दिल्ली में पाबंदियों पर DMRC और पुलिस ने सुप्रीम कोर्ट में दाखिल किए हलफनामे, मेट्रो बंद करने के आरोपों पर दिया जवाब

नई दिल्ली | 15 अक्टूबर 2026

दिल्ली में 10 अक्टूबर को प्रस्तावित विरोध प्रदर्शन के दौरान मेट्रो स्टेशनों और सार्वजनिक आवाजाही पर लगाई गई पाबंदियों को लेकर सुप्रीम कोर्ट में चल रहे अवमानना मामले में दिल्ली मेट्रो रेल कॉरपोरेशन (DMRC) और संबंधित अधिकारियों ने अपने हलफनामे दाखिल किए हैं। मामले में DMRC ने दावा किया है कि उस दिन मेट्रो की कोई निर्धारित ट्रेन सेवा रद्द नहीं की गई थी। वहीं, पाबंदियों को लेकर सुरक्षा एजेंसियों के निर्देशों और कानून-व्यवस्था की स्थिति का हवाला दिया गया है।

यह मामला 10 अक्टूबर को दिल्ली के जंतर-मंतर पर प्रस्तावित प्रदर्शन से पहले मेट्रो स्टेशनों के प्रवेश और निकास द्वारों पर प्रतिबंध तथा सार्वजनिक परिवहन की आवाजाही को लेकर उठे विवाद से जुड़ा है। सुप्रीम कोर्ट ने पहले दिए गए निर्देशों के कथित उल्लंघन पर अधिकारियों से जवाब मांगा था।

DMRC ने कहा—सभी 4,157 निर्धारित मेट्रो ट्रिप चलीं

DMRC ने अपने हलफनामे में कहा कि 10 अक्टूबर को 271 ट्रेनें परिचालन में लगाई गईं और शनिवार के निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार कुल 4,157 ट्रिप पूरी की गईं। निगम के अनुसार, मेट्रो ट्रेन सेवाओं में कटौती या किसी निर्धारित ट्रिप को रद्द नहीं किया गया था।

DMRC ने बताया कि दिल्ली मेट्रो नेटवर्क के कुल 303 स्टेशनों में से 45 स्टेशनों पर प्रवेश और निकास को लेकर प्रतिबंध लगाए गए थे। शेष 258 स्टेशन सामान्य रूप से संचालित रहे। निगम के मुताबिक, प्रभावित स्टेशनों में से 14 इंटरचेंज स्टेशनों पर यात्रियों को मेट्रो लाइनों के बीच बदलने की सुविधा जारी रही।

DMRC ने यह भी कहा कि प्रतिबंधों के कारण यात्रियों की संख्या में गिरावट आई। निगम के आंकड़ों के अनुसार, 10 अक्टूबर को करीब 32 लाख यात्रियों ने मेट्रो से सफर किया, जबकि सामान्य दूसरे शनिवार को यह संख्या लगभग 58 लाख रहती है। निगम ने इस गिरावट को प्रदर्शन के कारण पैदा हुई परिस्थितियों से जोड़ा।

DMRC अध्यक्ष ने मांगी बिना शर्त माफी

DMRC की अध्यक्ष डी. थारा ने सुप्रीम कोर्ट में दाखिल हलफनामे में बिना शर्त माफी मांगी और कहा कि निगम अदालत के आदेशों का सम्मान करता है। उन्होंने अपने जवाब में कहा कि मेट्रो स्टेशनों पर प्रवेश और निकास से जुड़े प्रतिबंध पुलिस के निर्देशों तथा सुरक्षा एजेंसियों के आकलन के आधार पर लागू किए गए थे।

DMRC का पक्ष है कि इन कदमों का उद्देश्य पूरे मेट्रो नेटवर्क को बंद करना नहीं था। निगम ने यह भी कहा कि यात्रियों को जानकारी देने के लिए सोशल मीडिया, वेबसाइट, मोबाइल एप्लिकेशन, स्टेशन घोषणाओं और सूचना बोर्डों का इस्तेमाल किया गया।

पुलिस के निर्देश पर प्रभावित स्टेशनों की संख्या 57 से घटाकर 45 की गई

DMRC के अनुसार, शुरुआत में दिल्ली पुलिस की ओर से 57 मेट्रो स्टेशनों पर प्रतिबंध लगाने की बात कही गई थी। सुप्रीम कोर्ट के 9 अक्टूबर के निर्देशों के बाद सुरक्षा व्यवस्था का दोबारा आकलन किया गया और प्रभावित स्टेशनों की संख्या घटाकर 45 कर दी गई।

निगम के मुताबिक, 10 अक्टूबर को रात 10 बजे तक इन स्टेशनों पर लगाए गए प्रतिबंध हटा दिए गए थे। हालांकि, DMRC ने यह भी बताया कि 12 अक्टूबर को पुलिस के एक अन्य संदेश के बाद छह स्टेशनों पर कुछ समय के लिए प्रवेश और निकास संबंधी पाबंदियां लगाई गई थीं।

सुप्रीम कोर्ट ने क्यों मांगा था जवाब?

सुप्रीम कोर्ट ने 9 अक्टूबर को अधिकारियों को निर्देश दिया था कि दिल्ली में मेट्रो और रेल सेवाओं पर पूरी तरह रोक लगाने के बजाय जरूरत के अनुसार नियंत्रित संचालन सुनिश्चित किया जाए। अदालत ने सार्वजनिक परिवहन में पूर्ण प्रतिबंध और सुरक्षा कारणों से नियमन के बीच अंतर स्पष्ट किया था।

इसके बाद 11 अक्टूबर को न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने अवमानना याचिका पर सुनवाई करते हुए प्रथम दृष्टया मामला बनता हुआ माना और संबंधित अधिकारियों को नोटिस जारी किए। अदालत ने केंद्र सरकार, दिल्ली पुलिस और DMRC से जवाब तथा अनुपालन रिपोर्ट मांगी थी।

दिल्ली पुलिस की भूमिका और प्रतिबंधों पर उठे सवाल

विवाद का एक प्रमुख पहलू यह है कि मेट्रो स्टेशनों पर प्रतिबंध किस आधार पर लगाए गए और क्या वे सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुरूप थे। DMRC ने अपने हलफनामे में पाबंदियों को पुलिस के निर्देशों से जुड़ा बताया है। वहीं, याचिकाकर्ता का आरोप है कि अदालत के निर्देशों के बावजूद सार्वजनिक परिवहन और लोगों की आवाजाही प्रभावित हुई।

अवमानना याचिका में केंद्र के गृह सचिव गोविंद मोहन, दिल्ली पुलिस आयुक्त अनुराग कुमार और DMRC अध्यक्ष डी. थारा का नाम शामिल है। अधिकारियों की ओर से दाखिल हलफनामे उनके पक्ष और दावों को सामने रखते हैं; अवमानना हुई या नहीं, इस पर अंतिम निर्णय सुप्रीम कोर्ट को करना है।

आगे की सुनवाई पर रहेगी नजर

इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के सामने मेट्रो सेवाओं के संचालन, स्टेशनों पर प्रतिबंध लगाने की प्रक्रिया और पहले दिए गए आदेशों के अनुपालन से जुड़े सवाल हैं। अदालत के निर्देशों के अनुसार, सार्वजनिक आवाजाही और परिवहन सेवाएं सामान्य रहनी चाहिए, जब तक कानून-व्यवस्था की स्थिति में नियमन आवश्यक न हो।

अब दाखिल हलफनामों और संबंधित पक्षों के जवाबों के आधार पर अदालत आगे की कार्रवाई पर विचार करेगी। मामले का परिणाम यह तय करने में महत्वपूर्ण होगा कि प्रदर्शन के दौरान लगाए गए प्रतिबंध न्यायिक निर्देशों और लागू कानूनी प्रावधानों के अनुरूप थे या नहीं।

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