नई दिल्ली, 4 सितंबर 2026। देशभर में आज शुक्रवार को भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव का पावन पर्व जन्माष्टमी श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जा रहा है। मंदिरों से लेकर घरों तक कान्हा के जन्मोत्सव की तैयारियां पूरी हो चुकी हैं। भक्त दिनभर व्रत रखकर रात में भगवान श्रीकृष्ण के बाल स्वरूप लड्डू गोपाल की पूजा और जन्मोत्सव का इंतजार करेंगे। पंचांग के अनुसार इस वर्ष जन्माष्टमी के दिन अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र का विशेष संयोग भी बन रहा है।
रात 11:57 बजे से शुरू होगा पूजा का शुभ मुहूर्त
जन्माष्टमी पर भगवान श्रीकृष्ण की पूजा के लिए सबसे महत्वपूर्ण समय मध्यरात्रि का माना जाता है। नई दिल्ली के पंचांग के अनुसार इस वर्ष निशीथ काल पूजा का शुभ मुहूर्त रात 11:57 बजे से शुरू होकर 5 सितंबर की रात 12:43 बजे तक रहेगा।
यानी भक्तों के पास श्रीकृष्ण जन्मोत्सव की विशेष पूजा के लिए करीब 46 मिनट का समय रहेगा। इसी दौरान भगवान के बाल स्वरूप का अभिषेक, श्रृंगार, भोग और आरती की जाएगी।
4 सितंबर को ही क्यों मनाई जा रही है जन्माष्टमी?
जन्माष्टमी की तारीख निर्धारित करने में अष्टमी तिथि और मध्यरात्रि का विशेष महत्व माना जाता है। इस वर्ष अष्टमी तिथि 4 सितंबर को तड़के 2:25 बजे शुरू हुई और 5 सितंबर की रात 12:13 बजे तक रहने की जानकारी दी गई है।
इसी वजह से गृहस्थों के लिए 4 सितंबर को जन्माष्टमी का व्रत और जन्मोत्सव मनाया जा रहा है। भगवान श्रीकृष्ण का जन्म भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मध्यरात्रि में होने की धार्मिक मान्यता है।
रोहिणी नक्षत्र का भी खास महत्व
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण का जन्म रोहिणी नक्षत्र में हुआ था। इसी कारण जन्माष्टमी के अवसर पर अष्टमी तिथि के साथ रोहिणी नक्षत्र को भी विशेष महत्व दिया जाता है।
इस वर्ष रोहिणी नक्षत्र 4 सितंबर की रात 11:04 बजे तक रहने की जानकारी दी गई है। इसलिए जन्माष्टमी की मध्यरात्रि पूजा के आसपास इस संयोग को भी विशेष माना जा रहा है।
पूरे दिन व्रत, रात में होगा कान्हा का जन्मोत्सव
जन्माष्टमी के दिन बड़ी संख्या में श्रद्धालु व्रत रखते हैं। भक्त सुबह स्नान करके पूजा स्थल की सफाई करते हैं और भगवान श्रीकृष्ण के नाम पर व्रत का संकल्प लेते हैं। शाम होते-होते घरों और मंदिरों में सजावट और पूजा की तैयारियां तेज हो जाती हैं।
कई स्थानों पर बाल गोपाल के लिए विशेष झूला सजाया जाता है। आधी रात को जैसे ही जन्म का समय आता है, शंख और घंटियां बजाई जाती हैं और भगवान श्रीकृष्ण के जन्म की खुशी में भजन-कीर्तन किए जाते हैं।
ऐसे करें लड्डू गोपाल की पूजा
जन्माष्टमी की मध्यरात्रि पूजा में सबसे पहले भगवान श्रीकृष्ण के बाल स्वरूप का अभिषेक किया जाता है। धार्मिक परंपरा के अनुसार लड्डू गोपाल को गंगाजल और पंचामृत से स्नान कराया जाता है।
इसके बाद उन्हें नए वस्त्र पहनाए जाते हैं। मुकुट, बांसुरी, मोरपंख, चंदन और फूलों से उनका श्रृंगार किया जाता है। भगवान को झूले में विराजमान कराकर झूला झुलाया जाता है और फिर धूप-दीप जलाकर आरती की जाती है।
माखन-मिश्री और पंजीरी का लगाया जाता है भोग
भगवान श्रीकृष्ण को माखन और मिश्री विशेष रूप से प्रिय माने जाते हैं। जन्माष्टमी पर भक्त माखन-मिश्री के अलावा धनिया पंजीरी, फल, मिठाई और पंचामृत का भोग लगाते हैं।
धार्मिक मान्यता के अनुसार भोग में तुलसी दल अर्पित करना भी शुभ माना जाता है। पूजा के बाद प्रसाद को परिवार और श्रद्धालुओं में बांटा जाता है।
मंदिरों में विशेष आयोजन
जन्माष्टमी के मौके पर देशभर के कृष्ण मंदिरों में विशेष आयोजन किए जा रहे हैं। मथुरा और वृंदावन सहित देश के प्रमुख कृष्ण मंदिरों में भगवान का विशेष श्रृंगार, झांकियां, भजन-कीर्तन और जन्मोत्सव कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।
रात में कृष्ण जन्म के समय मंदिरों में शंख और घंटियों की आवाज के बीच भगवान का अभिषेक किया जाता है। श्रद्धालु आधी रात तक मंदिरों में रहकर जन्मोत्सव में शामिल होते हैं।
जन्माष्टमी से जुड़ी धार्मिक मान्यता
हिंदू धार्मिक परंपरा में भगवान श्रीकृष्ण को भगवान विष्णु का आठवां अवतार माना जाता है। मान्यता है कि उनका जन्म मथुरा में अत्याचारी कंस के कारागार में हुआ था। कृष्ण जन्माष्टमी इसी दिव्य जन्म की स्मृति में मनाई जाती है।
जन्माष्टमी को कृष्णाष्टमी, गोकुलाष्टमी, कृष्ण जयंती और श्रीकृष्ण जयंती जैसे नामों से भी जाना जाता है।
पूजा के लिए क्या-क्या सामग्री रखें?
लड्डू गोपाल की पूजा के लिए भक्त पहले से ही पूजा सामग्री तैयार रखते हैं। इसमें बाल गोपाल की मूर्ति, झूला, नए वस्त्र, मुकुट, बांसुरी, मोरपंख, चंदन, रोली, अक्षत, धूप, दीपक, कपूर और फूल शामिल किए जाते हैं।
अभिषेक के लिए दूध, दही, घी, शहद और गंगाजल से पंचामृत तैयार किया जाता है। भोग के लिए माखन-मिश्री, पंजीरी, फल और मिठाई रखी जाती है।
अलग-अलग शहरों में समय में थोड़ा अंतर संभव
जन्माष्टमी की पूजा का समय शहर के अनुसार कुछ मिनट आगे-पीछे हो सकता है। इसलिए अगर भक्त नई दिल्ली के अलावा किसी अन्य शहर में पूजा कर रहे हैं, तो अपने स्थानीय पंचांग के अनुसार निशीथ काल का समय देखना बेहतर रहेगा।
उदाहरण के तौर पर नई दिल्ली में 11:57 बजे से 12:43 बजे तक का समय बताया गया है, जबकि दूसरे शहरों में मध्यरात्रि पूजा का समय अलग हो सकता है।
आधी रात को गूंजेगा ‘नंद के घर आनंद भयो’
जन्माष्टमी के दिन पूरे दिन व्रत और पूजा की तैयारियों के बाद भक्तों को सबसे ज्यादा इंतजार मध्यरात्रि का रहता है। रात करीब 12 बजे भगवान श्रीकृष्ण के जन्म का उत्सव मनाया जाता है।
जन्म के बाद लड्डू गोपाल का अभिषेक कर उन्हें नए वस्त्र पहनाए जाते हैं और झूले में बैठाया जाता है। इसके बाद आरती और भजन-कीर्तन के साथ भक्त एक-दूसरे को जन्माष्टमी की शुभकामनाएं देते हैं।
इस तरह 4 सितंबर 2026 की जन्माष्टमी की रात 11:57 बजे से शुरू होने वाला निशीथ पूजा काल आज के पर्व का सबसे महत्वपूर्ण समय रहेगा। भक्त इसी दौरान कान्हा के जन्मोत्सव में शामिल होकर भगवान श्रीकृष्ण की आराधना करेंगे।
