भोपाल, 17 सितंबर 2026: मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में प्रस्तावित क्रिकेट स्टेडियम और उससे जुड़े सड़क निर्माण के लिए काटे गए पेड़ों के मामले में राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) ने सख्त रुख अपनाया है। अधिकरण ने मध्य प्रदेश वन विभाग को करीब 700 पेड़ों की कटाई के बदले 7,000 पेड़ लगाने का निर्देश दिया है। यानी जितने पेड़ काटे गए, उसके मुकाबले 10 गुना पौधरोपण किया जाना है। NGT ने इस पूरी प्रक्रिया को 30 सितंबर 2026 तक पूरा करने को कहा है।
मामला भोपाल के नीलबड़-नाथू बरखेड़ा क्षेत्र में प्रस्तावित क्रिकेट स्टेडियम और उससे जुड़ी सड़क निर्माण गतिविधियों से संबंधित है। यह क्षेत्र भोज वेटलैंड के कैचमेंट क्षेत्र से जुड़ा हुआ है, जिसके चलते निर्माण गतिविधियों और पेड़ों की कटाई को लेकर पर्यावरण संबंधी आपत्तियां सामने आई थीं।
700 पेड़ों की कटाई के बदले 7 हजार पौधे
NGT की केंद्रीय क्षेत्र पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि करीब 700 पेड़ों की कटाई के मद्देनजर 10 गुना यानी 7,000 पेड़ों का क्षतिपूरक पौधरोपण किया जाना चाहिए।
अधिकरण ने वन विभाग और सामाजिक वानिकी शाखा को निर्देश दिया कि मौजूदा पौधरोपण मौसम में यह काम पूरा किया जाए और 30 सितंबर 2026 तक पूरी प्रक्रिया पूरी की जाए। इसके बाद अधिकारियों को पौधरोपण की तस्वीरों के साथ कार्रवाई रिपोर्ट भी प्रस्तुत करनी होगी।
अधिकरण ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल पौधे लगा देना पर्याप्त नहीं होगा। लगाए गए पौधों के जीवित रहने और उनकी देखभाल की जिम्मेदारी भी संबंधित विभाग की होगी।
भोज वेटलैंड के कैचमेंट क्षेत्र में हो रहा निर्माण
यह मामला सिर्फ पेड़ों की कटाई तक सीमित नहीं है। नीलबड़-नाथू बरखेड़ा इलाके में निर्माण गतिविधियां भोज वेटलैंड के कैचमेंट क्षेत्र से जुड़ी होने के कारण भी पर्यावरणीय दृष्टि से महत्वपूर्ण मानी जा रही हैं।
भोज वेटलैंड में भोपाल की अपर लेक और लोअर लेक शामिल हैं। यह क्षेत्र अंतरराष्ट्रीय महत्व की आर्द्रभूमि के रूप में मान्यता प्राप्त है। ऐसे में कैचमेंट क्षेत्र में होने वाली निर्माण गतिविधियों का पानी के प्रवाह और स्थानीय पारिस्थितिकी पर संभावित प्रभाव जांच का विषय बना हुआ है।
पौधरोपण में देरी को लेकर भी सवाल
सुनवाई के दौरान राज्य की ओर से अधिकारियों ने बताया कि क्षतिपूरक पौधरोपण की प्रक्रिया में देरी हुई थी। अधिकारियों के अनुसार पौधरोपण के लिए बजट और जमीन से संबंधित समस्याएं सामने आई थीं।
अधिकारियों ने अधिकरण को बताया कि अब बजट उपलब्ध कराया गया है और मौजूदा बारिश के मौसम में पौधरोपण पूरा करने की तैयारी की जा रही है। कुछ स्थानों पर पौधरोपण शुरू होने की जानकारी भी दी गई।
हालांकि, अधिकरण ने अब इस काम के लिए स्पष्ट समयसीमा तय कर दी है।
30 सितंबर तक पूरा करना होगा काम
NGT ने वन विभाग को निर्देश दिया है कि 30 सितंबर 2026 तक 7,000 पेड़ों का पौधरोपण पूरा किया जाए। इसके बाद विभाग को कार्रवाई रिपोर्ट और पौधरोपण की तस्वीरें भी जमा करनी होंगी।
इस निर्देश से यह भी साफ है कि पौधरोपण की सिर्फ कागजी कार्रवाई पर्याप्त नहीं होगी। अधिकरण ने लगाए गए पौधों के संरक्षण और उनके जीवित रहने पर भी जोर दिया है।
किन प्रजातियों के पौधे लगाने की बात?
सुनवाई से जुड़ी रिपोर्टों के अनुसार पौधरोपण में स्थानीय और उपयोगी प्रजातियों को शामिल करने की बात सामने आई है। इनमें कचनार, पीपल, इमली और बरगद जैसी प्रजातियों का उल्लेख किया गया है।
स्थानीय परिस्थितियों के अनुकूल पेड़ लगाए जाने से उनके लंबे समय तक जीवित रहने की संभावना बढ़ सकती है। यही वजह है कि क्षतिपूरक पौधरोपण में केवल संख्या ही नहीं, बल्कि पौधों की प्रजाति और उनके संरक्षण पर भी ध्यान दिया जा रहा है।
24.5 लाख रुपये की राशि का भी मुद्दा
सुनवाई के दौरान क्षतिपूरक पौधरोपण के लिए जमा कराई गई राशि का मुद्दा भी सामने आया। रिपोर्ट के अनुसार मध्य प्रदेश रोड डेवलपमेंट कॉरपोरेशन (MPRDC) की ओर से करीब 24.5 लाख रुपये क्षतिपूरक पौधरोपण के लिए जमा कराए गए थे।
NGT ने इससे पहले इस राशि के इस्तेमाल से जुड़ी जानकारी भी मांगी थी। अब अधिकरण की निगरानी में पौधरोपण की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जा रही है।
पर्यावरणविद् की याचिका पर चल रही सुनवाई
यह मामला पर्यावरणविद् नितिन सक्सेना की ओर से दायर याचिका से जुड़ा है। याचिका में स्टेडियम और सड़क निर्माण के लिए पेड़ों की कटाई तथा भोज वेटलैंड के कैचमेंट क्षेत्र में निर्माण को लेकर सवाल उठाए गए हैं।
याचिका में निर्माण से जुड़े विभिन्न अनुमोदनों और जमीन के इस्तेमाल को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं। इन सभी मुद्दों पर अधिकरण के समक्ष अलग-अलग पक्षों की दलीलें रखी गई हैं और मामले की सुनवाई जारी है।
स्टेडियम निर्माण को लेकर उठे कई सवाल
भोपाल के नाथू बरखेड़ा-नीलबड़ क्षेत्र में क्रिकेट स्टेडियम का निर्माण लंबे समय से चर्चा में है। इसके लिए सड़क और अन्य बुनियादी ढांचे से जुड़ा निर्माण भी किया जा रहा है।
पर्यावरण संबंधी याचिका में आरोप लगाया गया है कि निर्माण क्षेत्र भोज लेक के कैचमेंट से जुड़ा है। इसके अलावा जमीन के उपयोग और आवश्यक मंजूरियों को लेकर भी प्रश्न उठाए गए हैं। ये आरोप फिलहाल न्यायाधिकरण के समक्ष विचाराधीन मुद्दे हैं।
NGT ने सिर्फ पौधे लगाने पर नहीं दिया जोर
इस मामले में NGT का महत्वपूर्ण पहलू यह है कि अधिकरण ने सिर्फ 7,000 पेड़ लगाने का निर्देश नहीं दिया, बल्कि उनकी जीवित रहने की दर और संरक्षण पर भी जोर दिया है।
अधिकरण ने कहा कि यह वास्तविक क्षतिपूरक पौधरोपण होना चाहिए। यानी लगाए गए पौधे भविष्य में पेड़ों के रूप में विकसित हों, इसके लिए उनकी देखभाल और निगरानी भी जरूरी होगी।
अब विभाग के सामने बड़ी जिम्मेदारी
वन विभाग के सामने अब 30 सितंबर तक 7,000 पौधे लगाने के साथ-साथ उनकी निगरानी की जिम्मेदारी भी होगी। इसके लिए पौधरोपण स्थल, प्रजातियों का चयन, सिंचाई और संरक्षण जैसे पहलुओं पर काम करना होगा।
बारिश का मौजूदा मौसम पौधरोपण के लिए अनुकूल माना जा रहा है, इसलिए विभाग इसी अवधि में निर्धारित लक्ष्य पूरा करने की कोशिश कर रहा है।
पर्यावरण और विकास के बीच संतुलन का सवाल
भोपाल में स्टेडियम निर्माण से जुड़ा यह मामला विकास परियोजनाओं और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन के सवाल को भी सामने लाता है। बड़े निर्माण कार्यों के दौरान पेड़ों की कटाई और प्राकृतिक जल निकासी क्षेत्रों पर प्रभाव जैसे मुद्दे अक्सर पर्यावरणीय समीक्षा का हिस्सा बनते हैं।
इस मामले में NGT ने पेड़ों की कटाई के बाद क्षतिपूरक पौधरोपण को प्राथमिकता दी है। हालांकि, पौधरोपण के वास्तविक पर्यावरणीय लाभ का आकलन केवल पौधों की संख्या से नहीं, बल्कि उनके लंबे समय तक जीवित रहने और विकसित होने से किया जा सकेगा।
30 सितंबर के बाद सामने आएगी प्रगति रिपोर्ट
अब सबकी नजर इस बात पर रहेगी कि वन विभाग निर्धारित समयसीमा के भीतर 7,000 पौधे लगाने का लक्ष्य कितना पूरा करता है। पौधरोपण के बाद विभाग को तस्वीरों और कार्रवाई रिपोर्ट के माध्यम से NGT को जानकारी देनी होगी।
इस मामले में आगे की सुनवाई के दौरान पौधरोपण की स्थिति और लगाए गए पौधों के संरक्षण से जुड़ी जानकारी भी महत्वपूर्ण होगी।
फिलहाल NGT का निर्देश साफ है—भोपाल में स्टेडियम से जुड़ी सड़क के लिए काटे गए करीब 700 पेड़ों की भरपाई के तौर पर 7,000 पेड़ लगाए जाएं और यह काम 30 सितंबर 2026 तक पूरा किया जाए। अब चुनौती सिर्फ पौधे लगाने की नहीं, बल्कि उन्हें लंबे समय तक जीवित रखने की भी है।
