24 मार्च 2026
भारत की नदियों में पाई जाने वाली प्रवासी (माइग्रेटरी) मीठे पानी की मछलियां गंभीर खतरे का सामना कर रही हैं। एक नई वैश्विक रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि ये मछलियां दुनिया के सबसे अधिक संकटग्रस्त कशेरुकी जीवों में शामिल हो चुकी हैं।
क्या कहती है रिपोर्ट
यह आकलन Convention on the Conservation of Migratory Species of Wild Animals (CMS) के तहत तैयार किया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक, दुनियाभर में 349 प्रवासी मीठे पानी की मछलियां ऐसी हैं जिन्हें संरक्षण की जरूरत है, लेकिन इनमें से केवल 24 को ही अभी कानूनी सुरक्षा मिली है।
यानी 325 प्रजातियां अब भी बिना संरक्षण के हैं, जिनमें से करीब 205 एशिया में पाई जाती हैं।
क्यों बढ़ रहा है खतरा
रिपोर्ट में मछलियों के घटते अस्तित्व के पीछे कई बड़े कारण बताए गए हैं:
- नदियों की कनेक्टिविटी (जुड़ाव) का टूटना
- बांध और बैराज के कारण जल प्रवाह में बदलाव
- आवास (हैबिटेट) का नष्ट होना
- प्रदूषण और अत्यधिक शिकार
- अलग-अलग देशों में फैले दबाव
विशेषज्ञों के अनुसार, ये मछलियां सैकड़ों से हजारों किलोमीटर तक यात्रा करती हैं, लेकिन रास्ते में आने वाली बाधाएं इनके जीवन चक्र को तोड़ देती हैं।
गंगा-ब्रह्मपुत्र-मेघना प्रणाली पर खास चिंता
रिपोर्ट में गंगा-ब्रह्मपुत्र-मेघना नदी तंत्र को सबसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में शामिल किया गया है। यहां बड़ी संख्या में प्रवासी मछलियां पाई जाती हैं, लेकिन बांध, हाइड्रोपावर परियोजनाएं और जल प्रवाह में बदलाव इनके लिए बड़ा खतरा बन रहे हैं।
यह क्षेत्र हिमालय से लेकर बंगाल की खाड़ी तक फैला हुआ है और कई महत्वपूर्ण प्रजातियों का घर है।
किन मछलियों पर सबसे ज्यादा असर
रिपोर्ट में जिन प्रमुख प्रजातियों को खतरे में बताया गया है, उनमें शामिल हैं:
- हिल्सा (आर्थिक और सांस्कृतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण)
- गोल्डन महसीर
- इंडियन मॉटल्ड ईल
- गूंच (कैटफिश)
विशेषज्ञों का कहना है कि इन सभी मछलियों के लिए नदी का लगातार बहाव और खुला मार्ग बेहद जरूरी है।
बांध और बैराज बन रहे बड़ी बाधा
रिपोर्ट में साफ कहा गया है कि:
- बांध और बैराज मछलियों के रास्ते रोक देते हैं
- जल प्रवाह और तलछट (सिल्ट) में बदलाव होता है
- बाढ़ के मैदानों तक पहुंच कम हो जाती है
- मछलियों के प्रजनन चक्र पर असर पड़ता है
विशेष रूप से गंगा पर बना फरक्का बैराज इसका उदाहरण है, जहां फिश पास होने के बावजूद वह सही से काम नहीं कर रहा।
पर्यावरणीय फ्लो की कमी
विशेषज्ञों के मुताबिक भारत में “एनवायरमेंटल फ्लो” (नदी में आवश्यक प्राकृतिक जल प्रवाह) की स्थिति बहुत कमजोर है।
- पानी छोड़ा भी जाता है तो वह मछलियों के अनुकूल नहीं होता
- नदी का प्राकृतिक बहाव, पोषक तत्व और जीवों की आवाजाही प्रभावित होती है
नीतिगत कमी भी बड़ी समस्या
रिपोर्ट के अनुसार:
- जल प्रबंधन में जैव विविधता को प्राथमिकता नहीं मिलती
- हाइड्रोपावर और पानी की जरूरतें आगे रहती हैं
- मछलियां नीतियों और योजनाओं में नजरअंदाज हो जाती हैं
इसके अलावा, सीमापार (ट्रांसबाउंड्री) नदियों पर देशों के बीच समन्वय की भी कमी है।
आजीविका पर भी असर
विशेषज्ञों का कहना है कि नदियों में बदलाव का असर केवल मछलियों तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे हजारों मछुआरों की आजीविका भी प्रभावित होती है।
उदाहरण के तौर पर, नर्मदा नदी पर बने सरदार सरोवर प्रोजेक्ट के कारण हजारों मछुआरों को नुकसान हुआ, लेकिन इसका पूरा आकलन नहीं किया गया।
क्या हैं समाधान
रिपोर्ट और विशेषज्ञों ने कुछ अहम सुझाव दिए हैं:
- हर परियोजना से पहले पर्यावरण और सामाजिक प्रभाव का आकलन
- फिश पास और फिश लैडर जैसी संरचनाएं बनाना
- नदियों में सही तरीके से पर्यावरणीय फ्लो बनाए रखना
- देशों के बीच बेहतर समन्वय
- मछलियों की निगरानी और डेटा संग्रह बढ़ाना
निष्कर्ष
प्रवासी मीठे पानी की मछलियां न केवल पारिस्थितिकी के लिए जरूरी हैं, बल्कि लाखों लोगों की आजीविका से भी जुड़ी हैं। बढ़ते बांध, प्रदूषण और कमजोर नीतियों के बीच इनका अस्तित्व खतरे में है।
ऐसे में जरूरी है कि विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाते हुए नदियों और उनमें रहने वाले जीवों की सुरक्षा को प्राथमिकता दी जाए।
