सनातन धर्म में ‘महामंडलेश्वर’ की उपाधि पर बड़ा खुलासा: 20 लाख कैश या आश्रम के नाम जमीन का सौदा; जूना सहित 3 प्रमुख अखाड़े एक्सपोज

नई दिल्ली | 8 अगस्त, 2026

संत समाज और सनातन धर्म के सबसे प्रतिष्ठित तथा सर्वोच्च पदों में से एक ‘महामंडलेश्वर’ की पदवी को लेकर एक बेहद सनसनीखेज और चौंकाने वाला खुलासा सामने आया है। अखाड़ों की आंतरिक व्यवस्था और उपाधियों के वितरण में किस हद तक सौदेबाजी हावी हो चुकी है, इस बात का पर्दाफाश एक बड़ी आंतरिक रिपोर्ट और मीडिया स्टिंग के जरिए हुआ है। रिपोर्ट के मुताबिक, सनातन धर्म के नाम पर spiritual (आध्यात्मिक) पदों की खरीद-फरोख्त का खेल चल रहा है, जिसमें जूना अखाड़े सहित तीन बड़े अखाड़ों के कुछ पदाधिकारियों की संलिप्तता सामने आई है।

1. महामंडलेश्वर की उपाधि का फिक्स रेट: 20 लाख कैश या जमीन

खुलासे के अनुसार, अखाड़ों में बिना किसी उच्च आध्यात्मिक योग्यता, तपस्या या शास्त्रों के ज्ञान के केवल धनबल के आधार पर महामंडलेश्वर बनाने का काला कारोबार चल रहा है:

  • मोटे दाम तय: सूत्रों और वायरल ऑडियो-वीडियो साक्ष्यों के आधार पर दावा किया गया है कि महामंडलेश्वर जैसा गरिमामयी पद पाने के लिए 20 लाख रुपये नकद (Cash) या फिर किसी प्राइम लोकेशन पर आश्रम के नाम पर करोड़ों की जमीन ट्रांसफर करने की शर्तें रखी जाती हैं।
  • दलालों का सक्रिय नेटवर्क: अखाड़ों के भीतर कुछ ऐसे बिचौलिये और आंतरिक लोग सक्रिय हैं जो रसूखदार, व्यवसायियों और विवादित पृष्ठभूमि वाले लोगों से संपर्क साधकर सीधे पदों की सौदेबाजी करते हैं।

2. जूना अखाड़े सहित तीन बड़े अखाड़े एक्सपोज

इस पूरे खेल के सामने आने के बाद देश के सबसे बड़े और प्रमुख संत संगठनों पर बड़े सवाल खड़े हो गए हैं:

  • अखाड़ों की साख पर बट्टा: देश के सबसे बड़े संन्यासी अखाड़े यानी जूना अखाड़ा सहित तीन प्रतिष्ठित अखाड़ों के भीतर चल रही इस आंतरिक नूराकुश्ती और पैसे के लेन-देन के प्रमाण सामने आए हैं।
  • हालांकि अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद समय-समय पर अनुशासन और शुचिता की बात कहती रही है, लेकिन इस खुलासे ने यह साबित कर दिया है कि कैसे कुछ लालची पदाधिकारी सनातन परंपराओं को कलंकित कर रहे हैं।

3. योग्यता दरकिनार, रसूख और धन बना जरिया

सनातन परंपरा के अनुसार, महामंडलेश्वर वह संत बनता है जिसने वर्षों कठोर तपस्या की हो, वेदों-पुराणों का ज्ञाता हो और जिसका पूरा जीवन समाज कल्याण व धर्म के प्रचार में समर्पित रहा हो। लेकिन इसके विपरीत:

  • हाल के वर्षों में कई ऐसे लोग इस सर्वोच्च पद पर आसीन हो गए जिनका दूर-दूर तक अध्यात्म से कोई नाता नहीं रहा है।
  • पैसे और जमीन के दम पर पद हासिल करने वाले ये लोग बाद में बड़े स्तर पर आयोजनों और ठिकानों का व्यावसायिक लाभ उठाते हैं।

इस बड़े खुलासे के बाद देश भर के संत समाज में भारी रोष व्याप्त है। आम श्रद्धालुओं और धर्मावलंबियों का कहना है कि यदि अखाड़े इस तरह के सौदों पर सख्त रोक नहीं लगाते हैं, तो सनातन धर्म की पवित्र संस्थाओं से लोगों का विश्वास उठ जाएगा। अब देखना यह होगा कि अखाड़ा परिषद इस गंभीर मामले में क्या सुधारात्मक और दंडात्मक कदम उठाती है।

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