कभी जंगल में करते थे शिकार, अब वन्यजीवों के बन गए रक्षक; मणिपुर के गांव में कैमरा ट्रैप से बदली तस्वीर

शिरुई, मणिपुर | 2 नवंबर 2026

जंगलों और वन्यजीवों को बचाने की जिम्मेदारी केवल सरकार या वन विभाग की नहीं, बल्कि स्थानीय समुदाय भी इसमें अहम भूमिका निभा सकते हैं। मणिपुर के शिरुई गांव के लोगों ने इसका उदाहरण पेश किया है। यहां कभी शिकार करने वाले कुछ ग्रामीण अब जंगलों की निगरानी और वन्यजीवों के संरक्षण में जुटे हैं। कैमरा ट्रैप की मदद से जंगल में रहने वाले दुर्लभ और संकटग्रस्त जानवरों की मौजूदगी सामने आई है।

यह पहल दिखाती है कि स्थानीय लोगों का पारंपरिक वन ज्ञान और आधुनिक तकनीक मिलकर जैव विविधता की रक्षा में महत्वपूर्ण योगदान दे सकते हैं।

कैमरा ट्रैप से सामने आई वन्यजीवों की मौजूदगी

शिरुई गांव के आसपास के जंगलों में कैमरा ट्रैप लगाए गए हैं। इन कैमरों से जानवरों की गतिविधियों को बिना उन्हें परेशान किए रिकॉर्ड किया जाता है। इस पहल के तहत अब तक 15 स्तनधारी प्रजातियों और 321 पक्षी प्रजातियों की पहचान की गई है।

कैमरों में दुर्लभ और संकटग्रस्त प्रजातियों की तस्वीरें भी रिकॉर्ड हुई हैं। इनमें जंगली कुत्ता यानी ढोल, एशियाई काला भालू, असम मकाक, हिमालयन सीरो और ब्लाइथ ट्रैगोपान जैसी प्रजातियां शामिल हैं।

2024 से गांव में शिकार पर लगाया गया प्रतिबंध

शिरुई गांव के लोगों ने वर्ष 2024 में अपने क्षेत्र में शिकार पर तीन साल का प्रतिबंध लगाया था। इसका उद्देश्य जंगलों और वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास को सुरक्षित रखना था। कुछ विशेष परिस्थितियों में खेती की सुरक्षा के लिए पारंपरिक उपायों की सीमित छूट दी गई थी।

शुरुआत में इस संरक्षण अभियान की सफलता को मापने के लिए पर्याप्त वैज्ञानिक आंकड़े उपलब्ध नहीं थे। वर्ष 2025 में स्थानीय संरक्षण समूह ENFOGAL से जुड़े पैट्रिक शांग ने कैमरा ट्रैप लगाना शुरू किया। इससे जंगल में मौजूद प्रजातियों की व्यवस्थित जानकारी जुटाने में मदद मिली।

पूर्व शिकारी बने जंगल की निगरानी में मददगार

इस अभियान की खास बात यह है कि जंगलों और जानवरों की गतिविधियों की जानकारी रखने वाले स्थानीय लोग अब संरक्षण कार्य में सहयोग कर रहे हैं। पूर्व शिकारी पामरेइथिंग लुइरेइवो को जंगल के रास्तों, जानवरों के पदचिह्नों और उनके आने-जाने के स्थानों की अच्छी जानकारी है।

उनका यही अनुभव कैमरा ट्रैप लगाने के लिए सही जगह चुनने में मददगार साबित हुआ। इस तरह पारंपरिक ज्ञान को वैज्ञानिक निगरानी से जोड़ा गया।

संरक्षण अभियान को 2029 तक बढ़ाने का फैसला

तीन साल के शिकार प्रतिबंध की अवधि समाप्त होने के करीब आने पर गांव की सभा में संरक्षण अभियान के भविष्य पर चर्चा हुई। ग्रामीणों ने इसके प्रभाव को देखते हुए इस पहल को अगले तीन साल यानी 2027 से 2029 तक जारी रखने का निर्णय लिया।

आने वाले चरण में शिरुई यूथ क्लब और विद्यार्थियों के संगठन को भी निगरानी, जागरूकता और वन्यजीवों के दस्तावेजीकरण से जोड़ने की योजना है।

दूसरे गांवों के लिए बन सकती है मिसाल

शिरुई गांव की पहल बताती है कि जंगलों की रक्षा में स्थानीय समुदाय की भागीदारी कितनी महत्वपूर्ण है। कैमरा ट्रैप से वन्यजीवों की मौजूदगी का प्रमाण मिलने के बाद ग्रामीणों में अपने प्राकृतिक संसाधनों को बचाने के प्रति उत्साह बढ़ा है।

विशेषज्ञों और संरक्षण कार्यकर्ताओं के लिए यह मॉडल एक महत्वपूर्ण उदाहरण है कि तकनीक, सामुदायिक सहयोग और पारंपरिक ज्ञान के जरिए जैव विविधता को सुरक्षित रखने की दिशा में प्रभावी कदम उठाए जा सकते हैं।

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