स्थान: उज्जैन (अवन्तिकापुरी)
दिनांक: 3 जुलाई, 2026
सांस्कृतिक संवाददाता, उज्जैन:
सनातन संस्कृति के प्रमुख केंद्र और बाबा महाकाल की नगरी उज्जैन में आज ‘अखिल भारतीय प्राच्य विद्या सम्मेलन’ के अंतर्गत एक विशेष वैचारिक संगोष्ठी का आयोजन किया गया। देश भर से आए प्रतिष्ठित वेदांतियों, इतिहासकारों और खगोलशास्त्रियों (Astronomers) ने इस दौरान ‘धर्म और वैदिक ज्योतिष की मूल अवधारणा’ विषय पर गहन मंथन किया।
संगोष्ठी में विद्वानों ने वर्तमान समाज में फैली भ्रांतियों को दूर करते हुए स्पष्ट शब्दों में रेखांकित किया कि धर्म मनुष्य के लिए जीवन जीने का एक नैतिक, आध्यात्मिक और तार्किक मार्ग है, जबकि वैदिक ज्योतिष ब्रह्मांडीय पिंडों (ग्रहों और नक्षत्रों) की गतियों के माध्यम से मनुष्य के कर्मों (प्रारब्ध) और उसके जीवन चक्र का सूक्ष्म अध्ययन करने वाला एक प्रामाणिक शास्त्र (विज्ञान) है। दोनों एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं।
1. धर्म: कोई कर्मकांड नहीं, बल्कि सार्वभौमिक आचरण संहिता है
संगोष्ठी के मुख्य वक्ता ने वेदों और उपनिषदों का हवाला देते हुए ‘धर्म’ शब्द की विस्तृत व्याख्या की। उन्होंने बताया कि आधुनिक युग में धर्म को केवल पूजा-पद्धति या मजहब से जोड़कर संकुचित कर दिया गया है, जो कि पूरी तरह भ्रामक है।
- धारण करने योग्य तत्व: धर्म की मूल परिभाषा ‘धारयति इति धर्मः’ है, अर्थात जिसे धारण किया जा सके। यह मनुष्य को समाज में रहने के लिए कर्तव्यपरायणता, सत्य, अहिंसा और न्याय का तार्किक मार्ग दिखाता है।
- आध्यात्मिक विकास का आधार: धर्म व्यक्ति को अपने अंतःकरण को शुद्ध करने और आत्मा के स्तर पर आध्यात्मिक प्रगति करने की प्रेरणा देता है। यह किसी व्यक्ति के जीवन को अनुशासित और समाज के अनुकूल बनाने वाली एक सर्वश्रेष्ठ नैतिक आचरण संहिता (Moral Code of Conduct) है।
2. वैदिक ज्योतिष: खगोलीय पिंडों और इंसानी ‘प्रारब्ध’ के जुड़ाव का विज्ञान
संगोष्ठी के दूसरे सत्र में ‘वेद के नेत्र’ कहे जाने वाले ज्योतिष शास्त्र के वैज्ञानिक दृष्टिकोण पर चर्चा हुई। विद्वानों ने स्पष्ट किया कि भारतीय ज्योतिष कोई जादुई विद्या या अंधविश्वास नहीं है, बल्कि यह गणित (Mathematics) और खगोल विज्ञान (Astronomy) पर आधारित एक सुव्यवस्थित विधा है।
काल और कर्म का गणित:
ज्योतिष शास्त्र के विशेषज्ञों ने बताया कि ब्रह्मांड में तैरते हुए विशाल ग्रह और नक्षत्र निरंतर ऊर्जा और गुरुत्वाकर्षण उत्सर्जित करते हैं, जिसका सीधा प्रभाव पृथ्वी और उस पर रहने वाले जीवों के सूक्ष्म शरीर पर पड़ता है। यह शास्त्र मनुष्य के जन्म के समय आकाश मंडल में ग्रहों की स्थिति (कुंडली) के जरिए उसके संचित कर्मों और प्रारब्ध (Destiny linked to past deeds) का लेखा-जोखा समझने का प्रयास करता है। यह समय (काल चक्र) के उतार-चढ़ाव को भांपने का एक तार्किक उपकरण है।
धर्म और ज्योतिष का अद्भुत समन्वय: अंधविश्वास से बचने की सलाह
| दृष्टिकोण | धर्म (Dharma) | वैदिक ज्योतिष (Vedic Astrology) |
| मूल स्वरूप | कर्तव्य, नैतिकता, अध्यात्म और तार्किक जीवन शैली। | काल, नक्षत्र, खगोलीय गणना और कर्म चक्र का अध्ययन। |
| उद्देश्य | मनुष्य के भीतर चेतना, करुणा और सत्य को जाग्रत करना। | प्रारब्ध को समझकर भविष्य के कर्मों को सही दिशा में मोड़ना। |
संगोष्ठी के समापन सत्र में सभी विद्वानों ने एक सुर में वर्तमान युग में ज्योतिष के नाम पर चल रही व्यावसायिक दुकानों और अंधविश्वासों पर चिंता व्यक्त की। वक्ताओं ने कहा कि ज्योतिष का उद्देश्य किसी को डराना या भाग्य के भरोसे बैठाना नहीं है। ज्योतिष हमें सचेत करता है, लेकिन धर्म (नैतिक कर्म) हमें उस विपरीत समय से लड़ने की आंतरिक शक्ति देता है। यदि कोई व्यक्ति धार्मिक और नैतिक रूप से सुदृढ़ है, तो वह अपने पुरुषार्थ (सकारात्मक कर्म) के बल पर ग्रहों के नकारात्मक प्रभाव को भी बदल सकता है।
