40 साल बाद फिर खुलेगा यूनियन कार्बाइड का राज, मिट्टी-भूजल में खोजे जाएंगे जहरीले रसायन; 87 एकड़ जमीन की होगी जांच

भोपाल, मध्य प्रदेश | 11 सितंबर 2026। दुनिया की सबसे भयावह औद्योगिक त्रासदियों में शामिल भोपाल गैस त्रासदी के करीब चार दशक बाद पूर्व यूनियन कार्बाइड फैक्ट्री परिसर की पर्यावरणीय स्थिति को लेकर एक बार फिर वैज्ञानिक जांच कराई जाएगी। जांच के दौरान परिसर की मिट्टी के साथ-साथ भूजल और वहां मौजूद तालाबों के पानी के नमूने लिए जाएंगे।

इस वैज्ञानिक परीक्षण का मकसद यह पता लगाना है कि इतने वर्षों के बाद भी परिसर और उसके आसपास किसी तरह के जहरीले रासायनिक तत्व या प्रदूषक मौजूद हैं या नहीं। जांच के नतीजों के आधार पर यह तय करने में मदद मिलेगी कि परिसर की करीब 87 एकड़ जमीन को भविष्य में स्मारक, अस्पताल या अन्य सार्वजनिक उपयोग के लिए सुरक्षित माना जा सकता है या नहीं।

चार दशक बाद फिर क्यों जरूरी हुई जांच?

भोपाल में दिसंबर 1984 में यूनियन कार्बाइड के कीटनाशक संयंत्र से जहरीली गैस का रिसाव हुआ था। इस हादसे ने हजारों लोगों की जान ली और बड़ी संख्या में लोगों के स्वास्थ्य को लंबे समय तक प्रभावित किया।

गैस त्रासदी के बाद भी फैक्ट्री परिसर में मौजूद औद्योगिक कचरे और उससे जुड़े पर्यावरणीय प्रदूषण को लेकर लंबे समय से चिंता बनी रही है। वैज्ञानिक अध्ययनों में फैक्ट्री परिसर और आसपास की जमीन तथा भूजल में विभिन्न प्रदूषकों की मौजूदगी के संकेत पहले भी सामने आए हैं।

अब इतने वर्षों बाद एक नई जांच के जरिए वर्तमान स्थिति का वैज्ञानिक मूल्यांकन किया जाएगा।

मिट्टी के साथ भूजल और तालाबों का भी होगा परीक्षण

नई जांच केवल जमीन की ऊपरी सतह तक सीमित नहीं रहेगी। जांच के दौरान मिट्टी, भूजल और परिसर में मौजूद तालाबों के पानी के नमूने लिए जाएंगे।

इन नमूनों को वैज्ञानिक परीक्षण के लिए भेजकर यह पता लगाने की कोशिश होगी कि इनमें किसी प्रकार के जहरीले रसायन, भारी धातु, कीटनाशक या अन्य प्रदूषक मौजूद हैं या नहीं।

जांच के जरिए यह भी समझने की कोशिश की जाएगी कि यदि किसी रासायनिक तत्व की मौजूदगी है, तो उसका स्तर कितना है और वह पर्यावरण के लिए कितना महत्वपूर्ण है।

87 एकड़ जमीन के भविष्य पर भी होगा असर

पूर्व यूनियन कार्बाइड परिसर की जमीन का कुल क्षेत्रफल करीब 87 एकड़ बताया गया है। सरकार की योजना इस जमीन को भविष्य में सार्वजनिक उपयोग में लाने की है।

मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने इसी वर्ष जनवरी में रासायनिक कचरा हटाए जाने के बाद परिसर की खाली जमीन पर गैस त्रासदी के पीड़ितों की स्मृति में स्मारक और अस्पताल बनाए जाने की घोषणा की थी।

लेकिन किसी भी बड़े सार्वजनिक निर्माण से पहले जमीन की पर्यावरणीय सुरक्षा का आकलन बेहद महत्वपूर्ण है। इसी वजह से अब नई वैज्ञानिक जांच कराई जा रही है।

करीब 2.65 करोड़ रुपये होंगे खर्च

सरकार ने इस पर्यावरणीय परीक्षण की जिम्मेदारी गुजरात की एक कंपनी को सौंपने की जानकारी दी है। कंपनी द्वारा परिसर के अलग-अलग हिस्सों से नमूने लिए जाएंगे और उनका वैज्ञानिक परीक्षण किया जाएगा।

पूरी जांच प्रक्रिया पर करीब 2.65 करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान है। जांच पूरी होने और रिपोर्ट सामने आने के बाद ही जमीन के भविष्य के उपयोग को लेकर आगे का निर्णय लिया जाएगा।

2010 में भी हुई थी जांच

यूनियन कार्बाइड परिसर और उसके आसपास प्रदूषण को लेकर इससे पहले भी वैज्ञानिक अध्ययन किए जा चुके हैं।

साल 2010 में राष्ट्रीय पर्यावरणीय इंजीनियरिंग अनुसंधान संस्थान और अन्य वैज्ञानिक संस्थानों से जुड़ी जांच में परिसर की मिट्टी तथा आसपास के भूजल का परीक्षण किया गया था। उस समय कुछ नमूनों में पारा और कुछ कीटनाशकों की निर्धारित सीमा से अधिक मौजूदगी की बात सामने आई थी।

केंद्र सरकार द्वारा 2010 में संसद में दी गई जानकारी में भी भोपाल गैस हादसा स्थल के आसपास मिट्टी और भूजल में भारी धातुओं, कीटनाशकों तथा कुछ वाष्पशील कार्बनिक यौगिकों की मौजूदगी की पुष्टि का उल्लेख किया गया था।

पुरानी जांच के बाद अब क्या बदला?

नई जांच इसलिए भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि पिछले वर्षों में परिसर से संबंधित कचरा हटाने और उसके निपटान की प्रक्रिया आगे बढ़ी है।

अब वैज्ञानिक परीक्षण के जरिए यह पता लगाने की कोशिश होगी कि मौजूदा समय में परिसर की पर्यावरणीय स्थिति क्या है। पुरानी रिपोर्टों और नई जांच के परिणामों की तुलना से प्रदूषण की स्थिति में हुए बदलाव को समझने में भी मदद मिल सकती है।

आसपास के भूजल पर भी रही है चिंता

यूनियन कार्बाइड परिसर के आसपास के भूजल को लेकर भी पहले विभिन्न अध्ययन और परीक्षण होते रहे हैं।

2022 में किए गए एक संयुक्त परीक्षण में आसपास के कई बोरवेल और परिसर के भीतर के जल स्रोतों के नमूने लिए गए थे। उस अध्ययन में कुछ स्थानों के पानी में मैंगनीज और निकेल जैसे भारी धातुओं के स्तर स्वीकार्य सीमा से अधिक पाए जाने का उल्लेख किया गया था, जबकि उस परीक्षण में कीटनाशक नहीं पाए गए थे।

इस पृष्ठभूमि में नई जांच से मौजूदा स्थिति की अधिक व्यापक तस्वीर सामने आने की उम्मीद है।

जांच रिपोर्ट के बाद तय होगा जमीन का उपयोग

सरकार के सामने सबसे बड़ा सवाल यह है कि पूर्व यूनियन कार्बाइड परिसर की जमीन को किस तरह उपयोग में लाया जाए।

यदि वैज्ञानिक परीक्षण में जमीन और पानी सुरक्षित पाए जाते हैं, तो प्रस्तावित स्मारक, अस्पताल या अन्य सार्वजनिक सुविधाओं की दिशा में आगे बढ़ना आसान होगा। वहीं यदि किसी हिस्से में प्रदूषण या रासायनिक अवशेष पाए जाते हैं, तो उस क्षेत्र के लिए अतिरिक्त उपचार या सुरक्षा उपायों की जरूरत पड़ सकती है।

इसलिए नई वैज्ञानिक जांच केवल पर्यावरणीय परीक्षण नहीं, बल्कि परिसर के भविष्य के उपयोग से जुड़ा महत्वपूर्ण आधार भी होगी।

जांच को लेकर उठे सवाल

नई जांच के लिए एजेंसी के चयन को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं। एक संगठन से जुड़ी कार्यकर्ता रचना ढींगरा ने एजेंसी के चयन पर आपत्ति जताते हुए कहा है कि अदालत के निर्देशों के अनुसार ग्लोबल टेंडर की आवश्यकता थी।

हालांकि सरकार की ओर से जांच की जिम्मेदारी गुजरात की कंपनी को सौंपे जाने की बात सामने आई है। अब इस प्रक्रिया और वैज्ञानिक जांच के परिणामों पर भी नजर रहेगी।

चार दशक बाद फिर वैज्ञानिक नजर से देखी जाएगी जमीन

भोपाल गैस त्रासदी की यादें आज भी शहर और प्रभावित परिवारों के लिए बेहद संवेदनशील विषय हैं। हादसे के दशकों बाद भी यूनियन कार्बाइड परिसर से जुड़ा पर्यावरणीय सवाल पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है।

अब नई वैज्ञानिक जांच के जरिए यह पता लगाने की कोशिश होगी कि आज की तारीख में परिसर की मिट्टी, भूजल और पानी की वास्तविक स्थिति क्या है।

जांच रिपोर्ट आने के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि 87 एकड़ की यह जमीन भविष्य में स्मारक, अस्पताल और अन्य सार्वजनिक सुविधाओं के लिए कितनी सुरक्षित है और किन क्षेत्रों में अतिरिक्त पर्यावरणीय उपचार की जरूरत हो सकती है।

इस तरह करीब चार दशक बाद होने वाली यह वैज्ञानिक जांच भोपाल के औद्योगिक अतीत और उसके पर्यावरणीय प्रभावों को समझने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है।

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