सलाम! 20 बच्चों की जान बचाने के लिए ‘ढाल’ बनी मां; खुद पर झेले मधुमक्खियों के सैकड़ों डंक,

नीमच | 7 फरवरी 2026

मध्य प्रदेश के नीमच जिले के रानपुर गांव में एक साधारण सी महिला कंचन बाई ने असाधारण बहादुरी दिखाई। एक तरफ मौत बनकर मंडराती मधुमक्खियां थीं और दूसरी तरफ 20 मासूम बच्चे। कंचन बाई ने बच्चों को बचाने के लिए खुद को मधुमक्खियों के हवाले कर दिया।

1. क्या थी पूरी घटना?

रानपुर गांव में कुछ बच्चे घर के बाहर खेल रहे थे, तभी अचानक पास के पेड़ से मधुमक्खियों के झुंड ने बच्चों पर हमला कर दिया।

  • बहादुरी की मिसाल: बच्चों की चीखें सुनकर कंचन बाई वहां पहुंचीं। उन्होंने भागने के बजाय बच्चों को अपने आंचल और कपड़ों से ढंक लिया।
  • खुद बनीं ढाल: मधुमक्खियां बच्चों के बजाय कंचन बाई पर टूट पड़ीं। उन्होंने सैकड़ों डंक झेले, लेकिन एक भी बच्चे को वहां से हटने नहीं दिया जब तक कि वे सुरक्षित स्थान पर नहीं पहुंच गए।

2. इलाज के दौरान दुखद निधन

गंभीर रूप से घायल कंचन बाई को तुरंत जिला अस्पताल और फिर इंदौर रेफर किया गया। शरीर में जहर फैलने के कारण उन्होंने दम तोड़ दिया। उनकी इस शहादत ने न केवल उनके परिवार, बल्कि पूरे गांव के बच्चों को जीवनदान दिया है।

3. मुख्यमंत्री का बड़ा ऐलान

कंचन बाई की वीरता की खबर जब मुख्यमंत्री तक पहुंची, तो उन्होंने गहरा शोक व्यक्त करते हुए परिवार के लिए बड़ी घोषणाएं कीं:

  • बच्चों की पढ़ाई का खर्च: सरकार कंचन बाई के बच्चों की स्नातक (Graduation) तक की पढ़ाई का पूरा खर्च उठाएगी।
  • आर्थिक सहायता: परिवार को ₹5 लाख की तात्कालिक सहायता राशि मंजूर की गई है।
  • सम्मान: मुख्यमंत्री ने कंचन बाई को मरणोपरांत राज्य स्तरीय वीरता पुरस्कार देने का भी संकेत दिया है।

4. गांव में ‘देवी’ की तरह सम्मान

रानपुर गांव के लोग कंचन बाई को किसी फरिश्ते से कम नहीं मान रहे हैं। जिन 20 बच्चों की जान बची है, उनके माता-पिता का कहना है कि “कंचन बाई ने अपने बच्चों की तरह हमारे बच्चों को बचाया, उनका यह अहसान हम कभी नहीं भूल पाएंगे।”


निष्कर्ष: कंचन बाई की कहानी हमें याद दिलाती है कि एक मां की ममता और साहस की कोई सीमा नहीं होती। उन्होंने साबित कर दिया कि दूसरों की जान बचाने के लिए खुद को न्योछावर करना ही सबसे बड़ी वीरता है