धार्मिक स्थलों में महिलाओं के प्रवेश पर SC में सुनवाई तेज: सबरीमाला पर केंद्र के रुख पर उठे सवाल, 9 जजों की बेंच कर रही सुनवाई

नई दिल्ली। 08 अप्रैल 2026

देशभर के धार्मिक स्थलों में महिलाओं के प्रवेश और उनसे जुड़े भेदभाव के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई दूसरे दिन भी जारी रही। इस अहम मामले की सुनवाई 9 जजों की संवैधानिक पीठ कर रही है, जो धार्मिक परंपराओं और संवैधानिक अधिकारों के बीच संतुलन तय करने की दिशा में महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

मंगलवार को पहले दिन करीब 5 घंटे चली सुनवाई में केंद्र सरकार ने सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर रोक का समर्थन किया। सरकार की ओर से पेश हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने दलील दी कि मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर प्रतिबंध को भेदभाव या अपमान के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए।

उन्होंने कहा कि भारत में महिलाओं को देवी के रूप में पूजा जाता है और यह मामला ‘अस्पृश्यता’ (अनुच्छेद 17) से जुड़ा नहीं है। उनके अनुसार, छुआछूत का संबंध ऐतिहासिक रूप से जाति आधारित भेदभाव से रहा है, जबकि सबरीमाला का मामला धार्मिक परंपराओं और आस्था से जुड़ा है।

तुषार मेहता ने यह भी तर्क दिया कि जैसे अलग-अलग धर्मों और स्थलों पर अलग-अलग आचार-व्यवहार होते हैं—जैसे मस्जिद या दरगाह में सिर ढंकना—उसी तरह सबरीमाला की भी अपनी परंपराएं हैं, जिनका सम्मान किया जाना चाहिए। उन्होंने इसे धार्मिक संप्रदाय की स्वायत्तता का विषय बताते हुए कहा कि यह न्यायिक हस्तक्षेप के दायरे से बाहर होना चाहिए।

हालांकि, इस पर बेंच की एकमात्र महिला जज जस्टिस बी.वी. नागरत्ना ने अहम सवाल उठाया। उन्होंने पूछा कि यदि किसी महिला को उसके मासिक धर्म के आधार पर मंदिर में प्रवेश से रोका जाता है, तो क्या इसे ‘छुआछूत’ की श्रेणी में नहीं माना जाना चाहिए? उन्होंने यह भी याद दिलाया कि संविधान ने छुआछूत को पूरी तरह समाप्त किया है।

यह मामला केवल सबरीमाला तक सीमित नहीं है, बल्कि देश के विभिन्न धार्मिक स्थलों में महिलाओं के प्रवेश से जुड़े नियमों और परंपराओं की व्यापक संवैधानिक व्याख्या से जुड़ा हुआ है।

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि इस मामले में सुप्रीम कोर्ट का फैसला न केवल धार्मिक स्वतंत्रता, बल्कि लैंगिक समानता और मौलिक अधिकारों की व्याख्या पर दूरगामी प्रभाव डाल सकता है।

अब सभी की नजरें इस ऐतिहासिक सुनवाई पर टिकी हैं, जहां अदालत को यह तय करना है कि धार्मिक परंपराओं और संविधान द्वारा प्रदत्त समानता के अधिकार के बीच संतुलन कैसे स्थापित किया जाए।

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