नई दिल्ली | 19 अक्टूबर 2026
शारदीय नवरात्रि के नौवें दिन मां दुर्गा के नौवें स्वरूप मां सिद्धिदात्री की पूजा की जाती है। महानवमी के दिन मां सिद्धिदात्री की आराधना करने का विशेष धार्मिक महत्व माना गया है। मान्यता है कि मां सिद्धिदात्री अपने भक्तों को सिद्धियां प्रदान करती हैं और उनके जीवन से अज्ञान, भय तथा नकारात्मकता को दूर करती हैं। धार्मिक कथाओं के अनुसार, भगवान शिव ने भी मां सिद्धिदात्री की कृपा से आठों सिद्धियां प्राप्त की थीं। इसी कारण मां सिद्धिदात्री और भगवान शिव से जुड़ी कथा का नवरात्रि में विशेष महत्व है।
कौन हैं मां सिद्धिदात्री?
मां सिद्धिदात्री मां दुर्गा का नौवां स्वरूप हैं। उनके नाम का अर्थ है सिद्धियां प्रदान करने वाली देवी। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मां सिद्धिदात्री की पूजा से भक्तों को आध्यात्मिक शक्ति, ज्ञान और जीवन में सफलता प्राप्त करने का आशीर्वाद मिलता है।
मां सिद्धिदात्री को कमल के आसन पर विराजमान और चार भुजाओं वाली देवी के रूप में दर्शाया जाता है। उनके हाथों में कमल, शंख, चक्र और गदा धारण करने का वर्णन मिलता है। उनका वाहन सिंह माना जाता है। हालांकि, कुछ चित्रणों में उन्हें कमल पर विराजमान भी दिखाया जाता है।
मां सिद्धिदात्री की व्रत कथा
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, सृष्टि के आरंभ में भगवान शिव ने आदिशक्ति की आराधना की। देवी की कृपा से उन्हें अनेक दिव्य शक्तियां और सिद्धियां प्राप्त हुईं। मां सिद्धिदात्री को इन सिद्धियों की दात्री माना जाता है।
धार्मिक कथा के अनुसार, मां सिद्धिदात्री की कृपा से भगवान शिव का स्वरूप आधा पुरुष और आधा स्त्री हो गया। इस स्वरूप को अर्धनारीश्वर कहा जाता है। यह स्वरूप शिव और शक्ति के अभिन्न संबंध का प्रतीक माना जाता है। इससे यह संदेश मिलता है कि सृष्टि की रचना और संचालन में पुरुष और प्रकृति, दोनों की भूमिका महत्वपूर्ण है।
एक अन्य धार्मिक मान्यता के अनुसार, मां सिद्धिदात्री अपने भक्तों की सच्ची श्रद्धा से प्रसन्न होकर उन्हें आठ प्रमुख सिद्धियां प्रदान करती हैं। इन सिद्धियों में अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व और वशित्व शामिल हैं। मान्यता है कि देवी की उपासना से भक्त आध्यात्मिक उन्नति की ओर बढ़ते हैं।
भगवान शिव और मां सिद्धिदात्री का खास संबंध
मां सिद्धिदात्री की कथा में भगवान शिव का अर्धनारीश्वर स्वरूप विशेष महत्व रखता है। धार्मिक परंपरा के अनुसार, देवी की कृपा से भगवान शिव के शरीर का आधा भाग देवी शक्ति का स्वरूप बन गया। इसी कारण उन्हें अर्धनारीश्वर कहा गया।
अर्धनारीश्वर स्वरूप को शिव और शक्ति की एकता, संतुलन तथा परस्पर पूरकता का प्रतीक माना जाता है। यह स्वरूप बताता है कि शक्ति के बिना शिव का स्वरूप पूर्ण नहीं माना जाता। महानवमी पर मां सिद्धिदात्री की पूजा करते समय भक्त इस दिव्य एकता का स्मरण करते हैं।
महानवमी पर कैसे करें मां सिद्धिदात्री की पूजा?
महानवमी के दिन सुबह स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें और पूजा स्थल को साफ करें। इसके बाद मां सिद्धिदात्री की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित कर उन्हें पुष्प, अक्षत, धूप, दीप और फल अर्पित करें।
पूजा के दौरान मां के मंत्र का जाप करें और अपनी श्रद्धा के अनुसार दुर्गा सप्तशती या मां सिद्धिदात्री की व्रत कथा का पाठ करें। कई परिवारों में महानवमी पर कन्या पूजन और हवन करने की परंपरा भी है।
मां सिद्धिदात्री का मंत्र:
ॐ देवी सिद्धिदात्र्यै नमः॥
इस मंत्र का श्रद्धापूर्वक जाप करके भक्त मां से सुख, शांति, ज्ञान और आध्यात्मिक उन्नति की कामना करते हैं।
मां सिद्धिदात्री को क्या भोग लगाएं?
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, महानवमी पर मां सिद्धिदात्री को फल, मिठाई और हलवा-पूरी का भोग अर्पित किया जा सकता है। कुछ परंपराओं में तिल से बने व्यंजन भी चढ़ाए जाते हैं। पूजा में भोग का चयन परिवार की परंपरा और स्थानीय धार्मिक मान्यताओं के अनुसार किया जा सकता है।
मां को भोग अर्पित करने के बाद प्रसाद परिवार के सदस्यों और श्रद्धालुओं में बांटा जाता है। कन्या पूजन करने वाले भक्त कन्याओं को भोजन कराकर दक्षिणा या उपहार भी देते हैं।
मां सिद्धिदात्री की पूजा का धार्मिक महत्व
मां सिद्धिदात्री की आराधना को आत्मविश्वास, विवेक और आध्यात्मिक शक्ति प्राप्त करने का माध्यम माना जाता है। धार्मिक मान्यता है कि सच्चे मन से देवी की पूजा करने से भक्तों को कठिन परिस्थितियों का सामना करने की शक्ति मिलती है।
महानवमी नवरात्रि की साधना का महत्वपूर्ण दिन है। इस दिन मां सिद्धिदात्री की पूजा के साथ भक्त नौ दिनों की उपासना पूर्ण करते हैं और परिवार की सुख-समृद्धि तथा कल्याण की कामना करते हैं।
