सिवनी, मध्य प्रदेश, 26 अगस्त 2026: मध्य प्रदेश के सिवनी जिले से बारिश के मौसम में ग्रामीण इलाकों की बदहाल कनेक्टिविटी और बच्चों की मुश्किलों की तस्वीर सामने आई है। लखनादौन ब्लॉक की ग्राम पंचायत गुंगवारा में धौरीया और धाधर टोला के बीच बहने वाला नाला इन दिनों उफान पर है। हालात ऐसे हैं कि स्कूली बच्चों को रोज स्कूल जाने के लिए तेज बहाव वाले पानी के बीच से होकर गुजरना पड़ रहा है।
सोशल मीडिया पर सामने आए वीडियो में कुछ छात्राएं एक-दूसरे का हाथ पकड़कर नाला पार करती दिखाई दे रही हैं। वहीं छोटे बच्चों को उनके परिजन कंधे या गोद में उठाकर पानी के दूसरी तरफ ले जाते नजर आ रहे हैं। बारिश बढ़ने के साथ नाले का जलस्तर भी बढ़ गया है, जिससे यह रास्ता और खतरनाक हो गया है।
🌊 बारिश आई और रास्ता बना जानलेवा
ग्रामीण क्षेत्र में बारिश किसी उत्सव से कम नहीं होती, लेकिन सिवनी के इस इलाके के लोगों के लिए बारिश का मौसम हर साल नई परेशानी लेकर आता है।
धौरीया और धाधर टोला के बीच मौजूद नाले में पानी बढ़ने के बाद सामान्य रास्ता प्रभावित हो जाता है। बच्चों को स्कूल जाने के लिए इसी नाले को पार करना पड़ता है।
सबसे बड़ी चिंता छोटे बच्चों को लेकर है। तेज बहाव में उनका संतुलन बिगड़ सकता है और पानी में गिरने का खतरा बना रहता है।
इसी वजह से कई माता-पिता छोटे बच्चों को खुद कंधे पर बैठाकर या गोद में उठाकर नाला पार कराते हैं।
👧 छात्राओं ने एक-दूसरे का हाथ पकड़कर पार किया नाला
वायरल वीडियो में स्कूली छात्राओं का एक समूह भी दिखाई देता है। छात्राएं तेज बहाव वाले पानी के बीच एक-दूसरे का हाथ पकड़कर आगे बढ़ती हैं।
पानी का बहाव तेज होने के कारण हर कदम संभलकर रखना पड़ता है।
यह दृश्य बताता है कि बारिश के मौसम में स्कूल पहुंचना इन बच्चों के लिए सामान्य यात्रा नहीं, बल्कि रोजाना की चुनौती बन जाता है।
👨👩👧 छोटे बच्चों को कंधे पर उठाने की मजबूरी
जो बच्चे खुद पानी पार नहीं कर सकते, उनके लिए परिवार के लोग मदद करते हैं।
वीडियो में छोटे बच्चों को परिजन कंधे और गोद में उठाकर नाले के दूसरी तरफ ले जाते नजर आते हैं।
बच्चों की शिक्षा जारी रखने के लिए परिवारों को इस जोखिम से गुजरना पड़ रहा है।
एक तरफ बच्चों की पढ़ाई छूटने का डर है, तो दूसरी तरफ रास्ते में हादसे का खतरा।
📚 बारिश में स्कूल जाना क्यों बन जाता है चुनौती?
ग्रामीणों के मुताबिक नाले में पानी बढ़ने के बाद यह रास्ता करीब चार महीने तक परेशानी का कारण बना रहता है।
इस दौरान केवल स्कूली बच्चों को ही नहीं, बल्कि पूरे गांव के लोगों को आने-जाने में दिक्कत होती है।
गर्भवती महिलाओं, बुजुर्गों और अन्य ग्रामीणों को भी जरूरी काम के लिए इस रास्ते का इस्तेमाल करना पड़ता है।
⚠️ कभी भी बढ़ सकता है पानी का बहाव
नाले की सबसे बड़ी समस्या यह है कि बारिश होने के बाद जलस्तर अचानक बढ़ सकता है।
ऐसे में जो रास्ता कुछ समय पहले तक पार करने लायक दिखाई देता है, वह अचानक खतरनाक बन सकता है।
बच्चों के लिए यह जोखिम और ज्यादा है क्योंकि उनका शरीर छोटा होता है और तेज बहाव में संतुलन बनाना मुश्किल हो सकता है।
🗣️ ग्रामीण बोले- कई वर्षों से बनी हुई है समस्या
ग्रामीण रामकुमार यादव ने बताया कि यह परेशानी पिछले कई वर्षों से बनी हुई है।
बारिश के मौसम में नाले में बाढ़ आने के बाद गांव का रास्ता प्रभावित हो जाता है। जरूरी काम के लिए बाहर निकलने वाले लोगों को भी इसी रास्ते से गुजरना पड़ता है।
ग्रामीणों की मांग है कि इस समस्या का स्थायी समाधान किया जाए ताकि हर साल बारिश आने पर उन्हें इसी तरह जोखिम न उठाना पड़े।
🏫 बच्चों की पढ़ाई पर भी पड़ सकता है असर
बारिश के दौरान रास्ता खतरनाक होने से बच्चों के सामने दोहरी परेशानी होती है।
अगर वे स्कूल जाएं तो रास्ते में खतरा है और अगर न जाएं तो पढ़ाई प्रभावित होती है।
ग्रामीण इलाकों में पहले से ही स्कूल तक पहुंच कई परिवारों के लिए चुनौती होती है। ऐसे में बारिश के चार महीनों तक रास्ता बाधित होना बच्चों की शिक्षा पर भी असर डाल सकता है।
खासकर छोटे बच्चों के माता-पिता उन्हें अकेले भेजने से डर सकते हैं।
🌧️ सिर्फ बच्चे नहीं, पूरा गांव प्रभावित
यह मामला केवल स्कूल जाने वाले बच्चों तक सीमित नहीं है।
नाले में पानी बढ़ने के बाद गांव के बुजुर्गों और महिलाओं को भी परेशानी होती है।
गर्भवती महिलाओं के लिए ऐसी स्थिति विशेष रूप से गंभीर हो सकती है क्योंकि आपात स्थिति में अस्पताल या स्वास्थ्य केंद्र तक पहुंचना मुश्किल हो सकता है।
इसी तरह किसी व्यक्ति को अचानक चिकित्सा सहायता की जरूरत पड़े तो रास्ता बड़ी बाधा बन सकता है।
🛣️ सड़क है, लेकिन पुल नहीं
इस पूरे मामले की मूल समस्या कनेक्टिविटी से जुड़ी है।
गांव के लोगों के लिए रास्ता मौजूद है, लेकिन नाले पर पर्याप्त पुल या सुरक्षित क्रॉसिंग की व्यवस्था नहीं होने के कारण बारिश के मौसम में आवागमन रुक जाता है।
यही वजह है कि ग्रामीण लंबे समय से पुल की मांग कर रहे हैं।
🏗️ 75 मीटर लंबे पुल का प्रस्ताव
अब प्रशासन की तरफ से इस समस्या के समाधान की दिशा में कदम उठाने की बात कही गई है।
लखनादौन जनपद CEO निलेश बर्मन के अनुसार, सहायक यंत्री के नेतृत्व में एक जांच दल को मौके पर भेजा गया है।
जांच दल की रिपोर्ट मिलने के बाद जिला स्तर पर पुल निर्माण का प्रस्ताव भेजा जाएगा।
प्रशासन के मुताबिक यहां करीब 75 मीटर लंबे पुल की जरूरत है।
🔍 पहले होगी मौके की जांच
पुल बनाने से पहले इलाके की स्थिति और जरूरत का आकलन किया जाएगा।
जांच दल मौके पर जाकर नाले की चौड़ाई, पानी के बहाव, आसपास की आबादी और आवाजाही की स्थिति जैसी चीजों का जायजा लेगा।
इसके बाद रिपोर्ट के आधार पर आगे की प्रक्रिया शुरू होगी।
🏗️ किन विभागों से बन सकता है पुल?
प्रशासन के अनुसार पुल का निर्माण ग्रामीण यांत्रिकी सेवा (RES) या किसी अन्य संबंधित विभाग के माध्यम से कराया जा सकता है।
यानी फिलहाल प्रशासन ने समस्या को संज्ञान में लिया है, लेकिन पुल कब तक बनकर तैयार होगा, इसकी निश्चित समयसीमा सामने नहीं आई है।
👦 बच्चों के लिए पुल क्यों जरूरी?
एक पुल बनने से बच्चों के लिए सिर्फ स्कूल जाना आसान नहीं होगा।
बारिश के दौरान उनकी सुरक्षा सुनिश्चित होगी और अभिभावकों को उन्हें कंधे या गोद में उठाकर नाला पार कराने की जरूरत नहीं पड़ेगी।
इसके अलावा गांव के अन्य लोग भी सुरक्षित तरीके से मुख्य सड़क और आसपास के इलाकों तक पहुंच सकेंगे।
🚑 आपातकाल में भी काम आएगा पुल
पुल की जरूरत सिर्फ शिक्षा के लिए नहीं है।
अगर किसी ग्रामीण की तबीयत अचानक खराब हो जाए, किसी गर्भवती महिला को अस्पताल ले जाना हो या किसी बुजुर्ग को इलाज की जरूरत पड़े, तो सुरक्षित रास्ता बेहद महत्वपूर्ण होगा।
बारिश के मौसम में नाले के उफान पर आने की स्थिति में मौजूदा रास्ता ऐसी आपात परिस्थितियों में गंभीर बाधा बन सकता है।
📹 वायरल वीडियो ने दिखाई जमीनी हकीकत
इस पूरे मामले को सोशल मीडिया पर वायरल हुए वीडियो ने सामने ला दिया।
वीडियो में बच्चों और उनके परिजनों की मजबूरी साफ नजर आती है।
एक तरफ बच्चे स्कूल की ड्रेस में दिखाई देते हैं, दूसरी तरफ उनके सामने तेज बहाव वाला नाला है।
कुछ बच्चे एक-दूसरे का सहारा लेते हैं, जबकि छोटे बच्चों को बड़े लोग उठाकर पानी पार कराते हैं।
सवाल सिर्फ एक पुल का नहीं
यह मामला ग्रामीण भारत में बुनियादी ढांचे की एक बड़ी चुनौती की ओर भी इशारा करता है।
देश में स्कूल, सड़क और शिक्षा को लेकर कई योजनाएं चलती हैं, लेकिन अगर बच्चे स्कूल तक सुरक्षित पहुंच ही नहीं पाते तो केवल स्कूल का होना पर्याप्त नहीं है।
स्कूल तक पहुंचने के लिए सुरक्षित सड़क और पुल भी उतने ही जरूरी हैं।
बारिश के चार महीने सबसे मुश्किल
ग्रामीणों के मुताबिक बारिश के करीब चार महीने यह समस्या बनी रहती है।
इसका मतलब है कि यह कोई एक दिन की परेशानी नहीं बल्कि हर साल दोहराने वाली समस्या है।
बारिश कम होने के बाद पानी का स्तर घट जाता है और आवागमन सामान्य हो जाता है, लेकिन अगले मानसून में वही समस्या फिर सामने आ जाती है।
यही वजह है कि ग्रामीण अब अस्थायी समाधान की बजाय स्थायी पुल चाहते हैं।
प्रशासन के सामने अब चुनौती
प्रशासन ने जांच दल भेजने और पुल का प्रस्ताव तैयार करने की बात कही है।
अब असली चुनौती यह होगी कि जांच कितनी जल्दी पूरी होती है और प्रस्ताव को मंजूरी मिलने के बाद निर्माण कार्य कब शुरू होता है।
ग्रामीणों को उम्मीद है कि इस बार उनकी समस्या सिर्फ कागजों तक सीमित नहीं रहेगी।
बच्चों की सुरक्षा सबसे अहम
स्कूल जाने वाले बच्चों को रोज ऐसे रास्ते से गुजरना पड़ना गंभीर चिंता का विषय है।
तेज बहाव वाले पानी में पैर फिसलने, बच्चा बहने या चोट लगने का खतरा हमेशा बना रहता है।
इसलिए स्थायी पुल बनने तक प्रशासन के लिए यह जरूरी होगा कि बारिश के दौरान बच्चों और ग्रामीणों की सुरक्षा के लिए वैकल्पिक व्यवस्था पर भी विचार किया जाए।
ग्रामीणों को उम्मीद, अब बनेगा सुरक्षित रास्ता
कई वर्षों से समस्या झेल रहे ग्रामीणों को अब प्रशासन की जांच और प्रस्ताव से उम्मीद जगी है।
अगर 75 मीटर का पुल बन जाता है तो धौरीया और धाधर टोला के बीच आवागमन आसान हो सकता है।
सबसे बड़ा फायदा स्कूली बच्चों को होगा, जिन्हें बारिश में जान जोखिम में डालकर स्कूल नहीं जाना पड़ेगा।
