केदारनाथ में बढ़ता कचरा बना पर्यावरण की चिंता, 5 महीने में निकला 50.30 टन कचरा

देहरादून/केदारनाथ, 25 सितंबर 2026। हिमालय की ऊंची पहाड़ियों में स्थित केदारनाथ धाम में इस साल श्रद्धालुओं की बढ़ती संख्या के साथ कचरा प्रबंधन भी बड़ी चुनौती बनता दिखाई दे रहा है। नगर पंचायत से आरटीआई के जरिए प्राप्त आंकड़ों के मुताबिक, अप्रैल से अगस्त 2026 के बीच महज पांच महीनों में 50.30 मीट्रिक टन कचरा दर्ज किया गया। यह मात्रा पिछले तीन वर्षों में किसी भी पूरे यात्रा सीजन में दर्ज कचरे से अधिक है।

आंकड़ों के सामने आने के बाद हिमालय के इस संवेदनशील क्षेत्र में बढ़ते पर्यटक दबाव, प्लास्टिक कचरे और कचरा निपटान की व्यवस्था को लेकर चिंता बढ़ गई है।

पांच महीने में पिछले पूरे साल से ढाई गुना ज्यादा कचरा

केदारनाथ नगर पंचायत के आंकड़ों के अनुसार, 2023 में 32.58 मीट्रिक टन, 2024 में 26.10 मीट्रिक टन और 2025 में 21.40 मीट्रिक टन कचरा दर्ज किया गया था।

इसके मुकाबले 2026 में सिर्फ अप्रैल से अगस्त के बीच ही 50.30 मीट्रिक टन कचरा सामने आया है। यानी पांच महीनों का आंकड़ा 2023 के पूरे साल से करीब 54 प्रतिशत, 2024 से करीब 93 प्रतिशत और 2025 से करीब 135 प्रतिशत ज्यादा है।

मई में सबसे ज्यादा कचरा

इस साल महीनेवार आंकड़ों पर नजर डालें तो मई में कचरे की मात्रा सबसे ज्यादा रही।

  • अप्रैल: 1.7 मीट्रिक टन
  • मई: 16.3 मीट्रिक टन
  • जून: 11.5 मीट्रिक टन
  • जुलाई: 10.5 मीट्रिक टन
  • अगस्त: 10.3 मीट्रिक टन

मई के बाद जून, जुलाई और अगस्त में भी हर महीने 10 मीट्रिक टन से अधिक कचरा दर्ज हुआ।

करीब 20 टन प्लास्टिक कचरा भी निकला

कचरे में प्लास्टिक की मात्रा भी पर्यावरण के लिहाज से महत्वपूर्ण चिंता है। नगर पंचायत के आंकड़ों के अनुसार, 2026 में अब तक करीब 20 मीट्रिक टन प्लास्टिक कचरा दर्ज हुआ है।

इसमें से करीब 18.5 मीट्रिक टन यानी 92.5 प्रतिशत प्लास्टिक को प्रोसेस किया जा चुका है, जबकि लगभग 1.5 मीट्रिक टन अभी बाकी है।

हिमालयी क्षेत्र में प्लास्टिक कचरे का प्रबंधन सामान्य मैदानी इलाकों की तुलना में अधिक चुनौतीपूर्ण हो सकता है। ऐसे क्षेत्रों में कचरे को नीचे ले जाने और उसका वैज्ञानिक तरीके से निपटारा करने के लिए अतिरिक्त संसाधनों की जरूरत पड़ती है।

15 लाख से ज्यादा श्रद्धालु पहुंचे

कचरे में बढ़ोतरी के बीच केदारनाथ पहुंचने वाले श्रद्धालुओं की संख्या भी काफी अधिक रही। उत्तराखंड पर्यटन विभाग के यात्रा प्रभाग के आंकड़ों के अनुसार, 25 सितंबर तक इस साल करीब 15.42 लाख श्रद्धालु केदारनाथ धाम पहुंच चुके थे।

हालांकि, आरटीआई में दर्ज कचरे के आंकड़े यह अलग-अलग नहीं बताते कि उसमें कितना कचरा श्रद्धालुओं ने पैदा किया और कितना स्थानीय दुकानदारों, व्यवसायों या अन्य गतिविधियों से आया। इसलिए पूरे कचरे को सीधे श्रद्धालुओं से जोड़ना उचित नहीं होगा।

लैंडफिल की क्षमता पर भी नजर

नगर पंचायत के अनुसार केदारनाथ में लैंडफिल के लिए कुल 30,000 वर्ग फुट क्षेत्र निर्धारित है और करीब 28,000 वर्ग फुट क्षेत्र शेष बताया गया है। पिछले पांच वर्षों में यहां चार लैंडफिल बनाए जाने की जानकारी भी आरटीआई जवाब में दी गई है।

हालांकि, उपलब्ध आंकड़े लैंडफिल की शेष जगह को वर्ग फुट में बताते हैं, न कि उसमें कितने टन कचरे को सुरक्षित रूप से रखा जा सकता है। इसलिए केवल इन आंकड़ों से लैंडफिल की वास्तविक शेष क्षमता का अनुमान लगाना संभव नहीं है।

पर्यावरण संरक्षण के सामने बड़ी चुनौती

केदारनाथ सिर्फ धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण स्थल नहीं है, बल्कि बेहद संवेदनशील हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र का हिस्सा भी है। यहां आने वाले लाखों श्रद्धालुओं और पर्यटकों के कारण स्थानीय संसाधनों, जल, सड़क, स्वच्छता और कचरा प्रबंधन व्यवस्था पर दबाव बढ़ता है।

इस साल पांच महीने में ही पिछले वर्षों के पूरे यात्रा सीजन से अधिक कचरा दर्ज होना इस बात को रेखांकित करता है कि तीर्थयात्रा के साथ ठोस कचरा प्रबंधन और प्लास्टिक नियंत्रण को भी प्राथमिकता देने की जरूरत है।

साथ ही, उपलब्ध आंकड़े कचरे की मात्रा और उसके प्रबंधन की स्थिति बताते हैं, लेकिन इससे सीधे यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि पर्यावरण को कितना नुकसान हुआ है। इसके लिए पानी, मिट्टी, जैव विविधता और स्थानीय पारिस्थितिकी पर वैज्ञानिक अध्ययन की जरूरत होगी।

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