नई दिल्ली, 2 सितंबर 2026: भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव का पर्व श्रीकृष्ण जन्माष्टमी 4 सितंबर 2026, शुक्रवार को मनाया जाएगा। इस बार जन्माष्टमी को लेकर धार्मिक आस्था के साथ-साथ ज्योतिषीय दृष्टि से भी विशेष चर्चा हो रही है। ज्योतिषीय गणनाओं के अनुसार, जन्माष्टमी की रात कई शुभ ग्रह-नक्षत्रीय परिस्थितियों का मेल बन रहा है, जिसे कुछ ज्योतिषाचार्य द्वापर युग में भगवान श्रीकृष्ण के जन्म के समय बने संयोगों से जोड़कर देख रहे हैं।
मान्यता है कि भगवान श्रीकृष्ण का जन्म भाद्रपद कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मध्यरात्रि में रोहिणी नक्षत्र के दौरान हुआ था। 2026 में भी जन्माष्टमी पर अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र का विशेष संयोग बताया जा रहा है। इसी वजह से इस बार का पर्व ज्योतिषीय नजरिए से खास माना जा रहा है।
🌙 15 साल बाद अष्टमी और रोहिणी का खास संयोग?
इस साल जन्माष्टमी से जुड़ी सबसे बड़ी चर्चा अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र के मेल को लेकर है।
धार्मिक मान्यता के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण का जन्म रोहिणी नक्षत्र में हुआ था। इसलिए जब जन्माष्टमी के दिन रोहिणी नक्षत्र का संयोग बनता है तो इसे विशेष महत्व दिया जाता है।
कुछ रिपोर्टों में इसे करीब 15 साल बाद बनने वाला विशेष संयोग बताया गया है।
यही वजह है कि इस बार मंदिरों में जन्माष्टमी की तैयारियों और विशेष पूजा को लेकर भक्तों में काफी उत्साह देखने को मिल रहा है।
✨ ग्रहों की स्थिति भी बताई जा रही है खास
Aaj Tak की रिपोर्ट के मुताबिक, इस जन्माष्टमी पर पांच प्रमुख ग्रहों की स्थिति को ज्योतिषीय दृष्टि से अनुकूल बताया गया है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि:
- चंद्रमा वृषभ राशि में रहेंगे।
- बृहस्पति कर्क राशि में अपनी उच्च स्थिति में बताए गए हैं।
- सूर्य सिंह राशि में अपनी स्वराशि में रहेंगे।
- शुक्र तुला राशि में अपनी स्वराशि में रहेंगे।
- बुध भी अनुकूल स्थिति में रहने की बात कही गई है।
ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार ग्रहों की ऐसी स्थिति को सकारात्मक माना जाता है और इसका प्रभाव अलग-अलग राशियों पर अलग तरीके से पड़ सकता है।
🪷 भगवान कृष्ण के जन्मकाल से क्यों की जा रही तुलना?
पौराणिक मान्यताओं में भगवान श्रीकृष्ण के जन्म का वर्णन भाद्रपद कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि की मध्यरात्रि में किया गया है।
कथाओं के अनुसार उस समय:
अष्टमी तिथि + रोहिणी नक्षत्र + मध्यरात्रि + वृषभ राशि में चंद्रमा
का विशेष संयोग था।
इसी वजह से जब वर्तमान समय में जन्माष्टमी के आसपास अष्टमी और रोहिणी नक्षत्र का मेल बनता है, तो ज्योतिषीय लेखों में इसे “द्वापर युग जैसा संयोग” कहा जाता है।
हालांकि इसे धार्मिक-ज्योतिषीय मान्यता के रूप में ही देखना चाहिए।
💰 इन राशियों के लिए शुभ बताया जा रहा है समय
ज्योतिषीय गणना के आधार पर कुछ राशियों के लिए जन्माष्टमी के आसपास का समय आर्थिक, करियर और व्यक्तिगत मामलों में सकारात्मक बताया गया है।
🐂 1. वृषभ राशि
वृषभ राशि वालों के लिए यह समय आर्थिक दृष्टि से अच्छा माना जा रहा है।
अटका हुआ पैसा मिलने, आय के नए स्रोत बनने या व्यापार में नए अवसर आने की संभावना बताई गई है।
नौकरी करने वाले लोगों को अपने काम के लिए प्रशंसा मिल सकती है। व्यापारियों के लिए भी नए संपर्क और लाभ के अवसर बनने की बात कही जा रही है।
क्या करें: जन्माष्टमी पर भगवान कृष्ण को माखन-मिश्री का भोग लगाएं और अपनी आर्थिक परेशानियों के समाधान के लिए प्रार्थना करें।
🦀 2. कर्क राशि
कर्क राशि के जातकों के लिए जन्माष्टमी का समय करियर और पारिवारिक जीवन में सकारात्मक बदलाव लेकर आने वाला बताया जा रहा है।
नौकरीपेशा लोगों को नई जिम्मेदारी, प्रमोशन या बेहतर अवसर मिलने की संभावना बताई गई है।
परिवार में भी सुख-शांति का वातावरण बन सकता है।
क्या करें: कृष्ण मंदिर में जाकर दर्शन करें और जरूरतमंद व्यक्ति को भोजन या वस्त्र का दान करें।
🦁 3. सिंह राशि
सिंह राशि वालों के लिए यह समय आत्मविश्वास और करियर के लिहाज से अच्छा माना जा रहा है।
जो लोग काफी समय से किसी नए काम की शुरुआत करने की योजना बना रहे हैं, उन्हें आगे बढ़ने का अवसर मिल सकता है।
नौकरी और व्यवसाय में नई जिम्मेदारियां मिल सकती हैं।
क्या करें: जन्माष्टमी की रात भगवान कृष्ण को तुलसी दल अर्पित करें और “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का जाप करें।
⭐ 4. चौथी राशि के लिए भी शुभ संकेत
ज्योतिषीय रिपोर्टों में जन्माष्टमी के इस विशेष संयोग का सकारात्मक प्रभाव कुछ अन्य राशियों पर भी बताया गया है। अलग-अलग ज्योतिषीय गणनाओं और प्रकाशनों में राशियों की सूची में अंतर देखने को मिलता है।
इसलिए किसी एक राशि को निश्चित रूप से “सबसे भाग्यशाली” बताने के बजाय यह समझना बेहतर है कि ये भविष्यवाणियां ज्योतिषीय गणनाओं पर आधारित हैं और व्यक्ति की कुंडली के अनुसार परिणाम अलग हो सकते हैं।
🪔 जन्माष्टमी की रात क्या करें?
जन्माष्टमी पर भगवान श्रीकृष्ण की पूजा का मुख्य समय निशिता काल यानी मध्यरात्रि माना जाता है।
इस दौरान भक्त भगवान कृष्ण का जन्मोत्सव मनाते हैं।
पूजा में आम तौर पर:
- लड्डू गोपाल की मूर्ति
- पंचामृत
- माखन-मिश्री
- तुलसी दल
- पंजीरी
- फल
- फूल
- धूप-दीप
का प्रयोग किया जाता है।
भगवान कृष्ण को झूला झुलाने और जन्म के बाद आरती करने की भी परंपरा है।
🌿 तुलसी का क्यों है विशेष महत्व?
भगवान विष्णु और श्रीकृष्ण की पूजा में तुलसी का विशेष धार्मिक महत्व माना जाता है।
जन्माष्टमी पर कृष्ण जी को तुलसी दल अर्पित करने की परंपरा है।
Aaj Tak की रिपोर्ट में भी जन्माष्टमी की पूजा में तुलसी दल शामिल करने और “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का जाप करने की सलाह दी गई है।
🕛 जन्माष्टमी 4 सितंबर को या 5 सितंबर को?
इस बार तारीख को लेकर भी लोगों में भ्रम है।
उपलब्ध पंचांग संबंधी रिपोर्टों के अनुसार मुख्य जन्माष्टमी 4 सितंबर 2026, शुक्रवार को मनाई जाएगी। लेकिन भगवान कृष्ण का जन्म मध्यरात्रि में माना जाता है, इसलिए पूजा का समय 4 और 5 सितंबर की मध्यरात्रि में पड़ सकता है। इसी वजह से कई लोगों को 5 सितंबर को लेकर भ्रम हो रहा है।
यानी सामान्य तौर पर व्रत और जन्माष्टमी का मुख्य दिन 4 सितंबर माना जा रहा है, जबकि मध्यरात्रि की पूजा 5 सितंबर की शुरुआती घंटों तक जा सकती है।
🛕 जन्माष्टमी का धार्मिक महत्व
श्रीकृष्ण जन्माष्टमी केवल एक धार्मिक त्योहार नहीं बल्कि भारतीय संस्कृति और भक्ति परंपरा का महत्वपूर्ण पर्व है।
भगवान कृष्ण को धर्म, कर्म, नीति और प्रेम का प्रतीक माना जाता है।
भगवद्गीता में श्रीकृष्ण ने अर्जुन को कर्म और धर्म का संदेश दिया था।
जन्माष्टमी पर भक्त भगवान कृष्ण के बाल स्वरूप लड्डू गोपाल की पूजा करते हैं और उनके जन्म की खुशी में भजन-कीर्तन करते हैं।
🎉 मंदिरों में होगी विशेष तैयारी
देशभर के कृष्ण मंदिरों में जन्माष्टमी के अवसर पर विशेष सजावट और धार्मिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।
मथुरा और वृंदावन में जन्माष्टमी का विशेष महत्व माना जाता है। यहां मंदिरों में झांकियां, भजन, कीर्तन और विशेष पूजा का आयोजन किया जाता है।
इसके अलावा देश के दूसरे हिस्सों में भी कृष्ण जन्मोत्सव की तैयारियां शुरू हो गई हैं।
🧿 क्या इस संयोग से सच में किस्मत बदल जाएगी?
ज्योतिषीय मान्यताओं में ग्रहों की स्थिति को जीवन की घटनाओं से जोड़कर देखा जाता है।
लेकिन यह याद रखना जरूरी है कि किसी राशि के लिए आर्थिक लाभ, प्रमोशन या अन्य भविष्यवाणी निश्चित परिणाम नहीं है।
व्यक्ति की जन्मकुंडली, दशा और व्यक्तिगत परिस्थितियों के आधार पर ज्योतिषीय व्याख्या अलग-अलग हो सकती है।
इसलिए इसे धार्मिक और ज्योतिषीय विश्वास के रूप में ही देखना उचित
