22 अप्रैल 2026
व्रत और पर्व का महत्व
22 अप्रैल 2026 को देशभर में स्कंद षष्ठी व्रत श्रद्धा और आस्था के साथ मनाया गया। यह व्रत भगवान कार्तिकेय (स्कंद), जिन्हें मुरुगन और सुब्रह्मण्य के नाम से भी जाना जाता है, को समर्पित है। विशेष रूप से दक्षिण भारत में इस व्रत का अत्यधिक महत्व माना जाता है, लेकिन अब यह पूरे देश में व्यापक रूप से मनाया जाने लगा है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, यह व्रत शक्ति, साहस, विजय और सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक है, जिसे करने से जीवन की बाधाएं दूर होती हैं और सफलता का मार्ग प्रशस्त होता है।
तिथि और शुभ समय की जानकारी
धार्मिक पंचांग के अनुसार स्कंद षष्ठी व्रत की शुरुआत 22 अप्रैल को प्रातः 01:19 बजे से हुई और इसका समापन उसी दिन रात्रि 10:49 बजे हुआ। इस पूरे समय को पूजा और व्रत पालन के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है। भक्त इस अवधि में उपवास रखते हैं और भगवान कार्तिकेय की विशेष पूजा-अर्चना करते हैं, जिससे उन्हें मनचाहे फल की प्राप्ति हो सके।
भगवान कार्तिकेय का धार्मिक महत्व
भगवान कार्तिकेय को देवताओं के सेनापति के रूप में जाना जाता है। वे युद्ध कौशल, पराक्रम और विजय के देवता माने जाते हैं। धार्मिक ग्रंथों में उल्लेख मिलता है कि उनकी पूजा करने से व्यक्ति के जीवन में साहस, आत्मविश्वास और निर्णय लेने की क्षमता बढ़ती है। साथ ही, यह भी माना जाता है कि यह व्रत विशेष रूप से उन लोगों के लिए लाभकारी होता है जो संतान सुख की कामना करते हैं या अपने बच्चों के उज्ज्वल भविष्य के लिए प्रार्थना करते हैं।
पूजा विधि और अनुष्ठान
इस दिन भक्त प्रातःकाल जल्दी उठकर स्नान करते हैं और स्वच्छ वस्त्र धारण करते हैं। इसके बाद शुद्ध स्थान से मिट्टी लेकर उसका एक गोला बनाया जाता है और “बम” मंत्र का 16 बार उच्चारण करते हुए उसे पवित्र किया जाता है। फिर उसी मिट्टी से भगवान कार्तिकेय की प्रतिमा बनाई जाती है। प्रतिमा स्थापना के दौरान “ॐ ऐं हुम क्षुण क्लीं कुमाराय नमः” मंत्र का जाप किया जाता है। इसके बाद भगवान का आवाहन कर उनके चरणों की पूजा की जाती है।
पूजा के दौरान प्रतिमा का जल से अभिषेक “ॐ नमः पशुपतये” मंत्र के साथ किया जाता है और फिर धूप, दीप, पुष्प, नैवेद्य आदि अर्पित किए जाते हैं। अंत में पूरे श्रद्धा भाव के साथ प्रतिमा का विसर्जन किया जाता है। यह पूरी प्रक्रिया भक्तों के लिए अत्यंत पवित्र मानी जाती है और इसे विधि-विधान से करने पर विशेष फल प्राप्त होने की मान्यता है।
व्रत के लाभ और मान्यताएं
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, स्कंद षष्ठी व्रत रखने से व्यक्ति को मानसिक शांति, पारिवारिक सुख और कार्यों में सफलता मिलती है। ज्योतिषीय दृष्टि से यह व्रत मंगल दोष को कम करने में भी सहायक माना जाता है। इसके अलावा, यह भी विश्वास किया जाता है कि इस व्रत को करने से संतान प्राप्ति की इच्छा पूर्ण होती है और बच्चों का जीवन सुखद और समृद्ध बनता है। कई श्रद्धालु इसे जीवन में सौभाग्य और उन्नति लाने वाला व्रत मानते हैं।
देशभर में दिखी श्रद्धा और आस्था
इस अवसर पर मंदिरों में विशेष पूजा-अर्चना का आयोजन किया गया और बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने भगवान कार्तिकेय के दर्शन किए। कई स्थानों पर सामूहिक पूजा और धार्मिक कार्यक्रम भी आयोजित किए गए, जहां भक्तों ने एक साथ मिलकर भक्ति भाव से इस पर्व को मनाया। व्रत के दौरान पूरे दिन भजन-कीर्तन और मंत्रोच्चार का माहौल बना रहा, जिससे वातावरण आध्यात्मिक ऊर्जा से भर गया।
निष्कर्ष
स्कंद षष्ठी व्रत केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि आस्था, अनुशासन और आत्मविश्वास को मजबूत करने का एक माध्यम भी है। यह पर्व भक्तों को अपने जीवन में सकारात्मक बदलाव लाने, साहस बढ़ाने और आध्यात्मिक रूप से सशक्त बनने की प्रेरणा देता है। भगवान कार्तिकेय की आराधना के माध्यम से श्रद्धालु अपने जीवन की कठिनाइयों को दूर करने और सफलता प्राप्त करने की कामना करते हैं।
अस्वीकरण
यह जानकारी धार्मिक मान्यताओं और विभिन्न स्रोतों पर आधारित है। इसकी पूर्ण सत्यता या प्रभाव की हम पुष्टि नहीं करते हैं। किसी भी उपाय या अनुष्ठान को अपनाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ या ज्ञानी व्यक्ति से परामर्श लेना उचित रहेगा।
