स्थान: लेह/नई दिल्ली
दिनांक: 15 जुलाई, 2026
विशेष ब्यूरो:
हिमालय की गोद में बसे लद्दाख में एक बार फिर विरोध की आंच तेज हो गई है। प्रसिद्ध शिक्षा सुधारक और पर्यावरणविद् सोनम वांगचुक, जो पिछले कुछ महीनों से केंद्र सरकार पर दबाव बनाने के लिए अभिनव तरीके अपना रहे थे, अब एक बार फिर आमरण अनशन (Hunger Strike) पर बैठ गए हैं। उनकी मांगें वही हैं—लद्दाख के लिए राज्य का दर्जा (Statehood), संविधान की छठी अनुसूची के तहत सुरक्षा, और क्षेत्र के लिए लोक सेवा आयोग।
‘कॉकरोच पार्टी’ से ‘आमरण अनशन’ तक का सफर
सोनम वांगचुक का विरोध प्रदर्शन हमेशा से ही रचनात्मक रहा है। पिछले दिनों उन्होंने ‘कॉकरोच पार्टी’ का प्रतीकात्मक आह्वान किया था, जिसमें उन्होंने यह संदेश दिया था कि जिस तरह कॉकरोच परमाणु आपदा (Nuclear Disaster) को भी झेलकर जीवित रह सकते हैं, उसी तरह लद्दाख के लोग भी विपरीत परिस्थितियों में अपना अस्तित्व बचाए रखेंगे। यह सरकार के ‘मौन’ के खिलाफ एक गहरा कटाक्ष था।
अब उन्होंने आमरण अनशन का रुख इसलिए किया है क्योंकि:
- बातचीत का बेनतीजा होना: केंद्र सरकार और ‘लेह एपेक्स बॉडी’ के बीच कई दौर की वार्ता के बाद भी कोई ठोस समाधान नहीं निकला है।
- विकास बनाम पर्यावरण: वांगचुक का आरोप है कि लद्दाख की नाजुक पारिस्थितिकी को बड़े औद्योगिक प्रोजेक्ट्स के लिए दांव पर लगाया जा रहा है, जिससे स्थानीय लोगों के अधिकारों का हनन हो रहा है।
क्या सरकार मांगें मानेगी?
राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि केंद्र सरकार के लिए लद्दाख की मांगें ‘संवैधानिक और रणनीतिक’ पेचीदगियों से भरी हुई हैं।
- सुरक्षा का तर्क: केंद्र सरकार लद्दाख को छठी अनुसूची के तहत विशेष अधिकार देने के मामले में सावधानी बरत रही है, क्योंकि इसका असर देश के अन्य संवेदनशील क्षेत्रों पर भी पड़ सकता है।
- रणनीतिक महत्व: चीन से सटे होने के कारण लद्दाख का प्रशासन सीधे केंद्र के नियंत्रण (UT) में है, जिसे सरकार अभी बदलना नहीं चाहती।
- दबाव की राजनीति: आगामी चुनाव और लद्दाख की बढ़ती अशांति को देखते हुए, सरकार पर अब एक ‘मध्यम मार्ग’ (Middle Path) अपनाने का दबाव बढ़ गया है।
तबीयत बिगड़ी तो क्या होगा?
वांगचुक की पिछली भूख हड़ताल के बाद से ही लद्दाख में समर्थन की लहर है। यदि इस बार उनकी तबीयत बिगड़ती है, तो इसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं:
- जन-आंदोलन का खतरा: लद्दाख ही नहीं, बल्कि देशभर के पर्यावरणविदों और युवाओं में सरकार के प्रति भारी नाराजगी फैल सकती है।
- अशांति का डर: लेह और कारगिल जैसे शांत शहरों में सड़कों पर विरोध प्रदर्शन तेज हो सकते हैं, जिससे पर्यटन और क्षेत्र की शांति प्रभावित होगी।
- नैतिक संकट: सोनम वांगचुक की अंतरराष्ट्रीय छवि को देखते हुए, सरकार के लिए एक नैतिक संकट पैदा हो सकता है, जहाँ सरकार को ‘विकास विरोधी’ करार दिया जा सकता है।
फिलहाल लद्दाख में क्या स्थिति है?
आज 15 जुलाई को लेह के मुख्य चौक पर हजारों लोगों ने वांगचुक के साथ एकजुटता दिखाई है। प्रशासन ने एहतियात के तौर पर सुरक्षा बढ़ा दी है, लेकिन इंटरनेट सेवाओं पर फिलहाल कोई प्रतिबंध नहीं है।
सोनम वांगचुक ने अपने समर्थकों से शांतिपूर्ण बने रहने की अपील की है। उनका कहना है, “हम सरकार से लड़ नहीं रहे, हम सरकार को अपना ही वादा याद दिला रहे हैं।”
क्या सरकार और लद्दाख के बीच यह गतिरोध समाप्त होगा, या यह अनशन किसी बड़े राजनीतिक बदलाव की भूमिका तैयार करेगा? यह आने वाले कुछ दिन स्पष्ट कर देंगे।
