जबलपुर, मध्य प्रदेश | 1अक्टूबर 2026
मध्य प्रदेश में करीब तीन दशक पुराने 300 रुपये की कथित रिश्वत के मामले में तत्कालीन पटवारी मुन्ना लाल को हाई कोर्ट से राहत मिली है। जबलपुर स्थित मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की एकलपीठ ने राज्य सरकार की अपील खारिज करते हुए निचली अदालत के दोषमुक्ति के फैसले को बरकरार रखा। मामले में अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष कथित रिश्वत की मांग और अवैध रूप से रकम स्वीकार किए जाने को पर्याप्त और विश्वसनीय साक्ष्यों से साबित नहीं कर सका।
1996 में सामने आया था मामला
यह मामला वर्ष 1996 का है। अभियोजन के अनुसार सागर जिले के खुरई क्षेत्र में तत्कालीन पटवारी मुन्ना लाल के पास एक व्यक्ति अपनी डुप्लीकेट भू-अधिकार एवं ऋण पुस्तिका बनवाने के लिए पहुंचा था।
आरोप था कि दस्तावेज जारी करने के बदले पटवारी ने 300 रुपये की रिश्वत मांगी थी। शिकायत के आधार पर लोकायुक्त पुलिस ने कार्रवाई की और 17 अक्टूबर 1996 को पटवारी को 300 रुपये की रकम के साथ पकड़े जाने की बात सामने आई।
1997 में जिला अदालत ने किया था दोषमुक्त
मामले की सुनवाई जिला न्यायालय में हुई। दिसंबर 1997 में अदालत ने मुन्ना लाल को दोषमुक्त कर दिया था।
इसके बाद मध्य प्रदेश सरकार ने इस फैसले को चुनौती देते हुए 1998 में जबलपुर हाई कोर्ट में अपील दायर की। करीब तीन दशक तक यह कानूनी प्रक्रिया चलती रही और अब हाई कोर्ट ने सरकार की अपील पर फैसला सुनाया है।
हाई कोर्ट ने साक्ष्यों पर जताई आपत्ति
मामले की सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति संजय एस. कलगांवकर की एकलपीठ ने अभियोजन के साक्ष्यों की जांच की। अदालत के सामने यह बात आई कि कथित रिश्वत मांग से संबंधित मूल रिकॉर्डिंग को ट्रायल कोर्ट में विधिवत सत्यापित नहीं किया गया था।
इसके अलावा आरोपी की आवाज की पहचान भी नहीं कराई गई थी। रिकॉर्डिंग की पूर्णता और उसकी विश्वसनीयता को साबित करने के लिए भी पर्याप्त साक्ष्य पेश नहीं किए गए। ऐसे में अदालत ने रिकॉर्डिंग के ट्रांसक्रिप्ट को रिश्वत की मांग का विश्वसनीय प्रमाण मानने से इनकार किया।
शिकायतकर्ता पर पहले से थी सरकारी बकाया राशि
सुनवाई के दौरान एक और महत्वपूर्ण तथ्य सामने आया। राजस्व रिकॉर्ड के अनुसार शिकायतकर्ता वीर सिंह पर 325 रुपये और ब्याज की सरकारी बकाया राशि थी।
अदालत ने गवाहों और दस्तावेजों को देखते हुए यह संभावना भी मानी कि बरामद किए गए 300 रुपये सरकारी बकाया की अदायगी से संबंधित हो सकते थे। इससे अभियोजन की उस दलील पर भी सवाल खड़े हुए कि रकम अवैध रिश्वत के रूप में ली गई थी।
शिकायतकर्ता के बयानों में भी अंतर
अदालत ने शिकायतकर्ता के बयानों में असंगतियां भी दर्ज कीं। अलग-अलग मौकों पर कथित रिश्वत की मांग को लेकर 450 और 500 रुपये की रकम का उल्लेख सामने आया।
इसके अलावा रिश्वत की कथित मांग के समय वहां कौन-कौन लोग मौजूद थे, इस संबंध में भी अलग-अलग बयान दिए गए। अदालत ने इन परिस्थितियों को मामले के साक्ष्यों के मूल्यांकन में महत्वपूर्ण माना।
सिर्फ रकम की बरामदगी से अपराध साबित नहीं
हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल कथित रिश्वत की रकम बरामद होना और फिनालफ्थेलीन परीक्षण में परिणाम आना अपने आप में रिश्वत मांगने और अवैध रूप से रकम स्वीकार करने के अपराध को साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं है।
अदालत ने माना कि निचली अदालत का दोषमुक्ति संबंधी निष्कर्ष उपलब्ध साक्ष्यों पर आधारित था और उसमें हस्तक्षेप करने का पर्याप्त आधार नहीं है। इसके साथ ही हाई कोर्ट ने राज्य सरकार की अपील खारिज कर दी।
तीन दशक बाद खत्म हुआ कानूनी विवाद
वर्ष 1996 में शुरू हुआ यह मामला 1997 में जिला अदालत के फैसले के बाद हाई कोर्ट तक पहुंचा था। सरकार ने 1998 में अपील दायर की थी और लगभग 28 वर्षों बाद हाई कोर्ट ने इस अपील का निराकरण करते हुए तत्कालीन पटवारी की दोषमुक्ति बरकरार रखी।
इस फैसले के साथ 300 रुपये की कथित रिश्वत से जुड़ा यह लंबा कानूनी विवाद समाप्त हो गया।
