जलवायु की मार से संकट में ‘लाल सोना’, झारखंड-बंगाल में लाख उत्पादन घटा; लाखों आदिवासी परिवारों की आय पर असर

खूंटी/रांची | 18 अगस्त 2026

भारत में लाख को अक्सर ‘लाल सोना’ कहा जाता है। यह सिर्फ एक वन उत्पाद नहीं, बल्कि देश के कई आदिवासी और वन-आश्रित परिवारों की आय का महत्वपूर्ण साधन है। लेकिन बदलता मौसम, अनिश्चित बारिश, बढ़ता तापमान और चरम मौसम की घटनाएं लाख उत्पादन के सामने बड़ी चुनौती बनकर उभर रही हैं।

झारखंड और पश्चिम बंगाल जैसे प्रमुख उत्पादक राज्यों में पिछले कुछ वर्षों के आंकड़े लाख उत्पादन में भारी उतार-चढ़ाव दिखाते हैं। इसका सीधा असर उन परिवारों पर पड़ रहा है, जो जंगल और पेड़ों पर होने वाली लाख की खेती से अपनी आय का एक हिस्सा जुटाते हैं।

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद यानी ICAR के अनुसार लाख उद्योग देश के 11 राज्यों के करीब 30 से 40 लाख आदिवासी परिवारों की आजीविका से जुड़ा है। ऐसे में उत्पादन में आने वाली गिरावट केवल कृषि या वन उत्पाद का मुद्दा नहीं है, बल्कि यह ग्रामीण और आदिवासी अर्थव्यवस्था के लिए भी गंभीर चुनौती है।

खूंटी में किसान ने बताया नुकसान का दर्द

झारखंड के खूंटी जिले के रनिया ब्लॉक के टांगेरकला गांव के किसान महावीर साहू लाख की खेती में मौसम के बदलते मिजाज से परेशान हैं।

उनके मुताबिक पिछले साल खराब मौसम के कारण उनकी करीब 50 फीसदी कच्ची रंगीनी लाख खराब हो गई। उन्होंने अक्टूबर-नवंबर के दौरान बेर के पेड़ों पर लाख के बीज यानी ब्रूड लाख चढ़ाए थे, लेकिन अत्यधिक धुंध और कुहासे ने लाख कीटों के विकास को प्रभावित किया।

इससे उन्हें करीब 3 लाख रुपये का नुकसान हुआ।

महावीर साहू तीन अन्य किसानों के साथ मिलकर 100 से ज्यादा बेर के पेड़ों पर साझा रूप से लाख की खेती करते हैं। उनका अनुभव बताता है कि लाख उत्पादन में मौसम की भूमिका कितनी महत्वपूर्ण है।

उनके अनुसार पहले पांच किलो ब्रूड लाख लगाने पर एक पेड़ से कई गुना ज्यादा कच्ची लाख मिल जाती थी, लेकिन अब कई पेड़ों पर इतना उत्पादन भी नहीं हो रहा कि लागत निकल सके।

लाख की खेती बन गई मौसम पर निर्भर ‘जुआ’

लाख उत्पादन की पूरी प्रक्रिया मौसम पर काफी निर्भर रहती है।

किसानों को पहले पेड़ों पर लाख के कीटों के लिए ब्रूड लाख चढ़ानी होती है। इसके बाद कीट पेड़ पर विकसित होते हैं और लाख का स्राव करते हैं। सही तापमान, नमी और मौसम की जरूरत होती है।

अगर इस दौरान अत्यधिक बारिश, धुंध, ठंड या तापमान में असामान्य बदलाव हो जाए तो लाख कीटों का विकास प्रभावित हो सकता है।

यही वजह है कि किसानों के लिए मौसम की अनिश्चितता आर्थिक जोखिम बढ़ा रही है।

दो प्रमुख किस्मों पर मौसम का अलग असर

भारत में लाख की दो प्रमुख जैविक नस्लों की खेती का उल्लेख रिपोर्ट में किया गया है—रंगीनी और कुसुमी

रंगीनी लाख मुख्य रूप से पलाश, बेर और खैर जैसे पेड़ों पर होती है। इसका रंग अपेक्षाकृत गहरा लाल होता है और इसे तुलनात्मक रूप से ज्यादा कठोर परिस्थितियां सहने वाली किस्म माना जाता रहा है।

दूसरी ओर कुसुमी लाख कुसुम के पेड़ पर होती है। इसकी गुणवत्ता बेहतर मानी जाती है और इससे बनने वाली शेलैक ज्यादा चमकदार और महंगी होती है।

लेकिन कुसुमी लाख मौसम के प्रति अधिक संवेदनशील है।

अत्यधिक बारिश ने कुसुमी लाख को भी नुकसान पहुंचाया

रिपोर्ट के अनुसार 2025 में जून-जुलाई के दौरान अत्यधिक बारिश ने कुसुमी लाख की फसल को भारी नुकसान पहुंचाया।

अत्यधिक बारिश के कारण कुसुम के पेड़ों की डालियां समय पर सूख नहीं पाईं। इससे लाख के कीटों और फफूंद के हमले की संभावना बढ़ गई।

किसानों को समय पर दवा का छिड़काव करने में भी परेशानी हुई। परिणामस्वरूप कई जगह लाख कीटों की मृत्यु हुई और उत्पादन प्रभावित हुआ।

झारखंड का लाख उत्पादन भी गिरा

झारखंड लंबे समय से भारत का सबसे बड़ा लाख उत्पादक राज्य रहा है।

ICAR-NISA के आंकड़ों के मुताबिक 2015-16 से 2020-21 के बीच देश के कुल लाख उत्पादन में झारखंड की हिस्सेदारी करीब 54 फीसदी थी।

लेकिन पिछले दशक में उत्पादन में भारी उतार-चढ़ाव देखने को मिला।

2015-16 में झारखंड में करीब 9,950 टन लाख का उत्पादन हुआ था। यह 2020-21 में बढ़कर 11,598 टन के उच्चतम स्तर पर पहुंचा।

लेकिन इसके बाद उत्पादन तेजी से गिरा और 2023-24 में यह घटकर सिर्फ 6,523 टन रह गया। यानी 2020-21 के उच्चतम स्तर की तुलना में करीब 44 फीसदी की गिरावट

2024-25 में कुछ सुधार हुआ और उत्पादन करीब 7,980 टन रहा, लेकिन यह अब भी 2015-16 के स्तर से लगभग 20 फीसदी कम था।

बंगाल में गिरावट और भी ज्यादा गंभीर

पश्चिम बंगाल में लाख उत्पादन की स्थिति और ज्यादा चिंताजनक रही।

2015-16 में पश्चिम बंगाल में करीब 582 टन लाख का उत्पादन हुआ था।

2020-21 में यह बढ़कर 1,207 टन के उच्चतम स्तर पर पहुंच गया।

लेकिन इसके बाद उत्पादन में जबरदस्त गिरावट आई।

2022-23 में पश्चिम बंगाल का लाख उत्पादन सिर्फ 150 टन रह गया। यानी 2020-21 के उच्चतम स्तर से करीब 88 फीसदी की गिरावट

2024-25 में कुछ सुधार हुआ और उत्पादन करीब 300 टन रहा, लेकिन यह अब भी 2015-16 की तुलना में लगभग 48 फीसदी कम था।

पूरे देश में भी दिखा उतार-चढ़ाव

भारत का कुल लाख उत्पादन 2015-16 में 18,746 टन था।

2020-21 में यह बढ़कर 21,590 टन के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचा।

लेकिन इसके बाद सिर्फ तीन साल में उत्पादन घटकर 2023-24 में 13,531 टन रह गया।

यानी रिकॉर्ड उत्पादन से करीब 37 फीसदी की गिरावट

2024-25 में कुछ सुधार हुआ और देश में करीब 17,061 टन लाख का उत्पादन दर्ज हुआ, लेकिन यह अब भी 2020-21 के रिकॉर्ड स्तर से करीब 21 फीसदी नीचे था।

लाख उत्पादन के प्रमुख आंकड़े

क्षेत्रउच्चतम उत्पादनबाद का उत्पादन
झारखंड11,598 टन (2020-21)6,523 टन (2023-24)
पश्चिम बंगाल1,207 टन (2020-21)150 टन (2022-23)
भारत21,590 टन (2020-21)13,531 टन (2023-24)

मांग मजबूत, लेकिन उत्पादन कमजोर

लाख उत्पादन में गिरावट के बावजूद वैश्विक बाजार में भारतीय लाख की मांग बनी हुई है।

2024-25 में भारत ने शेलैक और लाख आधारित उत्पादों का करीब 154.44 मिलियन डॉलर का निर्यात किया।

रिपोर्ट के मुताबिक 2013-14 से 2024-25 के बीच निर्यात मात्रा में करीब 58 फीसदी की वृद्धि हुई, जबकि निर्यात से होने वाली आय में लगभग 767 फीसदी की वृद्धि हुई।

इसका मतलब है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारतीय लाख और उससे बने उत्पादों की कीमत और मांग दोनों महत्वपूर्ण बनी हुई हैं।

लाख सिर्फ चूड़ी और पॉलिश तक सीमित नहीं

लाख का इस्तेमाल पारंपरिक तौर पर चूड़ी, पॉलिश और सजावटी वस्तुओं में किया जाता रहा है।

लेकिन अब इसका इस्तेमाल कई आधुनिक उद्योगों में भी हो रहा है।

रांची स्थित नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ सेकेंडरी एग्रीकल्चर के निदेशक अभिजीत कर के मुताबिक लाख की मांग फार्मास्यूटिकल, न्यूट्रास्यूटिकल, कॉस्मेटिक, खाद्य प्रसंस्करण और रक्षा उद्योग में भी है।

यानी लाख उत्पादन का संकट केवल ग्रामीण बाजार को प्रभावित नहीं करता, बल्कि इसके असर की श्रृंखला आगे प्रोसेसिंग और निर्यात उद्योग तक जाती है।

प्रोसेसिंग यूनिट्स को नहीं मिल रहा कच्चा माल

लाख का उत्पादन कम होने का असर इसकी प्रोसेसिंग यूनिट्स पर भी पड़ा है।

रिपोर्ट के मुताबिक देश में पहले करीब 150 लाख प्रोसेसिंग यूनिट्स होने का उल्लेख ICAR के एक अध्ययन में किया गया था। अब इनमें से कई इकाइयां स्थानीय स्तर पर कच्चा माल नहीं मिलने के कारण बंद हो चुकी हैं।

झारखंड की कुछ प्रोसेसिंग इकाइयों को अब कच्चे माल के लिए दूसरे देशों की ओर देखना पड़ रहा है।

रिपोर्ट में झारखंड की एक लाख प्रोसेसिंग इकाई के संचालक के हवाले से बताया गया है कि इंडोनेशिया और थाईलैंड से भी लाख मंगाई जा रही है।

भारत की प्राकृतिक बढ़त भी खतरे में

भारत के पास लाख उत्पादन के लिए बेहतर गुणवत्ता वाली केरिया लक्का प्रजाति मौजूद है।

यही भारत की प्राकृतिक बढ़त मानी जाती है।

लेकिन अगर देश में उत्पादन लगातार कम होता रहा तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में दूसरे उत्पादक देश अपनी हिस्सेदारी बढ़ा सकते हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि इंडोनेशिया और थाईलैंड जैसे देश लाख उत्पादन बढ़ाने के लिए विशेष कार्यक्रम चला रहे हैं।

इससे भारत के लिए चुनौती यह है कि उसके पास बेहतर गुणवत्ता होने के बावजूद पर्याप्त मात्रा में उत्पादन नहीं हो पा रहा।

जलवायु परिवर्तन कितना जिम्मेदार?

वैज्ञानिक अध्ययनों में मौसम और लाख उत्पादन के बीच संबंध सामने आया है।

तापमान में बदलाव, बारिश के बदलते पैटर्न और अत्यधिक मौसम की घटनाएं लाख कीट के जीवन चक्र को प्रभावित कर सकती हैं।

रांची क्षेत्र के लंबे समय के तापमान और वर्षा के आंकड़ों के अध्ययन में अगस्त के अधिकतम तापमान में करीब 1.3 डिग्री सेल्सियस वृद्धि और न्यूनतम तापमान में करीब 0.5 डिग्री सेल्सियस कमी का उल्लेख किया गया है।

अगस्त-सितंबर का समय लाख कीट के प्रजनन और विकास के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। इसलिए इस दौरान तापमान में बदलाव उत्पादन को प्रभावित कर सकता है।

सूखा भी नुकसानदेह, ज्यादा बारिश भी

लाख उत्पादन के लिए सिर्फ ज्यादा बारिश ही समस्या नहीं है।

अत्यधिक सूखा और अत्यधिक नमी—दोनों उत्पादन को नुकसान पहुंचा सकते हैं।

पुराने अध्ययनों में अलग-अलग मौसम परिस्थितियों के दौरान लाख उत्पादन में बड़ी गिरावट दर्ज होने का उल्लेख किया गया है।

इससे पता चलता है कि लाख कीट के लिए संतुलित मौसम बेहद महत्वपूर्ण है।

कीटों के प्राकृतिक दुश्मन भी बढ़ा सकते हैं समस्या

मौसम में बदलाव का असर सिर्फ लाख कीट पर नहीं पड़ता।

लाख कीट के परजीवी और प्राकृतिक शत्रु भी मौसम से प्रभावित होते हैं।

इसका अर्थ है कि बदलता मौसम लाख उत्पादन पर दोहरी मार डाल सकता है—एक तरफ लाख कीट खुद तनाव में आता है और दूसरी तरफ उसके प्राकृतिक शत्रुओं की गतिविधि बढ़ सकती है।

आदिवासी परिवारों की आय पर सीधा असर

लाख की खेती कई आदिवासी परिवारों के लिए मुख्य आय के बजाय साइड इनकम का महत्वपूर्ण साधन है।

किसान पेड़ों से लाख निकालकर स्थानीय हाट बाजारों में बेचते हैं। वहां से कारोबारी इसे छोटी प्रोसेसिंग इकाइयों तक पहुंचाते हैं।

लेकिन उत्पादन कम होने से किसानों की आमदनी घटती है और प्रोसेसिंग इकाइयों को कच्चा माल महंगा या कम मात्रा में मिलता है।

इसका असर पूरी स्थानीय अर्थव्यवस्था पर पड़ता है।

लाख को अभी तक नहीं मिला कृषि उत्पाद का दर्जा

रिपोर्ट में एक बड़ी नीतिगत समस्या की ओर भी ध्यान दिलाया गया है।

देश में लाख को अभी तक कृषि उत्पाद का दर्जा नहीं मिला है।

झारखंड सरकार ने 2021 में लाख की खेती को कृषि का दर्जा देने की घोषणा की थी और 2023 में कैबिनेट स्तर पर भी फैसला लिया गया था। लेकिन रिपोर्ट के मुताबिक जमीन पर और कानूनी-प्रशासनिक ढांचे में लाख को लेकर स्थिति अभी भी पूरी तरह स्पष्ट या एकरूप नहीं है।

किसानों को नहीं मिलती दूसरी फसलों जैसी सुविधाएं

लाख उत्पादकों की एक बड़ी समस्या यह भी बताई गई है कि उन्हें सामान्य कृषि फसलों जैसी सुविधाएं नहीं मिलतीं।

रिपोर्ट में विशेषज्ञों के हवाले से कहा गया है कि किसानों को सब्सिडी, फसल ऋण और किसान क्रेडिट कार्ड जैसी सुविधाओं का लाभ पर्याप्त रूप से नहीं मिल रहा।

इससे मौसम खराब होने पर होने वाला नुकसान किसान के लिए और गंभीर हो जाता है।

MSP भी वर्षों से नहीं बदला

लाख के लिए झारखंड में न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी MSP से जुड़ी एक और समस्या सामने आती है।

रिपोर्ट के मुताबिक लाख के लिए करीब छह साल पहले तय 235 रुपये प्रति किलो का MSP अभी भी नहीं बदला है।

वहीं स्थानीय बाजार में किसानों को लगभग 1,000 से 1,200 रुपये प्रति किलो तक कीमत मिलने की बात रिपोर्ट में सामने आई है।

हालांकि बाजार मूल्य और MSP की भूमिका अलग-अलग है, लेकिन विशेषज्ञों के अनुसार MSP में बदलाव और सरकारी खरीद की सीमित मात्रा किसानों को पर्याप्त प्रोत्साहन नहीं दे रही।

किसान अब नए पेड़ों का प्रयोग कर रहे

संकट के बीच कुछ किसान समाधान खोजने की कोशिश भी कर रहे हैं।

खूंटी के रनिया क्षेत्र में किसान कैलियान्ड्रा और सेमियालाटा जैसे नए होस्ट पौधों पर लाख उत्पादन का प्रयोग कर रहे हैं।

इन पौधों को अपनाने का उद्देश्य बदलते मौसम के असर को कम करना और भविष्य में उत्पादन को ज्यादा स्थिर बनाना है।

हालांकि इन प्रयोगों के परिणाम आने में समय लगेगा।

विशेषज्ञों की नजर में समाधान क्या है?

विशेषज्ञों का मानना है कि लाख को सिर्फ पारंपरिक वन उत्पाद के रूप में देखने के बजाय इसे एक व्यावसायिक कृषि गतिविधि के रूप में विकसित करने की जरूरत है।

इसके लिए वैज्ञानिक अनुसंधान, बेहतर किस्में, मौसम आधारित सलाह, कीट प्रबंधन, किसानों को प्रशिक्षण, वित्तीय सहायता और बाजार से सीधा जुड़ाव जरूरी हो सकता है।

अगर उत्पादन वैज्ञानिक तरीके से बढ़ाया जाए तो भारत अपनी गुणवत्ता वाली लाख के कारण वैश्विक बाजार में अपनी स्थिति मजबूत रख सकता है।

‘लाख क्रांति’ की जरूरत

रांची स्थित विशेषज्ञों के मुताबिक जलवायु परिवर्तन को पूरी तरह रोका नहीं जा सकता, लेकिन उसके प्रभाव से निपटने के तरीके विकसित किए जा सकते हैं।

इसके लिए लाख की खेती को आधुनिक तकनीक, वैज्ञानिक प्रबंधन और बेहतर बाजार व्यवस्था से जोड़ने की जरूरत है।

अगर ऐसा नहीं हुआ तो वैश्विक मांग बढ़ने के बावजूद भारत का लाख उद्योग दूसरे देशों पर निर्भर हो सकता है।

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