ईटानगर / नई दिल्ली | 23 अक्टूबर 2026
अरुणाचल प्रदेश के निचले हिमालयी क्षेत्र में प्रस्तावित एक बड़ी जलविद्युत परियोजना ने पर्यावरण संरक्षण को लेकर नई बहस छेड़ दी है। सरकारी कंपनी नेशनल हाइड्रोइलेक्ट्रिक पावर कॉरपोरेशन (NHPC) ने कमला जलविद्युत परियोजना के निर्माण के लिए 3,278 हेक्टेयर वन भूमि के उपयोग की मंजूरी मांगी है। परियोजना के प्रस्ताव को अनुमति मिलने पर लगभग 23 लाख 40 हजार पेड़ों की कटाई करनी पड़ सकती है।
प्रस्तावित परियोजना की क्षमता 1,720 मेगावाट है और इसकी अनुमानित लागत करीब 24,000 करोड़ रुपये बताई गई है। केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय की वन सलाहकार समिति (FAC) के एजेंडे में 23 अक्टूबर 2026 को इस वन भूमि संबंधी प्रस्ताव पर विचार किया जाना निर्धारित है। हालांकि, उपलब्ध रिपोर्टों में समिति की अंतिम मंजूरी की पुष्टि नहीं है।
तीन जिलों के जंगलों पर पड़ेगा असर
कमला जलविद्युत परियोजना अरुणाचल प्रदेश की कमला नदी पर प्रस्तावित है। कमला नदी, सुबनसिरी नदी की दाहिनी ओर मिलने वाली एक प्रमुख सहायक नदी है। परियोजना के लिए क्रा दादी, कुरुंग कुमे और कमले जिलों में फैली वन भूमि के उपयोग का प्रस्ताव रखा गया है।
परियोजना के दस्तावेजों के अनुसार, कुल 23,40,213 पेड़ों की कटाई प्रस्तावित है। इनमें लगभग 15.08 लाख पेड़ हापोली वन प्रभाग और 8.31 लाख पेड़ क्रा दादी वन प्रभाग में हैं।
यह क्षेत्र घने जंगलों और पहाड़ी भूभाग से घिरा है। इसलिए यहां बड़े पैमाने पर वन भूमि का उपयोग केवल पेड़ों तक सीमित मुद्दा नहीं है, बल्कि इससे स्थानीय पारिस्थितिकी, वन्यजीवों के आवास और प्राकृतिक वनस्पति पर भी प्रभाव पड़ने की आशंका है।
1,720 मेगावाट बिजली पैदा करने की योजना
कमला जलविद्युत परियोजना का उद्देश्य नदी के पानी का उपयोग करके बिजली का उत्पादन करना है। परियोजना में भंडारण की सुविधा वाला रन-ऑफ-द-रिवर मॉडल प्रस्तावित है। योजना के तहत 216 मीटर ऊंचा कंक्रीट ग्रेविटी बांध बनाया जाना है।
परियोजना के विवरण के अनुसार, इसमें 210 मेगावाट की आठ इकाइयां और 40 मेगावाट की एक इकाई प्रस्तावित हैं। इस तरह इसकी कुल स्थापित क्षमता 1,720 मेगावाट होगी। परियोजना से सालाना लगभग 6,870 मिलियन यूनिट बिजली उत्पादन का अनुमान भी सामने आया है।
ऊर्जा उत्पादन के लिहाज से यह परियोजना महत्वपूर्ण मानी जा रही है, लेकिन इसके लिए जरूरी वन भूमि और प्राकृतिक संसाधनों के उपयोग को लेकर पर्यावरणीय सवाल भी उठ रहे हैं।
घने जंगलों और जैव विविधता को लेकर चिंता
परियोजना के लिए प्रस्तावित वन भूमि में 439 हेक्टेयर क्षेत्र को अत्यंत घना जंगल और 1,119 हेक्टेयर को मध्यम घनत्व वाला जंगल वर्गीकृत किया गया है। क्षेत्र में किए गए मौसमी सर्वेक्षणों में 69 वनस्पति परिवारों से संबंधित 155 पौध प्रजातियां दर्ज की गई हैं।
पर्यावरण मंत्रालय के क्षेत्रीय कार्यालय की निरीक्षण रिपोर्ट में कहा गया है कि परियोजना स्थल किसी राष्ट्रीय उद्यान, वन्यजीव अभयारण्य, बायोस्फीयर रिजर्व या हाथी गलियारे के भीतर नहीं आता। हालांकि, रिपोर्ट में यह भी चेतावनी दी गई है कि परियोजना से कई वन्यजीवों के आवास प्रभावित हो सकते हैं।
जलाशय के कारण नदी के दोनों किनारों के बीच जलमग्न क्षेत्र की चौड़ाई बढ़ने से जंगली जानवरों की आवाजाही बाधित होने की आशंका भी जताई गई है। इसी वजह से अधिकारियों ने वन्यजीव प्रभाव कम करने और जैव विविधता संरक्षण के लिए विस्तृत योजना तैयार करने की आवश्यकता बताई है।
अरुणाचल में पेड़ों की कटाई, मध्य प्रदेश में होगा पौधरोपण
परियोजना के लिए वन भूमि के उपयोग से होने वाले नुकसान की भरपाई के उद्देश्य से NHPC ने मध्य प्रदेश के विभिन्न जिलों में 7,018 हेक्टेयर क्षेत्र में प्रतिपूरक वनीकरण करने का प्रस्ताव दिया है।
वन संरक्षण संबंधी प्रावधानों के तहत, गैर-वन उद्देश्य के लिए वन भूमि का उपयोग किए जाने पर प्रतिपूरक पौधरोपण की व्यवस्था करनी होती है। जहां संबंधित राज्य में उपयुक्त गैर-वन भूमि उपलब्ध नहीं होती, वहां लागू नियमों के अनुसार दूसरे राज्य में पौधरोपण की व्यवस्था की जा सकती है। क्षतिपूर्ति की वास्तविक शर्तें मंजूरी और लागू नियमों पर निर्भर करेंगी।
इस परियोजना के मामले में अरुणाचल प्रदेश की वन भूमि के बदले मध्य प्रदेश में पौधरोपण का प्रस्ताव इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि दोनों राज्यों के बीच भौगोलिक दूरी काफी अधिक है।
हालांकि, प्रतिपूरक पौधरोपण और मौजूदा प्राकृतिक जंगलों के बीच अंतर होता है। लगाए गए नए पौधों को परिपक्व वन बनने में लंबा समय लग सकता है। इसलिए केवल पौधों की संख्या के बजाय उनके जीवित रहने, स्थानीय प्रजातियों के संरक्षण और पूरे पारिस्थितिकी तंत्र की बहाली की निगरानी भी जरूरी होगी।
126 गांवों के 5,440 परिवार भी हो सकते हैं प्रभावित
परियोजना को लेकर चिंता केवल वन और वन्यजीवों तक सीमित नहीं है। इसकी सामाजिक प्रभाव आकलन रिपोर्ट के अनुसार, परियोजना से 126 गांवों के लगभग 5,440 परिवार प्रभावित हो सकते हैं।
कमला नदी की घाटी मुख्य रूप से पहाड़ी है और बड़े हिस्से में घने जंगल फैले हैं। ऐसे इलाकों में बड़े बुनियादी ढांचे का निर्माण स्थानीय लोगों की आजीविका, जमीन के इस्तेमाल और प्राकृतिक संसाधनों तक पहुंच पर असर डाल सकता है।
हालांकि, उपलब्ध आंकड़े यह स्पष्ट नहीं करते कि इन परिवारों में से कितने लोगों का विस्थापन होगा या प्रत्येक परिवार पर किस प्रकार का प्रभाव पड़ेगा। इसके लिए विस्तृत सामाजिक प्रभाव आकलन और पुनर्वास संबंधी दस्तावेज महत्वपूर्ण होंगे।
वन मंजूरी से पहले पर्यावरणीय प्रभावों पर विचार
कमला जलविद्युत परियोजना को इस साल जनवरी में पर्यावरण मंत्रालय की नदी घाटी और जलविद्युत परियोजनाओं से संबंधित विशेषज्ञ समिति ने पर्यावरणीय मंजूरी के लिए सिफारिश की थी। यह सिफारिश इस शर्त के साथ थी कि अंतिम पर्यावरणीय मंजूरी देने से पहले वन भूमि के उपयोग के लिए सैद्धांतिक मंजूरी प्राप्त करनी होगी।
इसलिए वन सलाहकार समिति के समक्ष प्रस्ताव पर विचार करना परियोजना की मंजूरी प्रक्रिया का एक महत्वपूर्ण चरण है। वन भूमि के उपयोग की अनुमति, वन्यजीव संरक्षण योजना और पर्यावरणीय प्रभावों से जुड़े प्रश्न आगे की प्रक्रिया में अहम रहेंगे।
विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन की चुनौती
जलविद्युत परियोजनाएं बिजली उत्पादन में योगदान दे सकती हैं, लेकिन पहाड़ी और वन-संपन्न क्षेत्रों में उनका निर्माण कई पर्यावरणीय चुनौतियां पैदा कर सकता है। पेड़ों की कटाई, वन्यजीवों के आवास में बदलाव, नदी के प्राकृतिक प्रवाह और स्थानीय समुदायों पर पड़ने वाले प्रभाव का आकलन आवश्यक है।
कमला परियोजना के मामले में भी बिजली उत्पादन की संभावित क्षमता के साथ-साथ प्राकृतिक जंगलों और जैव विविधता पर पड़ने वाले असर को ध्यान में रखना होगा। विशेषज्ञों की चिंता यह है कि प्रतिपूरक पौधरोपण के साथ वास्तविक वन पारिस्थितिकी की बहाली, वन्यजीवों की सुरक्षित आवाजाही और स्थानीय लोगों के हितों की सुरक्षा पर भी ठोस कदम उठाए जाएं।
फिलहाल, प्रस्तावित वन भूमि उपयोग पर समिति की समीक्षा और आगे होने वाले फैसलों पर नजर रहेगी। जब तक आवश्यक स्वीकृतियां नहीं मिल जातीं, प्रस्तावित पेड़ कटाई को अंतिम रूप से स्वीकृत या पूरी हो चुकी कार्रवाई के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
