जंतर-मंतर पर प्रदर्शन को लेकर दिल्ली हाईकोर्ट के सवाल, सौरव दास और आशुतोष रांका से पूछा—प्रतिबंधित जगह पर क्यों पहुंचे?

नई दिल्ली | 21 अक्टूबर 2026

दिल्ली में जंतर-मंतर पर प्रदर्शन करने के मामले में कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के नेताओं सौरव दास और आशुतोष रांका की मुश्किलें बढ़ती नजर आ रही हैं। जंतर-मंतर को प्रदर्शन स्थल के रूप में अधिसूचित नहीं किए जाने और शांति बनाए रखने के लिए बॉन्ड भरने के बावजूद वहां पहुंचने को लेकर कानूनी विवाद खड़ा हो गया है। दोनों नेताओं ने अपनी न्यायिक हिरासत बढ़ाए जाने के आदेश को दिल्ली हाईकोर्ट में चुनौती दी है। मामले में अदालत के सामने यह सवाल है कि जब प्रदर्शन स्थल की आधिकारिक स्थिति बदल चुकी थी और दोनों नेता शांति बनाए रखने का बॉन्ड दे चुके थे, तो वे वहां प्रदर्शन करने क्यों पहुंचे?

जंतर-मंतर को लेकर क्या है पूरा विवाद?

मामले की शुरुआत अक्टूबर में CJP की ओर से मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर किए गए विरोध प्रदर्शन से जुड़ी है। पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं ने दिल्ली में प्रदर्शन करने की योजना बनाई थी। इसी बीच पुलिस ने जंतर-मंतर को प्रदर्शन स्थल के रूप में अधिसूचित नहीं किए जाने का हवाला देते हुए वहां जाने पर प्रतिबंधों की जानकारी दी।

पुलिस के मुताबिक, 13 अक्टूबर को सौरव दास, आशुतोष रांका और अन्य कार्यकर्ता जंतर-मंतर के क्षेत्र में पहुंचे। पुलिस का आरोप है कि समूह ने एक निजी परिसर से होकर बंद गेट पार किया और वहां नारेबाजी की। इसके बाद पुलिस ने कार्रवाई करते हुए प्रदर्शनकारियों को हिरासत में ले लिया।

पीस बॉन्ड भरने के बाद भी प्रदर्शन क्यों किया?

दिल्ली पुलिस के अनुसार, सौरव दास और आशुतोष रांका को पहले शांति भंग न करने और अच्छे आचरण के लिए बॉन्ड भरने के बाद छोड़ा गया था। पुलिस का आरोप है कि इसके बावजूद दोनों नेता दोबारा जंतर-मंतर पहुंचे और वहां लोगों को जुटाने तथा प्रदर्शन करने की कोशिश की।

पुलिस ने इसे बॉन्ड की शर्तों का उल्लंघन और कानून-व्यवस्था के लिए संभावित खतरा बताया। दूसरी ओर, दोनों नेताओं के वकीलों ने इन आरोपों पर आपत्ति जताई है। बचाव पक्ष का कहना है कि उनके मुवक्किलों ने किसी कानून का उल्लंघन नहीं किया और वे केवल राष्ट्रीय ध्वज लेकर नारे लगा रहे थे।

पांच दिन की न्यायिक हिरासत में भेजे गए थे दोनों नेता

14 अक्टूबर को विशेष कार्यपालक मजिस्ट्रेट की अदालत ने सौरव दास और आशुतोष रांका को पांच दिन की न्यायिक हिरासत में भेजने का आदेश दिया था। इसके बाद दोनों को तिहाड़ जेल में रखा गया। पुलिस ने अदालत में दलील दी थी कि रिहा किए जाने पर उनके दोबारा कानून-व्यवस्था की स्थिति बिगाड़ने की आशंका है।

बाद में हिरासत की अवधि बढ़ाने का आदेश भी दिया गया। दोनों नेताओं ने इस कार्रवाई को चुनौती देते हुए दिल्ली हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। उनकी याचिका में हिरासत बढ़ाने की प्रक्रिया और बॉन्ड से संबंधित कानूनी आधार पर सवाल उठाए गए हैं।

बचाव पक्ष ने हिरासत पर उठाए सवाल

सौरव दास और आशुतोष रांका की ओर से पेश वकीलों का कहना है कि हिरासत बढ़ाने के आदेश में पर्याप्त कानूनी आधार नहीं बताया गया। बचाव पक्ष ने यह भी दलील दी कि दोनों नेताओं ने शांति भंग करने की कोई मंशा नहीं दिखाई और उनके खिलाफ की गई कार्रवाई उचित प्रक्रिया के अनुरूप नहीं है।

वहीं, पुलिस का पक्ष है कि दोनों नेताओं ने पहले शांति बनाए रखने का आश्वासन दिया था, लेकिन बाद में प्रतिबंधित क्षेत्र में पहुंचकर कथित तौर पर उन शर्तों का उल्लंघन किया। इस तरह मामला केवल प्रदर्शन करने के अधिकार तक सीमित नहीं है, बल्कि बॉन्ड की शर्तों और प्रशासन की ओर से तय प्रतिबंधों के पालन से भी जुड़ा है।

जंतर-मंतर पर प्रदर्शन को लेकर क्यों उठ रहे हैं कानूनी सवाल?

इस मामले ने शांतिपूर्ण विरोध-प्रदर्शन के अधिकार और सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए प्रशासन की शक्तियों के बीच संतुलन पर बहस छेड़ दी है। संविधान नागरिकों को शांतिपूर्ण और बिना हथियार एकत्र होने का अधिकार देता है, लेकिन इस अधिकार पर कानून के तहत उचित प्रतिबंध भी लगाए जा सकते हैं।

ऐसे मामलों में यह देखना महत्वपूर्ण होता है कि प्रशासन की ओर से लगाए गए प्रतिबंध कानूनी हैं या नहीं, संबंधित व्यक्तियों को उनकी शर्तों की जानकारी दी गई थी या नहीं और हिरासत की कार्रवाई निर्धारित प्रक्रिया के अनुरूप हुई या नहीं। इन प्रश्नों पर अदालत की सुनवाई और आदेश से मामले की कानूनी स्थिति स्पष्ट होगी।

अब हाईकोर्ट की सुनवाई पर टिकी नजरें

सौरव दास और आशुतोष रांका की याचिका पर सुनवाई के दौरान हिरासत बढ़ाने के आदेश और बॉन्ड की शर्तों से जुड़े मुद्दे महत्वपूर्ण रहेंगे। पुलिस ने जहां कानून-व्यवस्था की आशंका और कथित उल्लंघन को आधार बनाया है, वहीं बचाव पक्ष ने हिरासत की वैधता को चुनौती दी है।

अदालत का रुख इस मामले में आगे की कानूनी प्रक्रिया को प्रभावित कर सकता है। फिलहाल, दोनों पक्षों के दावों और अदालत के आदेशों के आधार पर ही मामले की स्थिति का आकलन किया जाना चाहिए।

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