दिनांक: 6 जून, 2026
नई दिल्ली: जलवायु परिवर्तन का असर अब न केवल तापमान में हो रही बढ़ोत्तरी तक सीमित है, बल्कि यह सीधे तौर पर देश की खाद्य सुरक्षा और कृषि अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर रहा है। इस वर्ष मानसून के आगमन के साथ ही मौसम विशेषज्ञों ने एक गंभीर चेतावनी जारी की है—बीते महीनों में हुई असामान्य रूप से कम बारिश और पर्वतीय क्षेत्रों में घटती बर्फबारी आने वाले फसल चक्र के लिए बड़ा खतरा पैदा कर सकती है।
सिंचाई का संकट और घटता जलस्तर
कृषि विशेषज्ञों के अनुसार, हिमालयी क्षेत्रों में कम बर्फबारी का सीधा असर उत्तर भारत की नदियों के जलस्तर पर पड़ता है। नदियों में पानी की कम उपलब्धता का मतलब है कि रबी और खरीफ दोनों फसलों के लिए सिंचाई हेतु पर्याप्त जल उपलब्ध नहीं होगा। जल संसाधन विभाग की हालिया रिपोर्ट बताती है कि प्रमुख जलाशयों में जलभराव का स्तर पिछले वर्षों की तुलना में चिंताजनक रूप से नीचे चला गया है, जिससे किसानों को सूखे जैसी स्थिति का सामना करना पड़ सकता है।
खेती के लिए क्यों बढ़ेंगी मुश्किलें?
- फसल चक्र में बदलाव: मानसून की अनिश्चितता और कम बारिश के कारण किसानों को बुवाई की पारंपरिक तारीखों को बदलने पर मजबूर होना पड़ रहा है।
- लागत में बढ़ोत्तरी: नहरों और नदियों में पर्याप्त पानी न होने के कारण, किसानों को सिंचाई के लिए भूमिगत जल (ट्यूबवेल) पर निर्भर रहना पड़ रहा है, जिससे बिजली और ईंधन का खर्च कई गुना बढ़ गया है।
- मिट्टी की नमी पर प्रभाव: बर्फबारी की कमी से मिट्टी में नमी का स्तर (Soil Moisture) तेजी से कम हो रहा है, जिससे अनाज की उत्पादकता प्रभावित होने का अंदेशा है।
सरकार और किसानों की रणनीति
इस संकट को देखते हुए कृषि मंत्रालय ने राज्यों को ‘वैकल्पिक फसल योजना’ अपनाने का परामर्श दिया है। वैज्ञानिकों का सुझाव है कि किसान कम पानी लेने वाली फसलों (जैसे- मोटे अनाज, बाजरा) की ओर रुख करें। साथ ही, ड्रिप सिंचाई और सूक्ष्म सिंचाई पद्धतियों को अनिवार्य करने पर जोर दिया जा रहा है, ताकि सीमित जल संसाधन का अधिकतम लाभ मिल सके।
विशेषज्ञों की चेतावनी
पर्यावरणविद् डॉ. अनिल जोशी का कहना है, “यह केवल एक साल की समस्या नहीं है, बल्कि यह एक बड़े पारिस्थितिक असंतुलन का संकेत है। यदि हमने जल संचयन और वन संरक्षण पर तुरंत ध्यान नहीं दिया, तो आने वाले समय में ‘कृषि संकट’ देश की बड़ी चुनौती बन जाएगा।”
फिलहाल, किसान आसमान की ओर उम्मीद भरी नजरों से देख रहे हैं। जलवायु परिवर्तन का यह संकट अब केवल पर्यावरणविदों के लिए चर्चा का विषय नहीं, बल्कि देश के अन्नदाताओं के लिए अस्तित्व का प्रश्न बन चुका है।
