भोपाल, 24 अक्टूबर 2026। मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल की छोटी झील यानी लोअर लेक में बिना उपचारित सीवेज पहुंचने के मामले में नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) ने संबंधित विभागों से जवाब मांगा है। ट्रिब्यूनल ने भोपाल नगर निगम (BMC) और लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग (PHED) को चार सप्ताह के भीतर रिपोर्ट प्रस्तुत करने के निर्देश दिए हैं। रिपोर्ट में झील में गंदा पानी पहुंचने से रोकने के लिए उठाए गए कदमों और सीवेज प्रबंधन की मौजूदा स्थिति की जानकारी देनी होगी।
रोजाना झील में पहुंच रहा है अनुपचारित सीवेज
लोअर लेक में गंदे पानी की आवक लंबे समय से पर्यावरण संरक्षण से जुड़ी चिंता बनी हुई है। उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक, झील में दो नालों के माध्यम से प्रतिदिन लगभग 8 मिलियन लीटर अनुपचारित सीवेज पहुंच रहा है। इनमें बंगंगा नाला और पुराने मछलीघर के पास का नाला शामिल हैं।
सीवेज का सीधे झील में मिलना पानी की गुणवत्ता, जलीय पारिस्थितिकी और आसपास के पर्यावरण को प्रभावित कर सकता है। इसी समस्या को रोकने और झील में प्रदूषित पानी की आवक बंद करने के लिए कार्रवाई की मांग की जा रही है।
NGT ने नगर निगम से मांगा सीवेज रोकने का ब्योरा
ट्रिब्यूनल ने नगर निगम और PHED को यह स्पष्ट करने के लिए कहा है कि झील में गंदा पानी पहुंचने से रोकने के लिए अब तक क्या कार्रवाई की गई है। अधिकारियों को सीवेज की निकासी, नालों के डायवर्जन और संबंधित व्यवस्थाओं की प्रगति की जानकारी रिपोर्ट में देनी होगी।
नगर निगम ने अमृत 2.0 योजना के तहत नालों के इंटरसेप्शन और डायवर्जन का काम जारी होने की जानकारी दी है। इस व्यवस्था का उद्देश्य गंदे पानी को सीधे झील में जाने से रोककर उसे उपचार के लिए सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट तक पहुंचाना है।
10 MLD क्षमता का सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट भी प्रस्तावित
झील में पहुंच रहे सीवेज के उपचार के लिए 10 MLD क्षमता के सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (STP) का काम शुरू किया गया है। उपलब्ध रिपोर्ट के अनुसार, इस प्लांट का निर्माण सितंबर 2026 में शुरू हुआ और इसे 31 दिसंबर 2027 तक पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है।
हालांकि, प्लांट के पूरा होने तक झील में अनुपचारित सीवेज की आवक रोकना एक महत्वपूर्ण चुनौती बनी हुई है। इसी वजह से नालों के डायवर्जन और प्रदूषण नियंत्रण के लिए तत्काल कदम उठाने की जरूरत पर जोर दिया जा रहा है।
₹2.10 करोड़ पर्यावरणीय क्षतिपूर्ति का आकलन
इस मामले में मध्य प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (MPPCB) ने भोपाल नगर निगम पर पर्यावरणीय क्षति के लिए लगभग ₹2.10 करोड़ की क्षतिपूर्ति का आकलन किया है। यह राशि संबंधित रिपोर्ट और निर्धारित अवधि के आधार पर निकाली गई थी। इसे NGT द्वारा अंतिम रूप से तय की गई राशि के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
ट्रिब्यूनल के समक्ष रखी गई रिपोर्टों में सीवेज के लगातार झील में पहुंचने और उसे रोकने के लिए आवश्यक व्यवस्थाओं का मुद्दा भी उठाया गया है।
भोज वेटलैंड के लिए क्यों अहम है छोटी झील का संरक्षण?
भोपाल की छोटी झील भोज वेटलैंड का हिस्सा है। ऊपरी झील और निचली झील मिलकर इस महत्वपूर्ण आर्द्रभूमि क्षेत्र का निर्माण करती हैं, जिसे रामसर स्थल के रूप में अंतरराष्ट्रीय महत्व प्राप्त है।
ऐसे जलस्रोतों में अनुपचारित सीवेज पहुंचना केवल पानी की स्वच्छता का मामला नहीं है, बल्कि जैव विविधता और पूरे पारिस्थितिकी तंत्र के लिए भी चिंता का विषय है। इसलिए झील में प्रदूषित पानी की आवक रोकने, सीवेज का उचित उपचार सुनिश्चित करने और संबंधित विभागों की जवाबदेही तय करने की आवश्यकता है।
अब आगे क्या होगा?
चार सप्ताह के भीतर नगर निगम और PHED को अपनी रिपोर्ट पेश करनी है। इन रिपोर्टों से यह स्पष्ट होने की उम्मीद है कि झील में गंदे पानी की आवक रोकने के लिए कौन-से कदम उठाए गए हैं और सीवेज प्रबंधन की योजनाओं पर कितना काम हुआ है।
मामले में अगली सुनवाई 21 दिसंबर 2026 को निर्धारित बताई गई है। अब संबंधित विभागों की कार्रवाई और प्रस्तुत रिपोर्ट पर नजर रहेगी।
