पिछले क़रीब तीन सालों से मणिपुर का ज़िक्र लगातार अशांति, जातीय तनाव और हिंसा के चक्र के साथ जुड़ा रहा है. इन सबके बीच हम मैतेई और कुकी समुदायों की चर्चा लगातार सुनते रहे हैं.
लेकिन इन्हीं चर्चाओं के बीच एक ऐसा समुदाय भी है जिसकी आवाज़ बहुत कम सुनाई देती है.
इस समुदाय का नाम है मैतेई पांगल- यानी मणिपुर के वे मुसलमान जो 17वीं सदी में यहाँ आए और फिर यहीं के हो कर रह गए.
साल 2023 में जब मणिपुर में मैतेई और कुकी समुदायों के बीच जातीय हिंसा शुरू हुई, उस वक़्त इस मैतेई पांगल समुदाय ने ख़ुद को इस संघर्ष के बीच खड़ा पाया.
मई 2023 में शुरू हुई हिंसा में कम से कम 260 लोगों की मौत हुई और क़रीब 60 हज़ार लोग बेघर हुए हैं.
हिंसा की जड़ में मैतेई समुदाय की उस माँग को माना गया जिसमें वे आधिकारिक ‘जनजातीय’ दर्जा चाहते थे. ऐसा दर्जा जो उन्हें सरकारी लाभ और आरक्षण का अधिकार देता, जैसा कि कुकी जैसे अन्य जनजातीय समुदायों को मिलता है.
एक बड़ी मुसलमान आबादी वाला इलाक़ा, क्वाक्ता साल 2023 में शुरू हुई हिंसा के निशाने पर आ गया. यह इलाक़ा बिशेनपुर ज़िले में है
क्वाक्ता मणिपुर की राजधानी इम्फ़ाल से क़रीब 50 किलोमीटर दूर है. यहाँ से कुकी बहुल चुराचांदपुर इलाक़ा महज़ 13 किलोमीटर दूर है.
साल 2023 में शुरू हुई हिंसा के निशान क्वाक्ता में आज भी मौजूद हैं.
वहाँ के रहने वाले मोहम्मद ज़िआउद्दीन के ज़हन में उसकी यादें अभी भी ताज़ा हैं.
उनके मुताबिक़, “पाँच अगस्त 2023 को बाहर से कुछ कुकी लोगों ने आकर क्वाक्ता के वार्ड नंबर-8 में तीन मैतेई लोगों को मारा था. उसके अगले दिन 6 अगस्त को मणिपुर की पब्लिक और सिविल सोसाइटी आर्गेनाईजेशन के लोगों ने हमारी मस्जिद में आकर यहीं से फ़ायरिंग शुरू की थी, कुकी इलाक़ों की तरफ़. और कुकी लोगों ने भी इस तरफ़ फायरिंग शुरू की थी.”
क्वाक्ता की मस्जिद की दीवारों पर गोलियों के निशान और टिन की छत पर सुराख़ साफ दिखते हैं.
मोहम्मद ज़िआउद्दीन कहते हैं कि ये सुराख़ उन गोलियों से बने हैं, जो पहाड़ी इलाक़ों से कुकी समुदाय के लोगों ने चलाईं और इस मस्जिद से मैतेई समुदाय के लोगों ने.
उनका कहना है कि ये गोलीबारी लगातार पाँच-छह दिन चली.
कभी मिश्रित आबादी वाले मुहल्ले, जहाँ मुसलमान, कुकी और मैतेई साथ रहते थे, अब ज़्यादातर खाली पड़े हैं.
हिंसा के बाद कुकी और मैतेई दोनों समुदायों के परिवार सुरक्षित जगहों पर चले गए हैं.
आज यहाँ क्वाक्ता में सिर्फ़ मुसलमान परिवार ही बचे हैं.

