नई दिल्ली | 21 अक्टूबर 2026
दशहरा बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है। हर साल आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि पर भगवान श्रीराम की रावण पर विजय की याद में देशभर में रावण दहन किया जाता है। इस अवसर पर लोग भगवान श्रीराम के आदर्शों, सत्य और धर्म के महत्व को याद करते हैं। लेकिन रामायण से जुड़ा एक ऐसा प्रसंग भी है, जिसके बारे में बहुत कम लोग विस्तार से जानते हैं। क्या आप जानते हैं कि रावण की मृत्यु के बाद उसका अंतिम संस्कार किसने किया था? भगवान श्रीराम ने यह जिम्मेदारी किसे सौंपी थी?
वाल्मीकि रामायण के युद्धकांड के अनुसार, रावण का अंतिम संस्कार उसके छोटे भाई विभीषण ने किया था। भगवान श्रीराम ने स्वयं विभीषण को अपने बड़े भाई की अंत्येष्टि करने के लिए कहा था। इस प्रसंग में श्रीराम ने यह संदेश दिया कि शत्रुता का अंत मृत्यु के साथ हो जाता है और मृत व्यक्ति के अंतिम संस्कार का सम्मानपूर्वक निर्वहन करना चाहिए।
रावण की मृत्यु के बाद शोक में डूब गए थे विभीषण
लंका के युद्ध में भगवान श्रीराम के हाथों रावण का वध होने के बाद उसके परिवार में शोक छा गया। रावण का छोटा भाई विभीषण भी अपने बड़े भाई की मृत्यु से दुखी था। भले ही विभीषण ने धर्म का साथ देने के लिए श्रीराम की सहायता की थी, लेकिन रावण की मृत्यु उसके लिए एक पारिवारिक क्षति भी थी।
वाल्मीकि रामायण के युद्धकांड में वर्णन मिलता है कि विभीषण ने रावण के मृत शरीर को देखकर विलाप किया। उन्होंने अपने भाई के पराक्रम, उसकी विद्वत्ता और उसके व्यक्तित्व को याद किया। इसके बाद विभीषण ने भगवान श्रीराम से रावण के अंतिम संस्कार की अनुमति मांगी।
पहले विभीषण ने क्यों किया संकोच?
रावण के वध के बाद विभीषण के सामने अपने बड़े भाई का अंतिम संस्कार करने का प्रश्न था। रामायण की कुछ लोकप्रिय कथाओं में बताया जाता है कि विभीषण ने शुरुआत में रावण के अंतिम संस्कार को लेकर संकोच किया था। इसके बाद भगवान श्रीराम ने उन्हें समझाया कि युद्ध में शत्रु को पराजित करना एक बात है, लेकिन मृत्यु के बाद उसके प्रति वैर बनाए रखना उचित नहीं है।
वाल्मीकि रामायण में विभीषण के शोक और श्रीराम के निर्देश का स्पष्ट वर्णन मिलता है। हालांकि, लक्ष्मण को विभीषण के पास भेजकर उन्हें मनाने वाला विवरण अलग-अलग रामायण परंपराओं और लोकप्रिय कथाओं में अलग तरीके से प्रस्तुत किया जाता है।
श्रीराम ने कहा—मृत्यु के साथ समाप्त हो जाता है वैर
रावण के अंतिम संस्कार से जुड़ा भगवान श्रीराम का संदेश रामायण के सबसे महत्वपूर्ण प्रसंगों में गिना जाता है। वाल्मीकि रामायण के युद्धकांड में श्रीराम विभीषण से कहते हैं:
“मरणान्तानि वैराणि निर्वृत्तं नः प्रयोजनम्।
क्रियतामस्य संस्कारो ममाप्येष यथा तव॥”
इसका भावार्थ है कि शत्रुता मृत्यु के साथ समाप्त हो जाती है। हमारा उद्देश्य पूरा हो चुका है। अब इसका अंतिम संस्कार किया जाए, क्योंकि रावण तुम्हारे समान ही मेरे लिए भी है।
इस कथन के माध्यम से श्रीराम ने बताया कि युद्ध में विजय प्राप्त करने के बाद भी मानवीय संवेदना और धर्म का पालन करना आवश्यक है। रावण उनका शत्रु था, लेकिन उसकी मृत्यु के बाद उसके पार्थिव शरीर के प्रति सम्मान दिखाना भी धर्म का हिस्सा था।
विभीषण ने विधिपूर्वक किया रावण का अंतिम संस्कार
भगवान श्रीराम के निर्देश के बाद विभीषण ने रावण की अंत्येष्टि की। रामायण के वर्णन के अनुसार, रावण का अंतिम संस्कार उचित विधि से संपन्न किया गया। इस प्रसंग में श्रीराम ने व्यक्तिगत शत्रुता से ऊपर उठकर मृत व्यक्ति के अंतिम संस्कार के महत्व को सामने रखा।
यह घटना इस बात का उदाहरण है कि धर्म केवल युद्ध में विजय प्राप्त करने तक सीमित नहीं है, बल्कि कठिन परिस्थितियों में भी उचित आचरण करना उसका महत्वपूर्ण हिस्सा है।
अंतिम संस्कार के बाद विभीषण बने लंका के राजा
रावण के अंतिम संस्कार के बाद लंका के शासन की जिम्मेदारी विभीषण को सौंपी गई। भगवान श्रीराम ने लक्ष्मण और अपने अन्य सहयोगियों को विभीषण के राजतिलक की व्यवस्था करने के लिए भेजा।
वाल्मीकि रामायण के अनुसार, श्रीराम ने स्वयं लंका में प्रवेश करने के बजाय अपने प्रतिनिधियों को यह जिम्मेदारी दी। इसके बाद विभीषण का राज्याभिषेक हुआ और वे लंका के राजा बने।
दशहरा हमें क्या संदेश देता है?
दशहरा केवल रावण के पुतले का दहन करने का पर्व नहीं है। यह अहंकार, अन्याय और अधर्म पर सत्य तथा धर्म की विजय का प्रतीक भी है। रावण के अंतिम संस्कार से जुड़ा प्रसंग इस पर्व के संदेश को एक और आयाम देता है।
भगवान श्रीराम का आचरण बताता है कि विरोधी के प्रति भी मर्यादा बनाए रखना, मृत्यु के बाद वैर समाप्त करना और अपने कर्तव्यों का पालन करना महत्वपूर्ण है। यही कारण है कि रामायण की यह घटना आज भी लोगों को करुणा, क्षमा और धर्म के मूल्यों की याद दिलाती है।
