गुवाहाटी | 11 अगस्त, 2026
असम के प्रसिद्ध शक्तिपीठ मां कामाख्या मंदिर के विकास और भव्य ‘कामाख्या एक्सेस कॉरिडोर’ (Kamakhya Access Corridor) के निर्माण को लेकर छिड़ा विवाद थमने का नाम नहीं ले रहा है। काशी विश्वनाथ और महाकाल लोक की तर्ज पर नीलांचल पहाड़ियों पर प्रस्तावित इस महत्वाकांक्षी कॉरिडोर प्रोजेक्ट के खिलाफ अब देश के कई जाने-माने साधक, संत और उपासक खुलकर सामने आ गए हैं। उनका साफ कहना है कि यदि मंदिर की मूल ऊर्जा, पौराणिक अस्तित्व और प्राकृतिक जल स्रोतों से छेड़छाड़ की गई, तो “मंदिर की आत्मा ही मर जाएगी, और ऐसे में केवल पत्थरों और कंक्रीट से मंदिर को संवारने का कोई औचित्य नहीं रह जाएगा।”
1. असम सरकार और प्रशासन पर क्या छिपाने के लग रहे हैं आरोप?
शिकायतकर्ता साधकों और याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि सरकार इस विशाल प्रोजेक्ट के वास्तविक प्रभावों को लेकर कई महत्वपूर्ण जानकारियां छिपा रही है:
- हाइड्रो-जियोलॉजिकल सर्वे पर सवाल: साधकों का तर्क है कि नीलाचल पर्वत की भौगोलिक बनावट और वहां मौजूद गुप्त प्राकृतिक जल स्रोतों (अखंड झरने) पर इस भारी-भरकम निर्माण का क्या असर पड़ेगा, इसे लेकर सरकार पारदर्शी नहीं है।
- मूल स्वरूप से छेड़छाड़ की आशंका: याचिकाकर्ताओं ने अदालत में आशंका जताई है कि कॉरिडोर के तहत बड़े पैमाने पर होने वाली बेसमेंट की खुदाई और निर्माण कार्यों से मंदिर की प्राचीन संरचना, पारंपरिक सीढ़ियां और सदियों पुरानी पवित्र व्यवस्था प्रभावित हो सकती है।
2. “आत्मा मर जाएगी…”— कोर्ट पहुंचे साधक और भक्तों की दलील
इस पूरे मामले को लेकर कई आध्यात्मिक वक्ता और माँ कामाख्या के साधक कानूनी लड़ाई लड़ने के लिए अदालत की शरण ले चुके हैं:
- आध्यात्मिक महत्व बनाम आधुनिक विकास: साधकों का कहना है कि कामाख्या कोई साधारण पर्यटन स्थल नहीं, बल्कि तांत्रिक साधना और 51 शक्तिपीठों में सर्वोच्च स्थान रखने वाली जीवंत ऊर्जा का केंद्र है।
- चेतावनी: उनका यह भी कहना है कि यदि आधुनिक कॉमर्शियल नजरिए से तीर्थक्षेत्रों का आधुनिकीकरण किया गया और वहां की नैसर्गिक पवित्रता व एकांतता नष्ट हुई, तो उस स्थान की मूल ऊर्जा (आत्मा) समाप्त हो जाएगी। भक्तों का सवाल है कि जब मंदिर का मूल स्वरूप और प्राण-तत्व ही सुरक्षित नहीं रहेगा, तो भव्य भवनों और कॉरिडोर के निर्माण का क्या लाभ?
3. असम सरकार और अदालत का पक्ष
दूसरी ओर, असम सरकार और प्रशासन इन सभी चिंताओं को खारिज करते हुए अपनी दलीलें दे चुके हैं:
- अदालत की हरी झंडी: गुवाहाटी हाईकोर्ट ने इस मामले से जुड़ी जनहित याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया है कि सरकार आईआईटी गुवाहाटी और रुड़की के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हाइड्रोलॉजी जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों की तकनीकी सलाह और सुरक्षा मानकों के आधार पर ही कार्य आगे बढ़ाएगी।
- आश्वासन: सरकार की ओर से अदालत में यह आश्वासन दिया गया है कि प्रोजेक्ट के दौरान मंदिर के प्राचीन ढांचे और पवित्र जल कुंडों/झरनों को किसी भी प्रकार की क्षति नहीं पहुंचाई जाएगी।
भले ही कानूनी रूप से इस प्रोजेक्ट के रास्ते साफ हो चुके हों, लेकिन धार्मिक और आध्यात्मिक हलकों में इस बात को लेकर गहरी चिंता बनी हुई है कि प्राचीन सनातन धरोहरों के आधुनिकीकरण और कॉरपोरेट शैली के विकास में संतुलन कैसे कायम रखा जाए।
