जयपुर, राजस्थान | 24 अक्टूबर 2026
दीपावली पर घरों को रोशन करने वाले दीये अगर पर्यावरण संरक्षण और महिला सशक्तिकरण का माध्यम भी बन जाएं, तो त्योहार की खुशियां और बढ़ जाती हैं। राजस्थान की राजधानी जयपुर में ऐसी ही एक अनूठी पहल देखने को मिल रही है। यहां श्री पिंजरापोल गौशाला में देसी गाय के गोबर से विशेष दीपक तैयार किए जा रहे हैं। इनकी खासियत यह है कि कुछ दीपकों में तुलसी, अश्वगंधा और किनोवा जैसे पौधों के बीज भी डाले जा रहे हैं। दावा है कि दीपक जलाने के बाद बचे अवशेष को सही परिस्थितियों में मिट्टी या गमले में रखने पर बीज अंकुरित हो सकते हैं।
गौशाला में अब तक लगभग 10 लाख गोमय दीपक तैयार किए जा चुके हैं, जबकि इस वर्ष 25 लाख दीपक बनाने का लक्ष्य रखा गया है। बढ़ती मांग को देखते हुए महिलाएं रोजाना करीब 10 से 12 हजार दीपक तैयार कर रही हैं। इस पहल के जरिए गौशाला के गोबर का उपयोगी उत्पादों में इस्तेमाल करने के साथ महिलाओं को रोजगार देने की कोशिश भी की जा रही है।
तुलसी और अश्वगंधा के बीज बनाते हैं इन दीयों को खास
आमतौर पर मिट्टी या दूसरे पदार्थों से बने दीये दीपावली के बाद इस्तेमाल के योग्य नहीं रहते और उनके अवशेष घरों से बाहर कर दिए जाते हैं। जयपुर की गौशाला में तैयार किए जा रहे बीज वाले दीपकों में इस परंपरा को एक नए प्रयोग से जोड़ने की कोशिश की गई है।
गौशाला प्रबंधन के अनुसार, कुछ दीपकों में तुलसी, अश्वगंधा और किनोवा के बीज मिलाए जाते हैं। दीपक जलने के बाद बचे अवशेष को मिट्टी में डालकर उसमें पौधा उगाने का प्रयास किया जा सकता है।
हालांकि, बीजों का अंकुरण निश्चित नहीं है। यह इस बात पर निर्भर करेगा कि जलने के बाद बीज कितने सुरक्षित बचे हैं और उन्हें मिट्टी, पानी तथा अनुकूल तापमान जैसी परिस्थितियां मिलती हैं या नहीं। इसलिए प्रत्येक दीपक से पौधा उगने की गारंटी नहीं दी जा सकती।
देसी गाय के गोबर से कैसे बनाए जा रहे हैं दीपक?
इन विशेष दीपकों को बनाने के लिए देसी गाय के गोबर के पाउडर के साथ काली मिट्टी, ग्वार गम, जटामांसी और बाइंडिंग के लिए मैदा इस्तेमाल किया जाता है। तैयार सामग्री को सांचों में डालकर दीपक का आकार दिया जाता है।
कुछ दीपकों में बीज भी मिलाए जाते हैं, जिससे इस्तेमाल के बाद उनके अवशेष को दोबारा उपयोग में लाने की संभावना बनती है। गौशाला में महिलाएं सामग्री तैयार करने से लेकर दीपक बनाने और पैकेजिंग तक के काम में शामिल हैं।
गौशाला प्रबंधन के अनुसार, इन दीपकों की कीमत लगभग 3 से 10 रुपये प्रति दीपक रखी गई है। कम कीमत के कारण इन्हें आम लोगों तक पहुंचाने और बड़ी संख्या में उत्पादन करने पर जोर दिया जा रहा है।
महिलाएं रोज बना रहीं 10 से 12 हजार दीपक
इस पहल का एक महत्वपूर्ण पहलू स्थानीय महिलाओं को रोजगार उपलब्ध कराना है। श्री पिंजरापोल गौशाला में महिलाएं समूहों में काम करती हैं। कोई सामग्री तैयार करती है, तो कोई सांचों की मदद से दीपकों को आकार देती है।
रिपोर्ट के अनुसार, एक महिला रोजाना लगभग 800 से 1,000 दीपक बना सकती है। इसी के आधार पर गौशाला में प्रतिदिन करीब 10 से 12 हजार दीपक तैयार किए जा रहे हैं।
इसके अलावा, कुछ स्वयंसेवी संस्थाओं से जुड़ी महिलाओं को भी इस काम से जोड़ने की कोशिश की गई है। उन्हें दीपक बनाने के सांचे उपलब्ध कराए जाते हैं, ताकि वे प्रशिक्षण लेकर अपने स्तर पर उत्पादन कर सकें।
इस मॉडल का उद्देश्य महिलाओं को केवल काम उपलब्ध कराना नहीं, बल्कि उन्हें छोटे स्तर पर स्वरोजगार शुरू करने का अवसर देना भी है।
25 लाख दीपक बनाने का लक्ष्य, कई राज्यों से मिल रहे ऑर्डर
गौशाला प्रबंधन के मुताबिक, इस वर्ष 25 लाख दीपक बनाने का लक्ष्य रखा गया है। अब तक करीब 10 लाख दीपक तैयार किए जा चुके हैं और रिपोर्ट के अनुसार, तैयार स्टॉक बिक भी चुका है।
इन दीपकों की मांग उत्तर प्रदेश, गुजरात और महाराष्ट्र समेत देश के विभिन्न राज्यों से आने की जानकारी दी गई है। इनकी एक खेप मॉरीशस भी भेजी गई है। पिछले वर्ष अयोध्या के राम मंदिर के लिए करीब पांच लाख दीपक भेजे जाने का उल्लेख भी रिपोर्ट में किया गया है।
हालांकि, 25 लाख दीपकों का लक्ष्य उत्पादन और आगे मिलने वाले ऑर्डर पर निर्भर करेगा।
गोशालाओं की आय बढ़ाने की भी कोशिश
गोमय दीपक बनाने की पहल का उद्देश्य गौशालाओं में उपलब्ध गोबर का उपयोग करके अतिरिक्त आमदनी के रास्ते तैयार करना भी है। गोबर को पारंपरिक इस्तेमाल तक सीमित रखने के बजाय उससे बाजार में बिकने वाले उत्पाद तैयार किए जा रहे हैं।
अखिल भारतीय गौशाला सहयोग परिषद से जुड़े पदाधिकारियों के अनुसार, उनके नेटवर्क में लगभग 4,000 गौशालाएं जुड़ी हैं। इस नेटवर्क के माध्यम से गोबर आधारित उत्पादों के निर्माण, प्रशिक्षण और बिक्री को बढ़ावा देने की योजना है।
दीपकों के अलावा गोबर से जैविक खाद, धूपबत्ती और गमले जैसे उत्पाद तैयार करने की संभावनाएं भी हैं। अगर इन उत्पादों की गुणवत्ता और बाजार में मांग बनी रहती है, तो गौशालाओं को आय का अतिरिक्त स्रोत मिल सकता है।
पर्यावरण-अनुकूल दीपावली की दिशा में पहल
गोबर से बने दीपकों का प्रयोग पारंपरिक त्योहार को स्थानीय संसाधनों और छोटे उद्यमों से जोड़ने का एक उदाहरण है। इसके जरिए महिलाओं को काम मिलने, गौशालाओं की आय बढ़ाने और कुछ उत्पादों के अवशेष को दोबारा उपयोग में लाने की कोशिश की जा रही है।
हालांकि, किसी उत्पाद को पूरी तरह पर्यावरण-अनुकूल कहने के लिए उसके निर्माण में इस्तेमाल होने वाली सामग्री, उत्पादन प्रक्रिया, परिवहन और इस्तेमाल के बाद होने वाले प्रभावों पर भी ध्यान देना आवश्यक है। इसी तरह, बीज वाले दीपकों से पौधे उगने की संभावना उनके जलने के बाद बीजों की स्थिति पर निर्भर करेगी।
फिर भी, जयपुर की श्री पिंजरापोल गौशाला की यह पहल त्योहारों से जुड़े उत्पादों में नए प्रयोग, महिला रोजगार और गोबर आधारित कुटीर उद्योगों की संभावनाओं को सामने लाती है।
