से आने वाले भक्तों के लिए आकर्षण बनी हुई है।

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