‘भक्ति में जाति नहीं, भाव प्रधान है’; भक्त के ‘नीच कुल’ वाले सवाल पर दिया दिल जीतने वाला जवाब

वृंदावन | 7 फरवरी 2026

सत्संग के दौरान एक भक्त भावुक हो गया और उसने महाराज जी से पूछा कि, “मैं बहुत छोटी जाति से हूँ, क्या भगवान मुझे स्वीकार करेंगे? क्या नीच कुल में जन्म लेने वाला व्यक्ति भी प्रभु की प्राप्ति कर सकता है?” इस प्रश्न पर महाराज जी ने बड़े ही प्रेम और अधिकार के साथ शास्त्र सम्मत उत्तर दिया।

1. “भगवान जाति नहीं, प्रेम देखते हैं”

महाराज जी ने कहा कि भगवान के दरबार में जाति, वर्ण या कुल का कोई महत्व नहीं है। उन्होंने उदाहरण देते हुए समझाया:

  • शबरी और केवट: भगवान राम ने शबरी के जूठे बेर खाए और केवट को गले लगाया। उन्होंने कभी उनकी जाति नहीं पूछी।
  • विदुर जी: भगवान कृष्ण ने दुर्योधन के छप्पन भोग छोड़कर दासी पुत्र विदुर के घर जाकर बथुए का साग खाया था।

2. ‘शरीर की जाति होती है, आत्मा की नहीं’

महाराज जी ने भक्त को समझाते हुए कहा:

“यह शरीर मिट्टी का है, इसकी जाति हो सकती है। लेकिन तुम्हारे भीतर जो आत्मा है, वह परमात्मा का अंश है। क्या ईश्वर की कोई जाति होती है? नहीं। तो फिर उनके अंश की जाति कैसे हो सकती है?”

3. भक्ति का असली पैमाना क्या है?

प्रेमानंद जी ने स्पष्ट किया कि भक्ति के मार्ग पर चलने के लिए केवल शुद्ध आचरण और प्रभु के प्रति अनन्य प्रेम की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि:

  • जो भगवान का नाम लेता है, वह सबसे ऊंचा है।
  • सबसे ‘नीच’ वह व्यक्ति है जो दुराचारी है, भले ही उसने किसी भी ऊंचे कुल में जन्म क्यों न लिया हो।

4. “अपने आप को छोटा मत समझो”

महाराज जी ने भक्त का उत्साह बढ़ाते हुए कहा कि तुम ‘छोटी जाति’ के कहकर प्रभु का अपमान मत करो। तुम प्रभु के लाडले हो। बस नाम जप करो और सन्मार्ग पर चलो, भगवान स्वयं तुम्हें गले लगाएंगे।