हिमालयी ‘सुनामी’ के 13 साल: 700 करोड़ से पुनर्जीवित हुई बाबा केदार की नगरी; आज ही के दिन तीसरे चरण में पहुंचा था सेना का ‘ऑपरेशन सूर्य होप’

दिनांक: 23 जून, 2026

विशेष ब्यूरो, देहरादून/रुद्रप्रयाग:

उत्तराखंड के इतिहास की सबसे वीभत्स प्राकृतिक विभीषिका ‘केदारनाथ जल प्रलय’ को आज पूरे 13 वर्ष बीत चुके हैं। जून 2013 में आए उस ‘हिमालयी सुनामी’ ने हंसती-खेलती केदारघाटी को मलबे और लाशों के ढेर में तब्दील कर दिया था। लेकिन इन 13 वर्षों में संकल्प, आधुनिक इंजीनियरिंग और लगभग 700 करोड़ रुपये के पुनर्निर्माण बजट की बदौलत आज केदारनाथ धाम एक नई, भव्य और अत्यधिक सुरक्षित दिव्य नगरी के रूप में दुनिया के सामने खड़ा है।

13 साल पहले आज का ही वह ऐतिहासिक दिन (23 जून) था, जब भारतीय सेना की सेंट्रल कमांड ने केदारघाटी के बेहद दुर्गम इलाकों में फंसे आखिरी तीर्थयात्रियों को सुरक्षित निकालने के लिए अपने सबसे बड़े मानवीय मिशन ‘ऑपरेशन सूर्य होप’ (Operation Surya Hope) के तीसरे और सबसे निर्णायक चरण की शुरुआत की थी।

23 जून 2013: जब ‘ऑपरेशन सूर्य होप’ ने लिया था महा-संकल्प

16-17 जून 2013 को चोराबाड़ी झील के फटने और मंदाकिनी नदी के रौद्र रूप के बाद पूरी केदारघाटी का संपर्क दुनिया से कट गया था। सेना की लखनऊ स्थित सेंट्रल कमांड के तत्कालीन जीओसी लेफ्टिनेंट जनरल अनिल चैत के नेतृत्व में शुरू हुआ ‘ऑपरेशन सूर्य होप’ इतिहास का सबसे बड़ा रेस्क्यू मिशन बना।

  • तीसरे चरण का आगाज: सेना के प्लान के मुताबिक, 19-20 जून को पहला और 21-22 जून को दूसरा चरण पूरा करने के बाद 23 जून 2013 से इसका तीसरा चरण शुरू हुआ
  • दुर्गम इलाकों में पैराट्रूपर्स की लैंडिंग: इस चरण में सेना, वायुसेना (ऑपरेशन राहत) और नागरिक उड्डयन के 83 से अधिक हेलीकॉप्टर्स ने उड़ान भरी। जंगलचट्टी, गरुड़चट्टी और रामबाड़ा के उन क्षेत्रों में उच्च-ऊंचाई वाले विशेष पैराट्रूपर्स और कमांडोज़ को रस्सियों के सहारे उतारा गया, जहां पहुँचने का कोई रास्ता नहीं बचा था।
  • बनाया हवाई पुल: सेना ने जंगलचट्टी और गौरीकुंड के बीच ‘हेली-ब्रिज’ (हवाई शटल सेवा) स्थापित की। इस पूरे महा-अभियान में सेना, आईटीबीपी (ITBP) और एनडीआरएफ (NDRF) ने मिलकर 1 लाख 10 हजार से अधिक असहाय लोगों को मौत के मुंह से सुरक्षित बाहर निकाला था।

700 करोड़ से कायाकल्प: मलबे के ढेर से भव्य ‘केदारपुरी’ का सफर

साल 2014 के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ड्रीम प्रोजेक्ट के तहत केदारनाथ धाम के पुनर्निर्माण की कमान संभाली गई। तीन चरणों में चले करीब 700 करोड़ रुपये के मास्टर प्लान ने केदारनाथ की तस्वीर और तकदीर दोनों बदल दी:

पुनर्निर्माण का मुख्य पहलूआपदा के समय (2013)वर्तमान स्थिति (2026)
मंदिर परिसर का मार्गसंकरी गलियां और अवैध कंक्रीट निर्माण250 फीट चौड़ा भव्य पैदल मार्ग, खुला परिसर
सुरक्षा दीवारकोई सुरक्षा नहीं, सीधे बाढ़ की चपेट मेंमंदाकिनी-सरस्वती पर मजबूत थ्री-लेयर सुरक्षा दीवार
तीर्थयात्रियों के लिए आवासअव्यवस्थित और असुरक्षित लॉजआधुनिक वाटरप्रूफ टेंट सिटी और सुविधायुक्त गेस्ट हाउस
आस्था पथ व घाटपूरी तरह जमींदोज और क्षतिग्रस्तमंदाकिनी नदी पर भव्य घाट और आस्था पथ का निर्माण

आदि गुरु शंकराचार्य समाधि स्थल: पुनर्निर्माण के तहत ही मंदिर के ठीक पीछे मलबे में दफन हो चुके आदि गुरु शंकराचार्य के समाधि स्थल को जमीन से 12 फीट नीचे एक बेहद खूबसूरत और भव्य रूप में पुनर्जीवित किया गया, जहां उनकी 12 फीट ऊंची क्रिस्टल प्रतिमा स्थापित है।

आधुनिक इंजीनियरिंग और इको-फ्रेंडली तकनीक का बेजोड़ संगम

700 करोड़ रुपये के इस प्रोजेक्ट में सबसे बड़ी चुनौती 11,755 फीट की ऊंचाई पर भारी मशीनें ले जाना और पर्यावरण को नुकसान पहुंचाए बिना निर्माण करना था।

  1. चिनूक हेलीकॉप्टर्स की मदद: वायुसेना के भारी-भरकम चिनूक हेलीकॉप्टर्स के जरिए केदारनाथ धाम तक पोकलेन और जेसीबी मशीनें पहुंचाई गईं।
  2. भूकंपरोधी और इको-फ्रेंडली इंफ्रास्ट्रक्चर: केदारपुरी में बनाए गए पुरोहित आवास और प्रशासनिक भवन पूरी तरह से ‘ग्रीन कंस्ट्रक्शन’ और भूकंपरोधी (Earthquake-resistant) तकनीक पर आधारित हैं।
  3. भीड़ नियंत्रण और डिजिटल ट्रैकिंग: अब केदारनाथ आने वाले हर यात्री की ‘आरएफआईडी’ (RFID) ट्रैकिंग की जाती है, ताकि 2013 जैसी अव्यवस्था दोबारा कभी न बन सके।

आज 13 साल बाद, जहां एक ओर इतिहास के उस काले पन्ने को याद कर आंखें नम हो जाती हैं, वहीं नए केदारनाथ की भव्यता यह विश्वास दिलाती है कि इंसानी जज्बा और बाबा केदार की कृपा प्रकृति के हर थपेड़े से बड़ी है।

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