वाशिंगटन | 8 अगस्त, 2026
अंतरराष्ट्रीय राजनीति और व्यापार जगत में एक बड़े घटनाक्रम के तहत अमेरिकी सीनेट ने रूस के खिलाफ एक कड़ा प्रतिबंधक विधेयक (Sanctions Bill) भारी बहुमत से पारित कर दिया है। इस नए और कड़े कानून के तहत अमेरिकी राष्ट्रपति को यह अधिकार मिल जाएगा कि वे रूस से कच्चा तेल और प्राकृतिक गैस खरीदने वाले दुनिया के शीर्ष 5 देशों से आने वाले सामानों पर 100 प्रतिशत तक का भारी-भरकम टैरिफ (आयात शुल्क) लगा सकें। इस महत्वपूर्ण और द्विदलीय विधेयक के पक्ष में 86 वोट पड़े, जबकि विरोध में केवल 11 वोट आए।
1. क्या है ‘लिंडसे ग्राहम सैंक्शनिंग रशिया एंड ईरान एक्ट’?
दिवंगत सीनेटर लिंडसे ग्राहम की याद में इस संशोधित बिल का नाम ‘Lindsey O. Graham Sanctioning Russia and Iran Act of 2026’ रखा गया है:
- रूस की अर्थव्यवस्था पर शिकंजा: इस कानून का मुख्य उद्देश्य रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के उस वित्तीय तंत्र को तोड़ना है, जिससे यूक्रेन के खिलाफ युद्ध को फंडिंग मिलती है।
- शीर्ष 5 खरीदार देश निशाने पर: वर्तमान आंकड़ों के अनुसार, रूस से सबसे ज्यादा ऊर्जा आयात करने वाले शीर्ष पांच देशों में भारत और चीन के अलावा स्लोवाकिया, हंगरी और अज़रबैजान शामिल हैं। बिल के प्रावधानों के मुताबिक, यदि ये देश मास्को से तेल और गैस खरीदना जारी रखते हैं, तो अमेरिका इन पर कड़े आर्थिक शुल्क लगा सकता है।
2. भारी बहुमत से सीनेट में मिली मंजूरी
- बिपार्टिसन समर्थन: इस बिल को रिपब्लिकन और डेमोक्रेट्स दोनों दलों का व्यापक समर्थन मिला। सीनेट में मतदान के दौरान 86 सदस्यों ने इसके पक्ष में मुहर लगाई, जो कि इसकी मजबूती को दर्शाता है।
- ईरान पर भी शिकंजा: इस विधेयक में रूस के साथ-साथ ईरान के ऊर्जा और हथियार क्षेत्रों को लक्षित करने वाले प्रतिबंधों को भी वर्ष 2031 तक आगे बढ़ाने का प्रावधान जोड़ा गया है।
3. आगे की प्रक्रिया और भारत पर संभावित असर
- हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स (संसद के निचले सदन) की मंजूरी बाकी: सीनेट से पास होने के बाद अब यह विधेयक अमेरिकी संसद के निचले सदन यानी ‘हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स’ में जाएगा। चूंकि निचला सदन इस समय ग्रीष्मकालीन अवकाश (Summer Recess) पर है, इसलिए इस पर सितंबर से पहले मुहर लगने की संभावना नहीं है। इसके बाद ही यह राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के बाद अंतिम कानून का रूप लेगा।
- भारत का रुख: भारत ने पहले ही स्पष्ट कर दिया है कि उसकी ऊर्जा जरूरतें और कच्चे तेल की खरीद पूरी तरह से राष्ट्रीय हितों और बाजार की वास्तविकताओं पर आधारित है। हालांकि, अमेरिकी सीनेट के इस कदम से आने वाले दिनों में वैश्विक कूटनीति और व्यापारिक वार्ताओं में एक नया भूचाल आ सकता है
